Tuesday, July 1, 2008

बहादुरशाह ज़फ़र [1775-1862 ] की यादगार ग़ज़लें

[ 1 ]
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
ले गया छीन के कौन आज तेरा सब्रो-क़रार
बेक़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी
चश्मे-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी
उनकी आंखों ने खुदा जाने किया क्या जादू
कि तबीअत मेरी माइल कभी ऐसी तो न थी
क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार
खू तेरी हूरे-शमाइल कभी ऐसी तो न थी
[ 2 ]
न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सका, मैं वो एक मुश्ते-गुबार हूँ
न तो मैं किसी का हबीब हूँ, न तो मैं किसी का रकीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ, जो उजड़ गया वो दयार हूँ
पए-फातिहा कोई आए क्यों, कोई चार फूल चढाये क्यों
कोई आके शम'अ जलाए क्यों, मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मेरा रंग-रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन खिजां में उजड़ गया, मैं उसी की फस्ले-बहार हूँ
[ 3 ]
लगता नहीं है जी मेरा उजडे दयार में
किसकी बनी है आलमे-नापाएदार में
बुलबुल को बागबाँ से न सैयाद से गिला
क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिले-दागदार में
इक शाखे-गुल पे बैठके बुलबुल है शादमाँ
कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालाज़ार में
उम्र-दराज़ मांग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इन्तेज़ार में
दिन जिंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोएंगे कुंजे-मज़ार में
कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कूए-यार में.
[ 4 ]
खुलता नहीं है हाल किसी पर कहे बगैर
पर दिल की जान लेते हैं दिलबर कहे बगैर
क्योंकर कहूँ तुम आओ, कि दिल की कशिश से वो
आयेंगे दौडे आप मेरे घर कहे बगैर
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बगैर
बेदर्द तू सुने-न-सुने लेक दर्दे-दिल
रहता नहीं है आशिके-मुज़्तर कहे बगैर
तक़दीर के सिवा नहीं मिलता कहीं से भी
दिलवाता ऐ 'ज़फ़र' है मुक़द्दर कहे बगैर
[ 5 ]
दिल की मेरे बेक़रारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
शब् की मेरी आहो-ज़ारी मुझ से कुछ पूछो नहीं
बारे-गम से मुझपे रोज़े-हिज्र में इक-इक घड़ी
क्या कहूँ है कैसी भारी मुझसे कुछ पूछो नहीं
मेरी सूरत ही से सब मालूम कर लो हम्दमो
तुम हकीकत मेरी सारी, मुझ से कुछ पूछो नहीं
शाम से ता-सुब्ह जो बिस्तर पे तुम बिन रात को
मैंने की अख्तर-शुमारी, मुझ से कुछ पूछो नहीं
ऐ 'ज़फ़र' जो हाल है मेरा करूँगा गर बयाँ
होगो उनकी शर्मसारी, मुझ से कुछ पूछो नहीं
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2 comments:

anitakumar said...

बहादुर शाह जफ़र को पढ़वाने के लिए शुक्रिया। आप से इल्तजा है कि वर्ड वेरीफ़िकेशन न रखें , टिप्पणी करने में तकलीफ़ होती है…।:)

anitakumar said...

बहादुर शाह जफ़र को पढ़वाने के लिए शुक्रिया। आप से इल्तजा है कि वर्ड वेरीफ़िकेशन न रखें , टिप्पणी करने में तकलीफ़ होती है…।:)