Monday, July 21, 2008

राहत इन्दौरी की दो गज़लें

[ 1 ]
कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं
रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं
मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहाँ
थाम ले कोई मेरा हाथ कुझे होश नहीं
आंसुओं और शराबों में गुजारी है हयात
मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं
जाने क्या टूटा है, पैमाना कि दिल है मेरा
बिखरे-बिखरे हैं खयालात मुझे होश नहीं
[ 2]
लोग हर मोड़ पे रुक-रुक के संभलते क्यों हैं
इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं
मैं न जुगनू हूँ, दिया हूँ न कोई तारा हूँ
रोशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यों हैं
नींद से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से
ख्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यों हैं
मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों हैं
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2 comments:

Udan Tashtari said...

क्या बात है!! बहुत खूब...आभार राहत इंदौरी जी को पढ़वाने का, हम तो उनके दीवाने हैं.

नीरज गोस्वामी said...

क्या बात है राहत इन्दोरी साहेब की...वाह..उन्हें रूबरू सुनना एक अनुभव है...
नीरज