Saturday, July 26, 2008

इस्लाम की समझ / क्रमशः 1.5

इस्लाम दीन है, धर्म या मज़हब नहीं
श्रीप्रद कुरआन ने जबतक यह कहा कि 'आज्ञापालन करो अल्लाह का और आज्ञापालन करो उसके रसूल का' मुस्लिम धर्माचार्यों को इस्लामी सल्तनत का कोई आधार नहीं मिल सका. यह और बात है कि मक्के के मुशरिकों का अनुमान था कि हज़रत मुहम्मद (स.) दीन के माध्यम से अरब की सल्तनत स्थापित करना चाहते हैं. मुशरिकों के प्रतिनिधि अत्बा ने कुरैश को यह सुझाव भी दिया था कि 'मुहम्मद (स.) को उसके हाल पर छोड़ दो. यदि अरब वालों ने उसका अंत कर दिया तो तुम सस्ते छूट गए और यदि उसे आधिपत्य प्राप्त हुआ तो उसकी सल्तनत तुम्हारी सल्तनत होगी." इतना ही नहीं, आगे चलकर मक्का विजय के समय जब अब्बास इब्ने-अब्दुलमुत्तलिब (र.) अबूसुफियान को, जिसने दबाव में आकर अभी कुछ क्षणों पूर्व ही इस्लाम को दीन के रूप में स्वीकार किया था, इस्लामी सेना के संयमित पंक्तिबद्ध दस्तों का मुआइना करा रहे थे, उसके मुंह से अचानक निकल गया था, "ऐ अब्बास ! (र.) तुम्हारा भतीजा तो बड़ी सल्तनत वाला हो गया." अब्बास ने तत्काल उसके मुंह पर हाथ रख दिया और कहा "धिक्कार हो तुझ पर. यह सल्तनत नहीं नबूवत है."
बात स्पष्ट है कि मक्के के मुशरिकों को ही यह आभास नहीं था, नबीश्री (स.) के जीवन काल में ही, मुसलामानों के बीच यह मानसिकता विकसित हो चुकी थी कि नबूवत का उद्देश्य इस्लामी हुकूमत स्थापित करना है. वस्तुतः यही वह बीज-बिन्दु है जिसने नबीश्री (स.) के निधनोपरांत अल्लाह के प्रिय दीन इस्लाम को, सुन्नी और शीआ जैसे दो बड़े समूहों में विभाजित करके, मज़हब में तब्दील कर दिया. और यही वह स्थल है जहाँ से इस्लाम में ‘हिकमत’ के स्थान पर राजनीति ने प्रवेश किया.
श्रीप्रद कुरआन में मुसलमानों को जब आदेश हुआ "या अयियुहल्लज़ीन आमनू अतीउल्लाह व अतीउर्रसूल व ऊलिल'अम्रि मिन्कुम" तो यद्यपि अनेक सहाबियों ने जिज्ञासावश इस आयत का वास्तविक अर्थ नबीश्री से मालूम कर लिया था, किंतु सत्ता लोलुप मुसलमानों ने, इस अर्थ को दबाकर, इसका अर्थ इस प्रकार करना प्रारंभ किया 'ऐ ईमान वालो ! अल्लाह का आदेश मानो और रसूल का आदेश मानो और उनका जो तुम में साहिबे-हुकूमत (शासक) हैं.''ऊलिल'अम्र' का ‘हुक्मरां’ या ‘शासक’ अर्थ करके मुसलमानों ने अपनी नीयत स्पष्ट कर दी. शासक तो भ्रष्ट-से-भ्रष्ट व्यक्ति भी हो सकता है. फिर अल्लाह उसके आदेशों का पालन करने के लिए ईमान वालों को क्यों आदेशित करेगा. यदि ऐसा ही था तो नबियों द्बारा मार्ग-दर्शन की आवश्यकता ही क्या थी. शीआ समुदाय ने आयत का अर्थ और उसकी व्याख्या यद्यपि पर्याप्त सीमा तक सही की, किंतु व्यवहार में वह भी, नबीश्री (स.) के सर्वप्रिय सहाबी इमाम अली (र.) में ही सही, सांसारिक सत्ता देखने के पक्षधर हैं.
ऊलिल'अम्र का अर्थ शब्द कोशों में तलाश करने से ही मेरी दृष्टि में यह ज़िदें पैदा हुईं. श्रीप्रद कुरआन में जहाँ-जहाँ 'अम्र' शब्द का प्रयोग हुआ है एक दृष्टि उसपर अवश्य कर लेनी चाहिए. जहाँ तक हुकूमत और सल्तनत का प्रश्न है श्रीप्रद कुरआन ने साफ़ शब्दों में घोषित कर दिया है"इनिल हुक्मु इल्लल्लाहि" (12/40). अर्थात अल्लाह के सिवा किसी की हुकूमत नहीं है.
श्रीप्रद कुरआन में कहा गया है "युदब्बिरुल'अम्र मिनस्समाइ इलल'अर्ज़ि" (32/5). अर्थात वह आकाश से धरती तक आदेशों की व्यवस्था करता है. यहाँ अम्र का अनुवाद कार्य भी किया गया है. किंतु यदि अम्र का अनुवाद कार्य किया जाय तो 'अल-अम्र' होने के कारण उन कार्यों की विशिष्टता रेखांकित होती है. और यह विशिष्टता अल्लाह से सम्बद्ध है. यानी यह कार्य सामान्य, रोज़मर्रा के या हमारे प्रशासनिक कार्य नहीं हैं. एक अन्य आयत में कहा गया है "यतनज़्ज़लुल'अमरु बैनहुन्न" (65/12) अर्थात उनके बीच (धरती और आकाश के बीच) उसके 'आदेश' (अम्र) उतरते रहते हैं. ऊपर की आयत को इस आयत से मिलाकर देखा जाय तो स्पष्ट हो जाएगा कि वह धरती और आकाश के बीच कार्यों की नहीं, अपने आदेशों की व्यवस्था करता है जिसके नतीजे में सारे कार्य संपन्न होते हैं. किंतु यही 'अम्र' शब्द जब श्रीप्रद कुरआन में अल्लाह के किसी प्रिय गुण से संपन्न व्यक्तियों के लिए या किसी नबी के सन्दर्भ में आता है तो इससे अभिप्राय उसके कार्य ही होते हैं. उदाहरणस्वरूप श्रीप्रद कुरआन में सात्विक (मुत्तकी) व्यक्तियों के सन्दर्भ में कहा गया है "व मयींयत्तक़िल्लाह यज'अल्लहू मिन अम्रिही युस्रन" (65/4). अर्थात जो अल्लाह के लिए तक़वा रखते हैं (सात्विकता बनाए रखते हैं), अल्लाह उनके कार्यों में सहूलत पैदा कर देता है. एक अन्य स्थल पर हज़रत लूत (अ.) के सन्दर्भ में कहा गया "व क़ज़यना इलैहि ज़ालिकल अम्र" अर्थात ‘और हमने उसके (हज़रत लूत (अ.) के) कार्यों/मामले में अपना निर्णय उसकी ओर भेजा.'
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि 'ऊलिल अम्र' का अनुवाद ‘शासक’ अथवा ‘हुक्मरां’ करना तर्क-संगत नहीं है. फिर श्रीप्रद कुरआन की इस आयत को यदि ध्यान पूर्वक देखा जाय तो और भी तथ्य सामने आते हैं. आज्ञापालन के आदेश तीन हैं.अल्लाह का आज्ञा पालन,रसूल का आज्ञा पालन और ऊलिल अम्र का आज्ञा पालन. किंतु अल्लाह को पृथक् श्रेणी में रखा गया है और रसूल तथा ऊलिल अम्र को पृथक् किंतु एक ही श्रेणी में रखकर आज्ञा पालन का आदेश दिया गया है. रसूल के गुणों से ऊलिल अम्र के गुण यदि कुछ भी भिन्न होते तो उसके लिए पृथक रूप से 'अतीऊ' (आज्ञा पालन करो) शब्द प्रयुक्त होता. ज़ाहिर है कि यह विभाजन गुणों के आधार पर है. जो गुण अल्लाह के हैं वह निश्चित रूप से रसूल और ऊलिल अम्र के नहीं हैं. किंतु रसूल (स.) और ऊलिल अम्र के गुणों में समानता है. इसलिए इनके प्रसंग में आज्ञा पालन का आदेश एक साथ हुआ है.यह ऐसा ही है जैसे आप अपने किसी अधिकारी और सहयोगियों को घर पर निमंत्रित करने के लिए कहें 'सर ! आप आज शाम को घर पर पधारने की कृपा करें और आप और आप और आप भी पधारें. इस वाक्य में एक निमंत्रण तो अधिकारी के लिए विशिष्ट है दूसरे निमंत्रण में तीन लोग शामिल हैं जो गुण और पद की दृष्टि से समान हैं. स्पष्ट यह हुआ कि ऊलिल अम्र में वैसे ही गुण होने चाहियें जो नबीश्री (स.) में हैं और अल्लाह को और उसके रसूल को भी वह उसी प्रकार प्रिय हो जिस प्रकार नबीश्री (स.) अल्लाह को प्रिय हैं, अन्यथा अल्लाह उसकी आज्ञा पालन का आदेश ही क्यों देगा.
नबीश्री के भेजे जाने का उद्देश्य यदि इस्लामी सल्तनत स्थापित करना होता और श्रीप्रद कुरआन में नबीश्री के कामों में इसकी गणना की गई होती, तो ऊलिल अम्र का भी यह दायित्व होता कि वह इस्लामी हुकूमत की व्यवस्था करे. नबीश्री के निधनोपरांत कुछ गिने-चुने सहाबियों द्वारा खलीफा का निर्वाचित किया जाना एक राजनीतिक व्यवस्था की शुरूआत तो कही जा सकती है, किंतु इस प्रक्रिया को दीन से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. मैं बार-बार यह दुहराना पसंद करूँगा कि नबीश्री जीवन-पर्यंत 'हिकमत' से काम लेते रहे, 'राजनीति' से नहीं. ऊलिल अम्र को उसके चारित्रिक गुणों,अल्लाह और रसूल से उसके नैकट्य,सद्कर्मों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता और सच्चाइयों पर डटे रहने के जीवट के आधार पर पहचाना जा सकता है, खलीफा जैसे किसी सांसारिक पद के आधार पर नहीं. सांसारिक पद मैं इसलिए कह रहा हूँ कि श्रीप्रद कुरआन में जहाँ यह पद सांसारिक नहीं है, मुझे ऐसा कोई सन्दर्भ नहीं मिलता जहाँ किसी क़ौम ने अपने लिए खलीफा का निर्वाचन किया हो. खलीफा अल्लाह का प्रतिनिधि होता है और अल्लाह को ही अपना प्रतिनधि चुनने का अधिकार भी है. खलीफा का निर्वाचन करके नबीश्री के कुछ सहाबियों ने यह साबित कर दिया कि यह पद अल्लाह प्रदत्त न होकर जनता प्रदत्त है. और जनता प्रदत्त पदों को दीन से नहीं जोड़ा जा सकता.
नबीश्री ने अपने रिश्तेदारों और सहाबियों के बीच में अपनी बातचीत में जहाँ भी खलीफा शब्द का प्रयोग किया है वह 'वसी,' 'वज़ीर,''नाइब,' 'वली' आदि अर्थों में किया है. रिसालत और नबूवत नबीश्री पर समाप्त हो गई.और जब यह पद ही समाप्त हो गया फिर उत्तराधिकार का क्या प्रश्न. वैसे भी नबूवत और रिसालत का कोई स्थानापन्न नहीं हो सकता.नबी अल्लाह की खबरें उसके बन्दों तक पहुंचाता है और रसूल अल्लाह के संदेशों से अवगत कराता है. हज़रत मुहम्मद (स.) का अन्तिम नबी होना इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि मानव जाति तक अल्लाह की सभी खबरें और सभी संदेश पहुँच चुके. वसी, वजीर, नाइब, वली इत्यादि शब्द सहयोगी के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं, शासक या हुक्मरां के अर्थ में नहीं. वजीर वह होता है जो दायित्व के बोझ को हल्का करे.
हज़रत मूसा (अ.) ने अल्लाह से प्रार्थना की "वज'अल्ली वज़ीरम्मिन अहली. हारून अखी" (श्रीप्रद कुरआन,20/29-30) अर्थात (मेरे रब) मेरे 'अह्ल' (अल्लाह की दृष्टि में सद्कर्म करने वाला सुयोग्य पात्र) में से एक को मेरा वज़ीर नियुक्त कर. मेरे भाई हारुन को.' यहाँ श्रीप्रद कुरआन के अनेक व्याख्याताओं ने 'अहली' शब्द का अनुवाद 'मेरे घर वाले' या 'मेरे परिवार वाले' किया है, जो उचित नहीं है. अपनी बात की पुष्टि में मैं श्रीप्रद कुरआन से हज़रत नूह (अ.) का उद्धरण देना चाहूँगा. प्रलय आने पर जब हज़रत नूह (अ.) का बेटा पिता के कहने पर भी कश्ती पर नहीं बैठा और पानी में डूबने लगा तो हज़रत नूह (अ.) ने अल्लाह से प्रार्थना की " व नादा नूहुंर्रब्बहू फ़क़ाल रब्बि इन्न अब्नी मिन अहली" (11/45). अर्थात 'और नूह ने अपने रब को पुकारा और कहा ऐ मेरे रब ! यह मेरा बेटा है और मेरा अह्ल है.' नूह (अ.) को अल्लाह का उत्तर मिला "या नूहु लैस मिन अह्लिक इन्नहू अमलुन गैरु सालिहिन." (11/46).अर्थात 'नूह वह तेरे अह्ल में से नहीं है. वह सदाचारी नहीं है." यहाँ बेटा होने का खंडन नहीं किया गया किंतु अहल होना स्वीकार नहीं किया गया और तर्क यह दिया गया कि उसके (नूह (स.) के बेटे के) कर्म सालिह नहीं हैं अर्थात भ्रष्ट हैं. स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी व्यक्ति केवल घर का होने के आधार पर अल्लाह की दृष्टि में ‘अह्ल’ नहीं है. अह्ल होने के लिए उसका सदाचारी होना अनिवार्य शर्त है. सदाचारी शब्द का प्रयोग मैं यहाँ 'अमलि-सालिह; अर्थात नेक कर्म या सद्कर्म करने वाले के अर्थ में कर रहा हूँ.
यहाँ मैं एक और प्रसंग की चर्चा करना चाहूँगा जिसके सन्दर्भ सुन्नी और शीआ समुदाय की प्रामाणिक पुस्तकों में साधारण से अन्तर के साथ समान रूप से उपलब्ध हैं. सन 09 हिजरी में जब श्रीप्रद कुरआन की सूरः बराअत का अवतरण हुआ, तो नबीश्री ने सूरः की आयतों को लेकर, हज के अवसर पर हज़रत अबूबक्र (र.) को मक्का जाने का आदेश दिया. किंतु उसके बाद ही नबीश्री को अल्लाह का संदेश प्राप्त हुआ कि आप उन्हें वापस बुला लीजिये और इन आयतों को लेकर या तो आप स्वयं जायिए या अपने किसी ‘अह्ल’ को भेजिए. अल्लाह के इस संदेश के बाद नबीश्री ने इमाम अली (र.) को आदेश दिया कि वे हज़रत अबू बक्र (र.) से सूरः बराअत लेकर मक्के तशरीफ़ ले जाएँ और हाजियों के समक्ष उसकी प्रस्तुति स्वयं करें. स्पष्ट है कि अल्लाह की दृष्टि में हज़रत अबू बक्र (र.) नबीश्री के ‘अह्ल’ नहीं थे और हज़रत अली (र.) नबीश्री के भाई या दामाद होने के कारण नहीं भेजे गए बल्कि वे इसलिए भेजे गए कि वे नबीश्री के अह्ल थे और आमालि सालिह (सद्कर्म) की तराजू पर वे ही ऐसे थे जो नबीश्री का स्थान ले सकते थे. श्रीप्रद कुरआन ने ऐसी ही विभूतियों के लिए ‘ऊलिल अम्र’ शब्द का प्रयोग किया है।
ऊपर मैंने यह लिखा है कि नबीश्री (स.) ने अपने रिश्तेदारों और सहाबियों के बीच जब भी खलीफा शब्द का प्रयोग किया है उसका अर्थ कहीं भी हुक्मरान या शासक नहीं है. मैं जानता हूँ कि मेरी यह अवधारण सुन्नी और शीआ समुदायों के अनेक धर्माचार्यों को अच्छी नहीं लगेगी. किंतु मेरी दृष्टि में तथ्य यही है. मैं यहाँ दावते-ज़ुल-अशीरा का सन्दर्भ देना चाहूँगा.यह सन्दर्भ सुन्नी समुदाय की अनेक प्रामाणिक पुस्तकों में उपलब्ध है जिनमें से कुछ के नाम इस प्रकार है.1. शेख अलाउद्दीन अली बिन मुहम्मद बिन इब्राहीम अल-बग्दादीकृत लुबाबुत्तावील फी म'आलिमुत्तन्जील जो तफसीरे-खाज़िन बगदादी के नाम से प्रसिद्ध है 2.अबीबक्र इब्नल्हुसैन अल-इमाम अल-हाफिज़ अली अल-बैहकीकृत दलाइलुन्नबूवह 3.इब्ने जरीर तबरीकृत तारीखुर्रसुल वल-मुलूक 4. इब्ने असीर जज़रीकृत तारीखे-कामिल 5. सुयूतीकृत जमउल जवामे इत्यादि.
प्रारम्भ में तीन वर्षों तक नबीश्री ने गोपनीय रूप से इस्लाम का प्रचार किया. किंतु इसके बाद जब श्रीप्रद कुरआन की यह आयत उतरी कि 'अपने निकट सम्बन्धियों को अल्लाह के अजाब से डराओ’ तो नबीश्री ने बनीहाशिम को खाने पर निमंत्रित किया जिसमें चालीस लोग आए. यद्यपि भोजन देखने में बहुत कम था पर अल्ल्लाह की कृपा से सभी ने सेर होकर खाया. भोजनोपरांत जब नबीश्री ने कुछ कहना चाहा तो अबूलहब ने उनकी बात प्रारम्भ होने से पहले सबकुछ मजाक में उड़ा दिया. दूसरे दिन फिर उन लोगों को निमंत्रित किया गया. आज वे लोग पहले की अपेक्षा कुछ नर्म थे. इसलिए नबीश्री को अपनी बातें कहने का अवसर मिल गया. नबीश्री ने कहा "ऐ बनी अब्दुल्मुत्तलिब ! मैं तुम्हारे पास कुछ लोक परलोक की नेकियाँ लाया हूँ. और अल्लाह ने मुझे इस बात के लिए आदेशित किया है कि मैं तुम्हें उसकी ओर बुलाऊं. तुम में से जो भी मेरा सहयोग देगा वह मेरा भाई, मेरा वसी और मेरा खलीफा होगा. नबीश्री ने तीन बार अपना यह वाक्य दुहराया किंतु तीनों बार अली (र.) के अतिरिक्त कोई भी तैयार नहीं हुआ. अंत में नबीश्री ने सभी को संबोधित करके कहा कि ऐ लोगो ! अली (र.) मेरा भाई, मेरा वसी और मेरा खलीफा है. तुम इसके आदेश सुनोगे और इसकी अता'अत (आज्ञा पालन) करोगे. लोगों ने यह सुनकर ठहाका लगाया और अबूलहब ने इमाम अली (र.) के पिता और नबीश्री के संरक्षक हज़रत अबूतालिब (र.) पर चोट की 'लो तुम्हें आदेश दिया गया है कि तुम अपने बेटे के आदेशों का पालन करो."
ध्यान रखना चाहिए कि यह प्रारंभिक दिनों की बात है जब कुछ गिनती के लोगों ने ही इस्लाम दीन स्वीकार किया था. उस समय न कोई सत्ता थी, न कोई फौज थी न कोई प्रशासन. ऐसी स्थिति में खलीफा का अर्थ हुक्मरान या शासक किस प्रकार किया जा सकता है. स्पष्ट है कि यहाँ खलीफा का अर्थ सहयोगी, सहकर्मी या आज की शब्दावली में स्पोक्समैन से है. शासक हुकमरान या उत्तराधिकारी से नहीं.
********************क्रमशः

3 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

बहुत ही सुंदरतम शैली में लिखी हुई ज्ञानवर्धक और सुंदरतम जानकारी। ऐसे ज्ञान से परिचित होना बहुत ही सौभाग्य की बात है। आपका शुक्रिया- इस बड़े काम के लिए।

rakhshanda said...

बहुत बेहतरीन ढंग से आपने अपनी बात कही है...बहुत खुशी हुयी पढ़ कर...शुक्रिया..

परमजीत बाली said...

आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं।जानकारी के लिए आभार।कृपया इस का अन्तर सझाएं-"इस्लाम दीन है, धर्म या मज़हब नहीं "दीन और धर्म या मजहब में क्या फर्क है?
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