ग़ज़ल / ज़ैदी जाफ़र रज़ा / फ़रेब खा के भी हर लहज़ा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शनिवार, 5 दिसंबर 2009

फ़रेब खा के भी हर लहज़ा ख़ुश हुए सब लोग

फ़रेब खा के भी हर लहज़ा ख़ुश हुए सब लोग ।
के सिर्फ़ अपने ही ख़्वाबों में गुम रहे सब लोग ॥

सेहर से उसने सुख़न के दिलों को जीत लिया,
कलाम अपना वहाँ जब सुना चुके सब लोग ॥

ज़रा सी आ गयी दौलत, बदल गये अन्दाज़,
के अब नज़र मे ज़माने की हैं बड़े सब लोग ॥

नहीं रहा, तो सभी उस को याद कर्ते हैं,
वो जब हयात था क्यों दूर दूर थे सब लोग ॥

अक़ीदत उस से न थी, सिर्फ़ ख़ौफ़ था उस का,
जलाएं क़ब्र पे अब उस की क्यों दिये सब लोग्॥
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