शनिवार, 29 अगस्त 2009

हमें है जाना जहाँ तक ये रास्ते जायें

हमें है जाना जहाँ तक ये रास्ते जायें।

इरादे बीच में कैसे जवाब दे जायें।।

घ्ररौन्दे हम तो बनाते रहेंगे साहिल पर ,

बला से मौजें इन्हें अपने साथ ले जायें ॥

उन्हें है आज भी माज़ी की सल्तनत का गुरूर,

किसी तरह तो देमाग़ों से ये नशे जायें ॥

ज़माल उसका वहाँ और भी नुमायाँ है,

बुराई क्या है अगर लोग बुतकदे जायें॥

न ख़ैरियत, न सलामो-दुआ, न ख़न्दालबी,

मिलें जो राह में बिल्कुल कटे-कटे जायें॥

कमाले-शेरो-सुख़न लज़्ज़ते-जमाल में है,

न हो जो हुस्न तो जीने के सब मज़े जायें॥

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