Thursday, November 19, 2009

इक समन्दर बेकराँ रहता है मेरी ज़ात में ।

इक समन्दर बेकराँ रहता है मेरी ज़ात में ।
हर तरफ़, हर जा, वही छाया है मेरी ज़ात में॥

बस उसी क एक चेहरा है फ़ना जिस को नहीं,
और ताबिन्दा वही चेहरा है मेरी ज़ात में ॥

मैं नहीं जाता कहीं शेरो-सुख़न की बज़्म में,
रात दिन ये बज़्म ख़ुद बरपा है मेरी ज़ात में॥

हुस्ने बर हक़ का क़सीदा है अबूतालिब की नात,
इहतरामे-नाते-पाकीज़ा है मेरी ज़ात में ॥

उस के औसाफ़े-हमीदा का है मज़हर कायनात,
और ये मज़हर दरख़्शन्दा है मेरी ज़ात में॥
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2 comments:

भंगार said...

बहुत उम्दा ....बहुत अच्छी सोच ...कई बार पढने के बाद ......

Suman said...

इक समन्दर बेकराँ रहता है मेरी ज़ात में ।nice