Monday, June 30, 2008

दिनकर ने कहा था

असली सत्य [ 1969, दिल्ली ]
असली सत्य शून्यता है, किंतु इस सत्य को पकड़ने की कोई राह नहीं है. जिस चीज़ को तुम राह कहते हो, वह शून्यता से भिन्न कुछ-न-कुछ बनने की चेष्टा मात्र है. वह विलीयमान क्षण से आगे बढ़कर ठहरने का निष्फल प्रयास है. ईश्वर में आस्था, आत्मा की अमरता, मोक्ष और निर्वाण - ये सब चालाकी के नाम हैं. नास्तिकता और वैज्ञानिक भौतिकवाद भी चालाकी ही है. हाँ उनके साथ बाँझ निश्चितता और आक्रामक दुराग्रह लगे हुए हैं.
एअर-कंडीशंड पोएट [1969, कानपुर ]
श्रीमती संतोष महेन्द्रजीत सिंह को लगा मैं आराम से नहीं हूँ. आज वे कह बैठीं -"आप एअर-कंडीशंड पोएट हो गए" मैं ने कहा " हाँ, वहाँ दिल्ली में एअर-कन्डीशन में रहता हूँ, ट्रेन में ए.सी. में चलता हूँ और कविता भी ठंडी लिखने लगा हूँ. आपके मजाक में भी सच्चाई है.
कविता [ 1970, दिल्ली ]
कविता जीवन का पुष्प है. वह पुष्प जो शिखर पर खिलता है, फुनगी पर खिलता है. जिसे यह फूल चुनना हो, वह शिखर से ध्यान हटाकर दाहिने या बाएँ नहीं मुड़ेगा. जिन्हें आत्मज्ञान हो चुका है, उन्हें ही कविता लिखनी चाहिए. मगर तब संसार में कविता की मात्रा कितनी न्यून हो जायेगी. न्यून हो जाय वह भी अच्छा है. इन्फ्लेशन होने से कविता का मूल्य बिल्कुल घट गया है.
कविता का लक्षण [ 1971, पटना ]
कविता का एक बड़ा लक्षण यह है कि वह आत्मा की शान्ति को भंग करे. आत्मा के शान्ति-भंग में एक आनंद है, जिसे सुसंस्कृत व्यक्ति ही जानता है, जिसके ह्रदय में विचारों के हल, चल चुके हों. अगर थोड़े से लोग पीढी-दर-पीढी किसी लेखक या कवि की प्रशंसा करते रहें, तब बाकी लोग भी उसे स्वीकार कर लेंगे. साहित्य भी जनता पर ज़बरदस्ती थोपा जाता है.
गुलशन नंदा बनाम हिन्दी/उर्दू लेखन [ 1970,दिल्ली ]
गुल्शन नंदा बोले -'मैं उर्दू में लिखकर हिन्दी में उतरवाता हूँ.' मैंने पूछा आप अपने को हिन्दी का लेखक मानते हैं या उर्दू का, हालांकि दोनों भाषाएँ एक ही हैं ? नंदा जी ने कहा 'उर्दू में मैं अधिक से अधिक 15000 बिका हूँ, हिन्दी में मेरी पुस्तकें तीन-तीन लाख छपती हैं. अतएव मैं अपने को हिन्दी का ही लेखक मानता हूँ'
मनीषी-धर्म [1970, दिल्ली ]
सुविधा के साथ संधि, सुरक्षा के साथ सुलह, यह मीडियोक्रिटी है. मनीषी-धर्म नहीं. क्षण-क्षण सफलता की खोज और कीर्ति की कामना, यह भी मनीषी-धर्म के विरुद्ध है. समाज को चुनौती वे ही दे सकते हैं, जो गरीबी और असुरक्षा के लिए तैयार हों. मैं शायद मनीषी-धर्म से गिर रहा हूँ. गरीबी अब भी कबूल है, पर असुरक्षा से भय लगने लगा है.
मनीषी [ 1972, पटना ]
स्वराज्य के पूर्व तक मनीषियों का इस देश में बड़ा सम्मान था, क्योंकि मनीषी शासकों के खिलाफ आवाज़ उठाते थे. मगर अब मनीषियों का आदर बहुत कम हो गया है. जो मनीषी लेखक और कवि हैं, वे कला की सेवा तो करते हैं, लेकिन समय के जलते प्रश्नों पर अपना विचार व्यक्त नहीं करते. यह सुरक्षा की राह है और जो सुरक्षा खोजता है, जनता उसकी खोज नहीं करती. हम लोग सुरक्षा की खोज में ही मारे गए हैं.
युद्ध [1971, पटना ]
जब युद्ध आरम्भ हो जाय तब तीन विकल्प रह जाते हैं. युद्ध के साथ हो जाओ, युद्ध का विरोध करो, या युद्ध से उदासीन हो जाओ जैसे येट्स प्रथम विश्वयुद्ध से उदासीन हो गए थे. वैयक्तिक सिद्धांत के कारण कोई युद्ध का विरोध करे, तो मैं उसका आदर करूँगा, साथ नहीं दूँगा. उदासीन होना तो मेरे लिए असंभव है. किंतु युद्ध के बारे में मेरे विशवास तब परीक्षित होते, जब मैं खतरे के रेंज में रहकर युद्ध का समर्थन करता.
छायावाद का सुधरा रूप [1971, पटना ]
बच्चन, नरेंद्र, शिवमंगल,नागार्जुन, अंचल और मैं, ये सब-के-सब छायावाद से जन्मे हैं और हम लोगों के भीतर से वह धारा अब भी प्रवाहित हो रही है. किंतु यह छायावाद का सुधरा हुआ रूप है, जो धूमिल नहीं है, जन जीवन से दूर नहीं है, अनुभूति के बदले कल्पना पर आश्रित नहीं है.
राष्ट्र कवि [ 1971, दिल्ली ]
जो भी कवि राष्ट्रीय कवितायें लिखता हो, उसे राष्ट्र कवि कह देते हैं. किंतु यह काफ़ी नहीं है. प्रत्येक जाति की आध्यात्मिक विशेषता होती है, कोई सांस्कृतिक वैशिष्ट्य होता है, संसार और जीवन को देखने की कोई दृष्टि होती है. जो कवि इस दृष्टि-बोध को अभिव्यक्ति दे सके वही राष्ट्र का राष्ट्र-कवि कहलाने योग्य है... हमारे असली राष्ट्र कवि वाल्मीकि हैं, कालिदास हैं, तुलसी हैं और रवीन्द्र नाथ ठाकुर हैं,
दिनकर की डायरी से साभार

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