Tuesday, July 8, 2008

अज्मल अज्मली की एक ग़ज़ल

वक़्ते-सफ़र क़रीब है बिस्तर समेट लूँ
बिखरा हुआ हयात का दफ्तर समेट लूँ
फिर जाने हम मिलें न मिलें इक ज़रा रुको
मैं दिल के आईने में ये मंज़र समेट लूँ
गैरों ने जों सुलूक किए उनका क्या गिला
फेंके हैं दोस्तों ने जों पत्थर समेट लूँ
कल जाने कैसे होंगे कहाँ होंगे घर के लोग
आंखों में एक बार भरा घर समेट लूँ
सैले-नज़र भी ग़म की तमाज़त से खुश्क हो
वो प्यास है, मिले तो समंदर समेट लूँ
'अजमल' भड़क रही है ज़माने में जितनी आग
जी चाहता है सीने के अन्दर समेट लूँ
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1 comment:

Udan Tashtari said...

अज्मल अज्मली जी गज़ल पेश करने का बहुत शुक्रिया.