Wednesday, September 23, 2009

परिन्दे पहले के जैसी उड़ान भरते नहीं ।

परिन्दे पहले के जैसी उड़ान भरते नहीं ।
के उनके उड़ने से अब आसमान भरते नहीं ॥

वो ख़्वाब क्या थे जिन्हें कोई नाम दे न सका,
वो ज़्ख़्म कैसे थे जिनके निशान भरते नहीं ॥

इबारतों का मज़ा सादगी में होता है,
दक़ीक़ लफ़्ज़ों को अहले-ज़बान भरते नहीं ॥

शऊर करती है बेदार हक़ शनास नज़र,
वसीअ क़ल्ब में वह्मो-गुमान भरते नहीं ॥

क़याम करते हैं सब होटलों की दुनिय में,
अज़ीज़ो-अक़रुबा से अब मकान भरते नहीं ॥

कोई भी शोबा तो ऐसा नज़र नहीं आता,
के जिस में लोग कहें बेइमान भरते नहीं ॥

हुआ है क्या तुम्हें ! क्यों इस क़दर तअम्मुल है,
के जाम मेरा, मेरे मेह्र्बान भरते नहीं ॥

वो अह्ले-इल्म हमारे लिए हैं लायानी,
समन्दरों क जो कूज़े में ग्यान भरते नहीं ॥
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2 comments:

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

परिंदे तो उडान भरते हैं बस आसमान छोटा हो गया

अशोक मधुप said...

वो ख़्वाब क्या थे जिन्हें कोई नाम दे न सका,
वो ज़्ख़्म कैसे थे जिनके निशान भरते नहीं
शानदार गजल