शनिवार, 2 जनवरी 2010

अगर ऐसा हो / शेल सिल्वरस्टीन [1930- 1999]

अगर ऐसा हो ?

कल की शब जब यहाँ

मैं था लेटा हुआ सोंच में

मेरे कानों में गर ऐसा हो ? के सवालात कुछ

रेंगने से लगे ।

सारी शब मुझको सच पूछिए तो

परीशान करते रहे ।

और गर ऐसा हो का ये फ़रसूदा नगमा

कोई गुनगुनाता रहा ।

क्या हो गर ऐसा हो

के मैं स्कूल में

बहरा हो जाऊं पूरी तरह ?

क्या हो गर ऐसा हो

बन्द कर दें वो स्वीमिंग का पूल

कर दें पिटाई मेरी ?

क्या हो गर ऐसा हो

मेरे प्याले में हो ज़ह्र

मैं दमबख़ुद हो के रोने लगूं ?

क्या हो गर हो के बीमार मैं चल बसूं ?

क्या हो गर मुझको लज़्ज़त का एहसास कुछ भी न हो ?

क्या हो गर

सब हरे रग के बाल उग आयें सीने पे

मुझको पसन्दीदा नज़रों से

देखे न कोई कहीं ?

क्या हो गर कोई बिजली कड़कती हुई

मुझपे ही गिर पड़े ?

क्या हो गर मेरे इस जिस्म की

बाढ रुक जाये

सर मेरा छोटा स होता चला जाय

ज़ालिम हवा

सब पतगें मेरी फाड़ दे ?

क्या हो गर जंग छिड़ जाये

माँ बाप मांगें तलाक़

और हो जायें इक दूसरे से अलग ?

क्य हो गर

मेरी बस आये ताख़ीर से ?

क्या हो गर दाँत मेरे न सीधे उगें ?

फाड़ डालूं मैं अपने सभी पैन्ट

क़ासिर रहूं सीखने से कोई रक़्स ता ज़िन्दगी ?

यूं बज़ाहिर तो सब ठीक है

रात का वक़्त लेकिन अगर ऐसा हो

के सवालात की ज़र्ब से

करत रहता है मजरूह अब भी मुझे।

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शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

ख़ुदा का पहिया / शेल सिल्वरस्टीन / तर्जुमा : ज़ैदी जाफ़र रज़ा

ख़ुदा का पहिया

मुहब्बत आमेज़ मुस्कुराहट के साथ मुझसे

ख़ुदा ने पूछा था

चन्द लमहों को तुम ख़ुदा बन के

इस जहाँ को चलाना चाहोगे ?

मैंने हाँ ठीक है मैं कोशिश करूंगा कहकर

ख़ुदा से पूछा था

किस जगह बैठना है ?

तनख़्वाह क्या मिलेगी ?

रहेंगे अवक़ात लच के क्या ?

मिलेगी कब काम से फ़राग़त ?

ख़ुदा ने मुझसे कहा

के लौटा दो मेरा पहिया,

समझ गया मैं

के तुम अभी अच्छी तर्ह

तैयार ही नहीं हो।"

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एक गन्दा कमरा / शेल सिल्वर्स्टीन / तर्जुमा ; ज़ैदी जाफ़र रज़ा

एक गन्दा कमरा

चाहे जिस का भी कमरा हो ये

शर्म लाज़िम है उस्के लिए

लैम्प पर झूलता है यहाँ

एक अन्डरवियर

रेनकोट उसका, पहले से बेहद भरी,

उस जगह

वो जो कुरसी है उस पर पड़ा है,

और कुरसी नमी,गन्दगी से है बोझल,

उसकी कापी दरीचे की चौखट पे औन्धी पड़ी है,

और स्वेटर ज़मीं पर पड़ा है अजब हाल में,

उसका स्कार्फ़ टी वी के नीचे दबा है

और पैन्ट उसके

दरवाज़े पर उल्टे-पुल्टे टंगे हैं,

उसकी सारी किताबें ठुंसी हैं यहाँपर ज़रा सी जगह में

और जैकेट वहाँ हाल में रह गयी है

एक बदरंग सी छिपकिली

उसके बिस्तर पे लेटी हुई सो रही है

और बदबू भरे उसके मोज़े हैं दीवार की कील पर

चाहे जिसका भी कमरा हो ये

शर्म लाज़िम है उसके लिए

वो हो डोनाल्ड, राबर्ट या हो विली ?

ओह ! तुम कह रहे हो ये कमरा है मेरा

मेरे दोस्त सच कहते हो

जानता था ये मैं

जाना-पहचाना सा मुझको लगता था ये।

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नया वर्ष 2010

नया वर्ष 2010

ये नया वर्ष आता है क्यों
पहले जैसी ही ठिठुरन भरी सूर्य की रश्मियाँ
धूप अलसाई अलसाई सी
ओढे कुहरे की चादर चली आती है
जाने पीड़ा है क्या
लेती है हिचकियाँ
भरती है सिस्कियाँ,
घर के चूल्हे से उठता था कल जिस तरह,
आज भी वैसा ही है
उठ रहा है धुआँ।
कुछ नया तो नहीं,
इस नये वर्ष के
आ धमकने से कुछ भी हुआ तो नहीं,
ये नया वर्ष आता है क्यों ?
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सभी पाठक मित्रों और उनके संपूर्ण परिवार को नव वर्ष की मंगल कामनाएं

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

कैसी चहल-पहल सी है ख़ाली मकान में

कैसी चहल-पहल सी है ख़ाली मकान में ।
किस-किस की गूंजती है सदा सायबान में॥

मसरूफ़ अपनी जान बचाने में हैं सभी,
लेता नहीं कोई भी किसी को अमान में ॥

तालीम तो है तमग़ए आराइशे-ख़याल,
ताजिर सियासियात के हैं ख़ान्दान में ॥

राइज न होने देंगे इसे मुल्क में कभी,
कितनी मिठास क्यों न हो उर्दू ज़बान में ॥

जिन की जड़ें ज़मीन की गहराइयों में हैं,
ऊँची उड़ानें भरते नहीं आसमान में ॥

आँखें सजा रही हैं मनाज़िर नये-नये,
वुसअत बहोत है पलकों के इस सायबान में॥
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बुधवार, 30 दिसंबर 2009

मेरी तो उस समूह में कुछ भूमिका न थी।

मेरी तो उस समूह में कुछ भूमिका न थी।

फिर मैं वहाँ था क्यों, ये मुझे सूचना न थी॥

हर व्यक्ति कट गया है अब अपने कुटुंब से,

लोगों के पास पहले ये जीवन-कला न थी॥

चिन्तन फलक था दोहों का नदियों से भी विशाल,

अभिव्यक्ति के लिए कोई ऐसी विधा न थी॥

मुझको समय ने कर ही दिया संप्रदाय मुक्त,

अच्छा हुआ, वो मेरी कोई सम्पदा न थी॥

व्यवहार मेरा सब के लिए स्नेह पूर्ण था,

शायद इसी से मन में कोई भी व्यथा न थी॥

मैं ने तिमिर को दीप की लौ से जला दिया,

पथ में कभी मेरे कोई नीरव निशा न थी॥

मैं ने विपत्तियों में भी हंस-हंस के बात की,

जीवन सुखद हो ऐसी कोई कल्पना न थी॥

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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

फ़रशे-ज़मीं पे चाँद की क़न्दील देख कर

फ़रशे-ज़मीं पे चाँद की क़न्दील देख कर ।
हैराँ है आसमान कोई झील देख कर ॥

मुझ में ही रह के मुझ से है वो महवे-गुफ़्तुगू,
ख़ुश हूं मैं आर्ज़ूओं की तकमील देख कर ॥

नाज़ाँ है वो दरख़्त ख़ुद अपने वुजूद पर,
अपनी जड़ों की क़ूवते-तरसील देख कर ॥

मुमकिन है लौट जाऊं मैं फिर बचपने की सम्त,
यादों के सर पे ख़्वाबों की ज़ंबील देख कर ॥

नाकामयाबियों में भी वो टूटता नहीं,
हर मरहले की एक नई तावील देख कर ॥

इरफ़ाने-नफ़्स कुछ तो हुआ है मुझे ज़रूर,
ख़ालिक़ को अपनी ज़ात में तहलील देख कर्॥

नैज़े की नोक पर भी रहा हक़ ही सर बलन्द,
हासिल हुआ ये जग की तफ़सील देख कर ॥
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फ़रशे-ज़मीं=धरती, क़्न्दील=दीपक, तकमील= पूर्ण होन, वुजूद=अस्तित्त्व, क़ूवते-तरसील=संप्रेषण-क्षमता, ज़ंबील=पिटारी, मरहले=कठिन काम, तावील=स्पष्टीकरण, इरफ़ाने-नफ़्स=आत्मज्ञान, तहलील=घुला हुआ,

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

वो हादसा हुआ उस रोज़ शाम से पहले ॥

वो हादसा हुआ उस रोज़ शाम से पहले ॥
के जश्न सोग बना, धूम-धाम से पहले ॥

हमारे ज़हनों में जमहूरियत की शीशगरी,
न होती थी कभी इस इहतमाम से पहले ॥

ग़ज़ल में जूए-रवाँ जैसी ताज़गी थी कहाँ,
जनबे-मीर के दिलकश कलाम से पहले ॥

ख़ुमार रिन्दों की आँखों में रक़्स करता था,
गज़क थी हुस्न की मौजूद जाम से पहले॥

ख़बर न थी मुझे उस की गली में आया हूं,
बस एक शोला सा लपका क़याम से पहले॥

उसी के इश्क़ ने घर घर किया मुझे रुस्वा,
फ़साना पहोंचा मेरा, मेरे नाम से पहले ॥
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रविवार, 6 दिसंबर 2009

नर्गिसीयत के मरीज़ों से भरी है दुनिया

नर्गिसीयत के मरीज़ों से भरी है दुनिया ।
अस्पतालों में सिमटने सी लगी है दुनिया॥

नक्सली क़ूवतें सर्गर्मे-अमल हैं कब से,
सुनते हैं ज़ेरे-ज़मीं फैल रही है दुनिया ॥

क्यों है हमसाया मुमालिक में सियासी बुहरान,
किस लिए उन पे बहोत तंग हुई है दुनिया॥

दिल तो कहता है के इस दुनिय को लाज़िम है फ़ना,
दीदए-फ़िक्र में लेकिन अबदी है दुनिया ॥

आख़िरत के सभी सामान मुहैया कर लो,
एक बाज़ार सी हर वक़्त सजी है दुनिया ॥

हिम्मतो-अज़्मो-अमल,ज़ौक़े-जुनूं, मक़्सदे-हक़,
हैं अगर साथ तो क़दमों में झुकी है दुनिया ॥
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नर्गिसीयत = अपने आप से प्यार करना, सरगर्मे-अमल = सक्रिय,ज़ेरे-ज़मीं = धरती के नीचे,हमसाया मुमालिक=पड़ोसी देशों, सियासी बुहरान = राजनीतिक संघर्ष, फ़ना= नश्वरता,दीदए-फ़िक्र=चिन्तन की आँखें, अबदी = स्थायी/ अनश्वर,आख़िरत = परलोक, मुहैया = एकत्र, हिम्मतो-अज़्मो-अमल = साहस,संकल्प एवं व्यावहारिकता, ज़ौक़े-जुनूं = दीवानगी से भ्ररपूर लगन,मक़्सदे-हक़ = अभीष्ट सत्य,

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

फ़रेब खा के भी हर लहज़ा ख़ुश हुए सब लोग

फ़रेब खा के भी हर लहज़ा ख़ुश हुए सब लोग ।
के सिर्फ़ अपने ही ख़्वाबों में गुम रहे सब लोग ॥

सेहर से उसने सुख़न के दिलों को जीत लिया,
कलाम अपना वहाँ जब सुना चुके सब लोग ॥

ज़रा सी आ गयी दौलत, बदल गये अन्दाज़,
के अब नज़र मे ज़माने की हैं बड़े सब लोग ॥

नहीं रहा, तो सभी उस को याद कर्ते हैं,
वो जब हयात था क्यों दूर दूर थे सब लोग ॥

अक़ीदत उस से न थी, सिर्फ़ ख़ौफ़ था उस का,
जलाएं क़ब्र पे अब उस की क्यों दिये सब लोग्॥
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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

आयोग के निष्कर्ष में अपराधी हैं कितने

आयोग के निष्कर्ष में अपराधी हैं कितने ।
सक्रिय थे विधवंस में जो साथी, हैं कितने ॥

सब जानते हैं द्न्ड क मिलना है असंभव,
सब को है पता दन्ड के सहभागी हैं कितने॥

मंत्रालयों से होते हैं आदेश जो पारित,
निष्ठा से उसे मानने पर राज़ी हैं कितने ॥

यश किस को मिला, कौन हुआ आज कलंकित,
कितने हैं प्रगतिशील, निशावादी हैं कितने ॥

सुख-शान्ति को लौटाने की इच्छा है किसे अब,
सन्यासियों के वेश में सन्यासी हैं कितने ॥
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मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

न जाने क्यों तुम्हारी दोस्ती पूरी नहीं मिलती

न जाने क्यों तुम्हारी दोस्ती पूरी नहीं मिलती ।
तुम्हारे साथ रह कर भी ख़ुशी पूरी नहीं मिलती॥

बहोत से काम ऐसे हैं जिन्हें हम कर नहीं पाते,
हमें क्यों हस्बे-ख़्वाहिश ज़िन्दगी पूरी नहीं मिलती॥

जुनूं साज़ी के दहशत-गर्द मिल्ली कारखानों में,
किसी मज़दूर को उजरत कभी पूरी नहीं मिलती॥

हयाते-नौए-इन्साँ में हैं तेरी रूह के जलवे,
मगर हर एक को ये रोशनी पूरी नहीं मिलती॥

ख़ुदा है ख़ानए-काबा में तो फिर ला-मकाँ क्यों है,
ख़बर क्यों हम को बैतुल्लाह की पूरी नहीं मिलती॥
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मंगलवार, 24 नवंबर 2009

ऐतिहासिक धरोहर की वापसी / शैलेश ज़ैदी [डायरी के पन्ने-6]

अयोधया की बाबरी मस्जिद एक ऐतिहासिक धरोहर थी, ठोस और मूर्त्त्।मिथकीय कथा पर आधारित जन विश्वास नहीं जो अवचेतन में पकते पकते इतिहास के बराबर अपने ऊंचे क़द के साथ खड़ा हो गया हो। मस्जिद को विवादित ढांचा घोषित किया जाना स्वाधीन भारत का एक अमूल्य तोहफ़ा ज़रूर था जो स्वतंत्रता सेनानियों ने नहीं, लौह पुरुषों ने इतिहास के भाल पर रोरी और चन्दन के तिलक की तरह चिपका दिया था।बाबरी मस्जिद का धवस्त किया जाना भी एक ऐतिहासिक घटना है। किन्तु ऐसा न तो उच्च न्यायालय के किसी निर्णय के आधार पर हुआ न ही सरकार के किसी अधयादेश से प्रेरित हो कर। ऐतिहासिक लौह पुरुषों की छाया अपार जन समूह में तब्दील हो गयी, और उनकी आत्मा बचे-खुचे आत्मीय जनों के शरीर में घुस कर एक काल्पनिक युद्ध का बिगुल बजाने लगी। अराजकता इतिहास में ढल गयी और इतिहास आँखें मून्द कर चुप्पी साधे पड़ा रहा। क़ानून लौह पुरुषों की रखैल बन कर उनके शरीर में तेल मालिश करता दिखायी दिया।एक कहानी अपनी समूची त्रासदी के साथ यहाँ समाप्त हो गयी। और फिर जन्म लिया कई एक कहानियों ने, कहानियों के सम्पादकों और समीक्षकों ने। किसी को अपने कृत्य पर शर्म आयी, कोई गौरवान्वित हुआ,किसी ने काली पटटियाँ बाँधीं, किसी ने विजय दिवस मनाया,किसी ने इस हथियार के उपयोग की नयी योजनाएं बना लीं और मस्जिद के स्थान पर मस्जिद में आस्था रखने वालों को निशाना बनाया। खुल कर नर्संहार हुआ।इतिहास ने एक और नया पृष्ठ टाँक दिया।इक्कीस्वीं शताब्दी के नर्संहार का पृष्ठ्। नये सिरे से लौह पुरुष बनने और चुनाव जीतने का पृष्ठ ।
इधर दो दिनों के समाचार-पत्र पढकर जिन में लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट छायी हुई है, अनायास ही मेरे होंठों पर यह शेर तैर गया-
क्या ख़बर थी कभी हालात के ज़ख़्मों पे नमक
वक़्त के हाथ ख़मोशी से छिड़क जायेंगे ।
बाबरी मस्जिद के विधवंस ने समूचे देश को सामन्य रूप से और मुसलमानों को विशेष रूप से पूरी तरह घायल कर दिया था। किन्तु यह बात 1992 ई0 और उसके बाद के दो-चार वर्षों की है।गुजरात के नर्संहार ने घावों को और गहरा दिया था। किन्तु यह घाव भी अब पहले की तरह रिस नहीं रहे थे। इस बीच कई एक ऐसी घटनाएं हुईं जिन से सोच की दिशा कुछ बदली और हालात में थोड़ा ठहराव सा आने लगा।लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट ने नासूर बन चुके ज़ख्मों को फिर से हरा कर दिया और उनसे गर्म गर्म लहू की बून्दें छलक पड़ीं । दूसरी ओर जो मस्त हाथी की तरह जंगल-जंगल घूम रहे थे और जिस तनावर वृक्ष की जो डाल चाहते थे तोड़ लेते थे, उन्हें नये सिरे से घायल कर दिया। और घायल हाथियों की क्या मनोवृत्ति होती है यह यह बताना बहुत ज़रूरी नहीं है।
समूचा देश जानता है और कांग्रेस सरकार भी जानती है कि आयोग ने जिन बड़े बड़े नामों की चर्चा की है उन में से कोई भी दंडित नही होगा। रह गये छोटे नाम । तो उनके लिए बड़े-बड़े नाम ढाल का काम करेंगे ही। अब नतीजा ये होगा कि बड़े बड़े नाम आश्वस्त होकर चुप्पी साधे रहेंगे और तमाशा देखेंगे उन छोटे छोटे नामों के शोर शराबे का, वक़्त के नमक से बेचैन पुराने ज़ख्मों की अपाहिज स्थितियों की तड़प का। और यह तमाशे भी इतिहास टाँकता रहेगा। हाँ बाबरी मस्जिद का ऐतिहासिक धरोहर अब अपने कायिक रूप में न सही, प्रतीत्मक रूप में वापस लौट आय है, एक नये अर्थ के साथ्।देखना ये है कि व्यावहारिक स्तर पर उसकी व्याख्याएं कितनी स्वस्थ या कितनी नकारत्मक और प्रहारत्मक होती हैं ।
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शाख़ से फल की तरह पक के टपक जायेंगे

शाख़ से फल की तरह पक के टपक जायेंगे ।
इतनी तारीफ़ करोगे तो बहक जायेंगे ॥

फ़र्श पर रहते हुए अर्श पे उड़ते हैं फ़ुज़ूल ,
रोक लो अपने देमाग़ों को भटक जायेंगे ॥

कब हमें बाहमी रिश्तों पे भरोसा होगा ,
कब दिलों में हैं जो बैठे हुए शक जायेंगे ॥

घुट के रह जायेगी सीनों में सदाए-फ़रियाद,
अब ये नाले न कभी ता-बः-फ़लक जायेंगे ॥

क्या ख़बर थी कभी हालात के ज़ख़्मों पे नमक,
वक़्त के हाथ ख़मोशी से छिड़क जायेंगे ॥
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कितना तबाहकुन था समन्दर का इज़्तेराब

कितना तबाहकुन था समन्दर का इज़्तेराब ।
आँखों में अब भी है उसी मंज़र का इज़्तेराब ॥

चुभती रही निगाहों में बस मेरी ख़ुदसरी ,
देखा किसी ने भी न सुख़नवर का इज़्तेराब ॥

इस ख़ौफ़ से के रिश्ते कहीं मुन्तशिर न हों,
सर पर उठाये फिरता रहा घर का इज़्तेराब ॥

आँखों में आँसुओं का अजब ख़ल्फ़िशार था,
मासूम सीपियों में था गौहर का इज़्तेराब ॥

किस तर्ह आब्दीदः हुआ वो सितम शआर,
मैं देखता ही रह गया पत्थर का इज़्तेराब ॥
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टिप्पणी : तबाहकुन = विनाशकारी, इज़्तेराब=तड़प, मंज़र = दृश्य, ख़ुदसरी= अवज्ञाकारिता, सुखनवर = कवि, मुन्तशिर=बिखरना,ख़ल्फ़िशार= खलबली, मासूम= अबोध, गौहर=मोती, आब्दीदः =सजल आँखें, सितम श'आर=अत्याचार ढाने वाला,

सोमवार, 23 नवंबर 2009

जुनूं-ख़ेज़ी में दीवानों से कुछ ऐसा भी होता है

जुनूं-ख़ेज़ी में दीवानों से कुछ ऐसा भी होता है।
के महबूबे-नज़र सहराओं का जलवा भी होत है॥

सफ़ीने की मदद को ख़ुद हवाएं चल के आती हैं,
हिफ़ाज़त के लिए ठहरा हुआ दरया भी होता है॥

मेरी राहों में लुत्फ़े-नकहते-बादे-बहारी है,
मेरे सर पर महो-ख़ुर्शीद का साया भी होता है ॥

ये मज़लूमी की चादर मैं जतन से ओढे रहता हूं,
के लग़ज़िश से मेर महबूब कुछ रुस्वा भी होत है ॥

उसी के फ़ैज़ से इस हाल में भी सुर्ख़-रू हूं मैं।
जहाँ वो दिल-शिकन है, हौसलः अफ़्ज़ा भी होता है॥

नज़र के सामने रहता है वो कितने हिजाबों में,
मगर ख़्वाबों में जब आत है, बे पर्दा भी होता है॥
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रविवार, 22 नवंबर 2009

भटक रहा हूं मैं कब से नये उफ़क़ ले कर

भटक रहा हूं मैं कब से नये उफ़क़ ले कर ।
किताबे-दिल के उड़ा दो वरक़ वरक़ ले कर॥

मैं आसमानों से आगे निकल गया हूं कहीं ,
के लौटना है मुझे रम्ज़े-नूरे-हक़ ले कर ॥

अजब यगानः ओ- यकता है दर्सगाहे-ख़िरद,
सभी हैं इस से निकलते नया सबक़ ले कर ॥

अभी रगों में है बेहद लहू का तेज़ दबाव,
अभी पड़ा हूं मैं बिस्तर पे क़ल्बे-शक़ ले कर्॥

ज़रा सी जान कहीं मुझ में अब भी बाक़ी है,
मैं जा रहा हूं यही आखिरी रमक़ ले कर ॥
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शनिवार, 21 नवंबर 2009

वो एक ठहरे हुए शान्त जल के जैसा था

वो एक ठहरे हुए शान्त जल के जैसा था ।
स्वभाव उसका मधुर था, तरल के जैसा था ॥

हमारे युग की ये गतिशीलता वहाँ पे रुकी,
जहाँ समय किसी बरछी के फल के जैसा था ॥

मैं झोंपड़े में सिमट आया ये विवशता थी,
मेरा भी घर कभी दिखता महल के जैसा था॥

मैं उस का रूप विवेचित करूं, तो कैसे करूं,
वो हू - ब - हू मेरी ताज़ा ग़ज़ल के जैसा था॥

जो मैं ने रात अचेतन में झाँक कर देखा,
मैं इक खिले हुए शत दल कमल के जैसा था॥
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गुरुवार, 19 नवंबर 2009

भेद कर मैं आज षटचक्रों को, बाहर आ गया ॥

भेद कर मैं आज षटचक्रों को, बाहर आ गया ॥
चान्द सूरज मिल गये, जीने का तेवर आ गया ॥

मैं क्षितिज के पार की पढ़ कर लिखावट था चकित,
किन्तु अब मेरी समझ में अक्षर अक्षर आ गया॥

रख दिया मैं ने जब उसके सामने जीवित यथार्थ,
देखने भी ठीक से पाया न था, ज्वर आ गया॥

बन्द थीं राधा की आखें, मुस्कुराते थे अधर,
स्वप्न में वंशी बजाता जब वो गिरिधर आ गया ॥

कर रहा था मैं भी जल क्रीड़ाएं मन की झील में,
क्रूर था ऐसा समय बन कर निशाचर आ गया ॥

कल मिले थे पर्वतों की ओट में हम, सोच कर,
मन ने लीं अँगड़ाइयाँ, आँखों में निर्झर आ गया ॥
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इक समन्दर बेकराँ रहता है मेरी ज़ात में ।

इक समन्दर बेकराँ रहता है मेरी ज़ात में ।
हर तरफ़, हर जा, वही छाया है मेरी ज़ात में॥

बस उसी क एक चेहरा है फ़ना जिस को नहीं,
और ताबिन्दा वही चेहरा है मेरी ज़ात में ॥

मैं नहीं जाता कहीं शेरो-सुख़न की बज़्म में,
रात दिन ये बज़्म ख़ुद बरपा है मेरी ज़ात में॥

हुस्ने बर हक़ का क़सीदा है अबूतालिब की नात,
इहतरामे-नाते-पाकीज़ा है मेरी ज़ात में ॥

उस के औसाफ़े-हमीदा का है मज़हर कायनात,
और ये मज़हर दरख़्शन्दा है मेरी ज़ात में॥
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बुधवार, 18 नवंबर 2009

हैरत है मेरा गाँव तरक़्क़ी न कर सका

हैरत है मेरा गाँव तरक़्क़ी न कर सका ।
मजबूर था के फ़िक्र भी अपनी न कर सका ॥

दुख-दर्द दूसरों के फ़क़त बाँटता रहा ,
अपने लिए हयात में कुछ भी न कर सका॥

मेरे खिलाफ़ साज़िशें करते रहे सभी,
शायद किसी की भी मैं तशफ़्फ़ी न कर सका॥

शेर-ओ-सुख़न की बज़्म से मैं दूर ही रहा,
ख़ुद पर तिलिस्मे-ज़ौक़ को हावी न कर सका॥

ज़ेबाइशे-सियासते-दुनिया है कजरवी ,
इसके लिए कोई मुझे राज़ी न कर सका ॥
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मंगलवार, 17 नवंबर 2009

खेतों को सींचता रहा मैं रात रात भर

खेतों को सींचता रहा मैं रात रात भर ।
हासिल हुवा मगर न मुझे कुछ हयात भर्॥

गो तू बहोत क़रीब न आया मेरे कभी ,
था बाइसे-सुकून तेरा इल्तेफ़ात भर ॥

तेरी ही धड़कनों से है ज़र्रात में हयात,
तनवीर है तेरी ही फ़क़त, कायनात भर्॥

पहचान कब हुई मुझे तेरे वुजूद की ,
थी सामने हमेशा मेरी अपनी ज़ात भर ॥

क़ादिर है तू के तुझ को हैं सारे ही अख्तियार,
ज़िन्दा रहूं मैं, मुझ में कुछ ऐसे सिफ़ात भर ॥
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सोमवार, 16 नवंबर 2009

जब उस की जफ़ाओं में कुछ आ जाती है नर्मी

जब उस की जफ़ाओं में कुछ आ जाती है नर्मी ।
दरिया की हवाओं में कुछ आ जाती है नर्मी ॥

हरियाली कहीं भी हो महज़ उस के असर से ,
सूरज की शुआओं में कुछ आ जाती है नर्मी ॥

साहिल पे अगर साथ हो तस्वीर भी उसकी ,
मौजों की अदाओं में कुछ आ जाती है नर्मी ॥

गहराइयों से दिल के निकलती हैं कभी जब,
इन्साँ की दुआओं में कुछ आ जाती है नर्मी ॥

ईमान हो पुख़्ता तो अक़ीदा है ये मेरा,
पत्थर के ख़ुदाओं में कुछ आ जाती है नर्मी॥
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रविवार, 15 नवंबर 2009

ये सीना हो गया पत्थर सा सख़्त-जाँ कैसे ।

ये सीना हो गया पत्थर सा सख़्त-जाँ कैसे ।
उतार पायेगा ख़ंजर कोई यहाँ कैसे ॥
फ़लक पे गर्द उड़ाता है बादलों का हुजूम ,
ज़मीं पे चान्द करे नूर-पाशियाँ कैसे ॥
गुलों ने अपनी हिफ़ाज़त में कुछ किया ही नहीं,
संभाल पायेंगे ज़ुल्मत की आँधियाँ कैसे ॥
अभी तो सुबह का मंज़र है मेरी आँखोँ में,
अभी से ख़्वाबों को देखूं मैं खूं-चकाँ कैसे ॥
न कोई घर ही बचा है, न है ठिकाना कोई,
ये लोग शह्र से जायेंगे अब कहाँ कैसे ॥
मैं क़ैद ख़ानों में हर सर्दो-गर्म देख चुका,
मुझे सतायेंगी दुनिया की सख़्तियाँ कैसे ॥
मैं खोया-खोया सा हूं मीर के तग़ज़्ज़ुल में,
बनूं मैं हज़रते ग़ालिब का मदह-ख़्वाँ कैसे ॥
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मंगलवार, 10 नवंबर 2009

पहलू मेँ प्लस्टिक की थी नल्की लगी हुई ।

पहलू मेँ प्लस्टिक की थी नल्की लगी हुई ।
ख़ूँ रिस रहा था यूँ के बहोत बेकली हुई॥

ख़ाली थे घर के ताक़्चे, कुछ भी न था वहाँ,
मजबूरियों की फ़स्ल खड़ी थी पकी हुई॥

दालान से गुज़रती थी कल तक जो दोपहर,
अब उसके पास धूप नहीं थी बची हुई ॥

क्या रोशनाई वक़्त के सहरा से माँगता ,
अश्कों की थी सियाही वहाँ भी भरी हुई॥

यादों के ख़ैमे साथ लिये घूमता रहा,
चूल्हे पे दुख के, देग़ थी दिल की चढ़ी हुई॥

देखूँगा क्य मैं खोल के माज़ी की खिड़कियाँ,
एक फाँस सी है रूह के अन्दर चुभी हुई ॥

पेशानियाँ शऊर की हैं आज मुज़महिल,
इदराक की है नब्ज़ बहोत ही थकी हुई॥
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दिल के तवे पे जलते हैं लफ़ज़ों के कारवाँ।

दिल के तवे पे जलते हैं लफ़ज़ों के कारवाँ।
हो जायें राख राख न ख़्वाबों के कारवाँ॥

टुकड़ों में बँट गया है मेरा इस तरह वुजूद ,
हँसते हैं मेरी ज़ात पे अश्कों के कारवाँ ॥

मैं कल ज़मीन ओढ़ के सो जाऊँगा यहाँ ,
आयेंगे मेरे पास फ़रिश्तों के कारवाँ ॥

इक स्म्त हम को एटमी ताक़त का है ग़ुरूर,
इक स्म्त ख़ूँ-चकाँ हैं धमाकों के कारवाँ ॥

तरीख़ के हैं जिस्म पे नाख़ून के निशाँ,
बोसीदा हो चुके हैं किताबों के कारवाँ ॥

बीनाइयों की लाशें हुईं ख़ाक के सुपुर्द,
फिरते हैं अन्धी राह पे नस्लों के कारवाँ ॥

वो देखो उलटे लटके हैं सूली पे वक़्त की ,
कितनी हवास-बाख़्ता सदियोँ के कारवाँ ॥
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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

न कोई क़िस्सा है अपना न दास्ताँ अपनी ।

न कोई क़िस्सा है अपना न दास्ताँ अपनी ।
के अब तो भूल चुकी है मुझे ज़ुबाँ अपनी॥

हुई थी मेरी कभी हुस्ने-लामकाँ को तलब,
जहाँ दिखायी थीं उसने निशानियाँ अपनी॥

निज़ामे-आतिशे इरफ़ाँ के गुलबदन अफ़्लाक,
सजा रहे हैं जबीनों पे कहकशाँ अपनी ॥

मेरा ही सर था जो काटा गया दरख्त के साथ,
जहाँ को रास नहीं आयीं खूबियाँ अपनी।

हवा में उड़ती फिरी ख़ाक मेरी चार तरफ़ ,
ज़माना ले गया ख़ुशबू कहाँ कहाँ अपनी॥
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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

मैं यूसुफ़ के लिए जीता रहा याक़ूब की सूरत ।

मैं यूसुफ़ के लिए जीता रहा याक़ूब की सूरत ।
के हर लह्ज़ा मेरी आँखों में थी मह्बूब की सूरत ॥

हज़ारों बार सर कटता रहा पर दिल नहीं टूटा,
ज़मीं पर हर जगह उगता रहा मैं दूब की सूरत ॥

मिला इनआम दुनिया से यही बस हक़-पसन्दों को,
निज़ामे-अह्ले-दुनिया में रहे मातूब की सूरत्॥

जिन्हें कुछ मस्लेहत आती थी वो कहलाए दानिशवर,
जो दानिश्मन्द थे फिरते रहे मजज़ूब की सूरत ॥

निगाहे दुशमनाँ में सूरते-क़तिल नज़र आये,
मगर अहबाब की महफ़िल में थे यासूब की सूरत्॥

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बुधवार, 23 सितंबर 2009

परिन्दे पहले के जैसी उड़ान भरते नहीं ।

परिन्दे पहले के जैसी उड़ान भरते नहीं ।
के उनके उड़ने से अब आसमान भरते नहीं ॥

वो ख़्वाब क्या थे जिन्हें कोई नाम दे न सका,
वो ज़्ख़्म कैसे थे जिनके निशान भरते नहीं ॥

इबारतों का मज़ा सादगी में होता है,
दक़ीक़ लफ़्ज़ों को अहले-ज़बान भरते नहीं ॥

शऊर करती है बेदार हक़ शनास नज़र,
वसीअ क़ल्ब में वह्मो-गुमान भरते नहीं ॥

क़याम करते हैं सब होटलों की दुनिय में,
अज़ीज़ो-अक़रुबा से अब मकान भरते नहीं ॥

कोई भी शोबा तो ऐसा नज़र नहीं आता,
के जिस में लोग कहें बेइमान भरते नहीं ॥

हुआ है क्या तुम्हें ! क्यों इस क़दर तअम्मुल है,
के जाम मेरा, मेरे मेह्र्बान भरते नहीं ॥

वो अह्ले-इल्म हमारे लिए हैं लायानी,
समन्दरों क जो कूज़े में ग्यान भरते नहीं ॥
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मंगलवार, 22 सितंबर 2009

मेरे भी जिस्म पर कल एक सर था ।

मेरे भी जिस्म पर कल एक सर था ।
मैँ उस से इस क़दर क्यों बेख़बर था ॥

मेरी सांसों में थी सहरा-नवरदी,
मेरी आँखों में दरया का सफ़र था ॥

उजालों का वो कैसा कारवाँ था,
क़याम उस का बहोत ही मुख़्तसर था॥

यहाँ आँसू की क़ीमत कुछ नहीं थी,
वहाँ आँसू का हर क़तरा गुहर था ॥

गुलों ने क्यों मेरा सदक़ा उतारा,
चमन में क्यों मैं इतना मोतबर था ॥

वहाँ थे रेगज़ारों के समन्दर,
मैं उन के दरमियाँ मिस्ले शजर था ॥

जहाँ अब राख का इक ढेर सा है,
वहाँ पहले मेरा भी एक घर था ॥
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शनिवार, 29 अगस्त 2009

हमें है जाना जहाँ तक ये रास्ते जायें

हमें है जाना जहाँ तक ये रास्ते जायें।

इरादे बीच में कैसे जवाब दे जायें।।

घ्ररौन्दे हम तो बनाते रहेंगे साहिल पर ,

बला से मौजें इन्हें अपने साथ ले जायें ॥

उन्हें है आज भी माज़ी की सल्तनत का गुरूर,

किसी तरह तो देमाग़ों से ये नशे जायें ॥

ज़माल उसका वहाँ और भी नुमायाँ है,

बुराई क्या है अगर लोग बुतकदे जायें॥

न ख़ैरियत, न सलामो-दुआ, न ख़न्दालबी,

मिलें जो राह में बिल्कुल कटे-कटे जायें॥

कमाले-शेरो-सुख़न लज़्ज़ते-जमाल में है,

न हो जो हुस्न तो जीने के सब मज़े जायें॥

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बुधवार, 26 अगस्त 2009

ज़मीं के सीने का हर ज़ख्मे-तर उभारना है

ज़मीं के सीने का हर ज़ख्मे-तर उभारना है ।
शजर की तर्ह जहां भी हैं सर उभारना है॥

जो पत्थरों का जिगर चीर कर निकलता है,
उस आबशार का दिल में हुनर उभारना है ॥

सुलूक शम्सो-क़मर का हरेक से यकसां है ,
मआशरे को इसी राह पर उभारना है ॥

समन्दरों में हैं पोशीदा कितने ही गौहर,
लगा के ग़ोता वो सारे गुहर उभारना है॥

कलीमी बख़्श के तोड़े ग़ुरूरे-फ़िरऔनी,
इसी ज़मीं पे इक ऐसा शजर उभारना है ॥

सियाह दौलतें जितनी हैं ग़ैर मुल्कों में,
किसी तरह भी वो सब मालो-ज़र उभारना है ॥

बचा के रखना है इस राख की हरारत को,
के इस के बत्न से ताज़ा शरर उभारना है॥
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ज़माने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था ।

ज़माने के लिए मैं ज़ीनते-निगाह भी था ।
ये बात और है सर-ता-क़दम तबाह भी था॥

ख़मोशियों से मैं बढ़ता रहा सुए-मंज़िल ,
सियासतों का जहां जब के सद्दे-राह भी था॥

बयान कर न सका मैं सितम अज़ीज़ों के,
के ऐसा करने में अन्देशए-गुनाह भी था ॥

जो ख़ुद को करता था मेरे फ़िदाइयों में शुमार,
मेरे ख़िलाफ़ वही शख़्स कल गवाह भी था ॥

ख़ुलूस उस का बज़ाहिर बहोत ही दिलकश था,
बरत के देखा तो क़ल्बो-जिगर सियाह भि था॥

गुज़र रही थी फ़क़ीरी में ज़िन्दगी उस की,
ख़बर किसे थी सुख़न का वो बादशाह भी था ॥

उसी की सिम्त किया क़िब्ला रास्त खुसरो ने,
जो कज-कुलाह भी था और दीं-पनाह भी था॥*
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* अमीर खुसरो के गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया ने एक दिन कुछ हिन्दुओं को यमुना में नहाते देख कर सहज भाव से कहा - हर क़ौमे-रास्त राहे, दीने व क़िब्लागाहे। अर्थात प्रत्येक क़ौम का अपना सन्मार्ग होता है, धर्म होता है और पूज्य स्थल भी। हज़रत अमीर ख़ुसरो पास में ही खड़े थे, उन्हों ने अप्ने गुरु की ओर सकेत कर के तत्काल इस शेर को दूसरा चरण कह कर पूरा कर दिया - मन क़िब्ला रास्त करदम बर सिम्ते-कज-कुलाहे अर्थात मै अपना पूज्य स्थल तिर्छी टोपी वाले की ओर सीधा करता हूं।मुसलमानों में क़िब्ला [काबे] की ओर मुंह कर के नमाज़ पढ़ी जाती है और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया तिरछी टोपी [कजकुलाह] लगाते थे।इस शेर में यही सकेत है।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

अना की जितनी भी दीवारें थीं वो तोड़ गया

अना की जितनी भी दीवारें थीं वो तोड़ गया ।
मुहब्बतों से हवाओं के रुख़ को मोड़ गया ॥

वो हमसफ़र था मेरा उसपे था भरोसा मुझे,
सफ़र के बीच वो क्यों साथ मेरा छोड़ गया ॥

करिश्मा ये है के हुस्ने सुलूक से अपने,
कलाई ज़ुल्मो तशद्दुद की वो मरोड़ गया ॥

उसी के ज़िक्र से मिलता है हौसला मुझ को,
अजीब तर्ह का रिश्ता वो मुझ से जोड़ गया ॥

हक़ीक़तों की कुदालें थीं उस के हाथों में,
तवह्हुमात के भांडे सभी वो फोड़ गया ॥

मैं ग़फ़्लतों के समन्दर में डूब ही जाता,
भला हो उसका के आकर मुझे झिंजोड़ गया ॥

घड़ा ये मिटटी का नौए बशर की दौलत है,
ये टूट जाये तो समझो कई करोड़ गया ॥
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गुरुवार, 13 अगस्त 2009

जो अब्र बाइसे तस्कीने ख़ासो आम हुआ

जो अब्र बाइसे तस्कीने ख़ासो आम हुआ ।
बराहे रास्त समन्दर से हम कलाम हुआ ॥

हमारी शायरी जिस दौर में थी ज़ेरे बहस ,
हमारे साथ ही वो दौर भी तमाम हुआ ॥

हरेक ज़बान का किरदार है जुदागाना ,
न जिस में खोट हो कोई उसे दवाम हुआ ॥

वो ख़ुशअदा भी ख़ुशअन्दाज़ो ख़ुशजमाल भी है,
जभी तो वादिए दिल में वो ख़ुश्मुक़ाम हुआ ॥

किसान हो गये आमादा ख़ुद्कुशी के लिए,
वो ख़ुद्कफ़ील बनें कब ये इह्तमाम हुआ ॥

सियासतों ने शिकस्ता किया सफ़ीनए दिल,
मिज़ाज पानियों का बहरे इन्तेक़ाम हुआ ॥

हमारा मुल्क है आज़ाद सिर्फ़ काग़ज़ पर,
अमल में फिर से ये हालात का ग़ुलाम हुआ ॥
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असासा ख़्वाबों का मह्फ़ूज़ कर नहीं पाया ।

असासा ख़्वाबों का मह्फ़ूज़ कर नहीं पाया ।
के दिल ने अपना कोई हमसफ़र नहीं पाया॥

हमारी आँखों में ऐसे चेराग़ रौशन थे,
अंधेरा राह में आकर ठहर नहीं पाया ॥

सुकून के वो हसीं लम्हे फिर नहीं लौटे,
कहाँ कहाँ उन्हें ढ़ूंढ़ा मगर नहीं पाया ॥

न जाने कब से है आमादए-सफ़र दुनिया,
कोई भी राह से तेरी गुज़र नहीं पाया ॥

अजब सेहर था तेरी ख़ुश-जमाल आँखों का,
हुआ ज़माना वो जादू उतर नहीं पाया ॥

क़दम-क़दम पे हमें राहज़न ही मिलते रहे,
किसी को हमने कभी राहबर नहीं पाया॥
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शनिवार, 8 अगस्त 2009

ज़िन्दगी ने इस तरह छेड़ा है साज़े-रोज़ो-शब ।

ज़िन्दगी ने इस तरह छेड़ा है साज़े-रोज़ो-शब ।
कारे-दुनिया ने मिटया इम्तियाज़े-रोज़ो-शब ।।

हो गया अब गाँव के तालाब का पानी भी ख़ुश्क,
झुन्ड चिड़ियों का बताये क्या फ़राज़े-रोज़ो-शब ।।

कश्तियाँ ग़र्क़ाब हो जाने का सदमा कम नहीं ,
हो गया ग़र्क़ाब क्यों सोज़ो-गुदाज़े-रोज़ो-शब ।।

रात दिन यकसाँ गुज़रती हो जब अपनी ज़िन्दगी,
कोई समझाये मुझे क्या है जवाज़े-रोज़ो-शब ।।

बेसुरे नग़्मों को सुनते-सुनते जी उकता गया,
काश कोई तोड़ देता बढ़ के साज़े-रोज़ो-शब ।।
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रविवार, 2 अगस्त 2009

तेरे जलाल का परतौ, तेरे जमाल का रंग

तेरे जलाल का परतौ, तेरे जमाल का रंग ।
बशर में है तेरे असरारे-ला-ज़वाल का रग्॥

कहाँ की सोज़िशे-दिल कैसा इज़्तेराबे-जिगर,
जुदाई में भी हो मह्सूस जब विसाल का रंग ॥

मैं हँसते-बोलते दुनिया से हो गया रुख़्सत,
जहाँ न देख सका मेरे इन्तेक़ाल का रंग ॥

हुए न पस्त किसी लम्हा हौसले मेरे,
के उनमें नक़्श था रफ़्तारे-माहो-साल का रंग॥

अजब नहीं मैं कोई ऐसी बात कह जाऊँ,
के सुन के बज़्म से उड़ जाये क़ीलो-क़ाल क रंग॥

मैं तेरे हुस्न का मद्दाह तो हूं पहले से,
तेरे निखार में है आज कुछ कमाल का रंग्॥

सभी हैं जोश में, होशो-हवास कुछ भी नहीं,
ज़माना ले के है निकला नये उबाल का रंग्॥

तेरे वुजूद से है इहतमामे-शेरो-सुख़न,
के हर ख़याल में है तेरे ख़द्दो-ख़ाल का रंग॥
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