Tuesday, June 3, 2008

हसरत मोहानी / प्रो. शैलेश ज़ैदी

भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में हसरत मोहानी [ 1875-1951] का नाम भले ही उपेक्षित रह गया हो, उनके संकल्पों, उनकी मान्यताओं, उनकी शायरी में व्यक्त इन्क़लाबी विचारों और उनके संघर्षमय जीवन की खुरदरी लयात्मक आवाजों की गूंज से पूर्ण आज़ादी की भावना को वह ऊर्जा प्राप्त हुई जिसकी अभिव्यक्ति का साहस पंडित जवाहर लाल नेहरू नौ वर्ष बाद 1929 में जुटा पाये. प्रेमचंद के शब्दों में यदि कहा जाय तो " वे [ हसरत ] अपने गुरु [ बाल गंगाधर तिलक ] से भी चार क़दम और आगे बढ़ गए और उस समय पूर्ण आज़ादी का डंका बजाया, जब कांग्रेस का गर्म-से-गर्म नेता भी पूर्ण स्वराज का नाम लेते काँपता था." हसरत मोहानी ने मार्क्सवादी दर्शन में पराधीनता से मुक्ति के स्रोत तलाश किए. उनकी राजनीतिक चेतना उनकी रचनात्मक विलक्षण प्रतिभा से मिलकर उन रास्तों का निर्माण करने लगी जो खतरनाक ज़रूर थे किंतु ब्रिटिश राज से मुक्ति के लिए ज़रूरी थे. थामस मान की यह बात हसरत की समझ में अच्छी तरह आ गई थी कि "गैर-राजनीतिक होना किसी भी दृष्टि से गैर-प्रजातांत्रिक होने से कम नहीं है." यह निश्चित करना बहुत आसन नहीं है कि हसरत मोहानी बुनियादी तौर पर शायर थे या राजनीतिज्ञ ? उनकी शायरी राजनीति के झरने में धुली हुई थी और उनकी राजनीति उनकी रचना-धर्मिता की मोहक सुगंधों से ज़िंदगी के नए आयाम तलाश करने का हौसला प्राप्त कर रही थी. जेल में चक्की पीसना राजनीति के मार्ग का एक पड़ाव था और चक्की पीसते हुए शेर गुनगुनाना और ग़ज़ल कहना उस पड़ाव को गतिशील देखने का एक माध्यम था -
है मश्के-सुखन जारी, चक्की की मशक्क़त भी
इक तुर्फा तमाशा है, हसरत की तबीयत भी
अंग्रेज़ सरकार हसरत को लाख बंदी बना ले, हसरत की आत्मा और उनके विचारों को बंदी नहीं बना सकती. इतना दृढ़ संकल्प हसरत के बाद केवल फैज़ अहमद फैज़ में देखा जा सकता है.
रूह आजाद है, ख़याल आजाद
जिसमे-हसरत की क़ैद है बेकार
गोर्की के सम्बन्ध में लेनिन ने कहा था " वह स्वभाव से राजनीतिज्ञ नहीं था किंतु उसे मात्र एक रचनाकार भी नहीं कहा जा सकता. उसकी राजनीतिक चेतना पूरी तरह जागृत थी और व्यावहारिक राजनीति में उसकी सरगर्मियां उसे राजनीतिकों की पंक्ति में भी खड़ा कर देती हैं" ठीक यही बात हसरत मोहानी के लिए भी कही जा सकती है. स्वभाव से वे एक संत थे, विचारों से साम्यवाद के पक्षधर और चरित्र से एक धर्मनिष्ठ मुसलमान. यह एक ऐसी त्रिवेणी थी जिस से इंक़लाब की धारा का फूटना लाज़मी था.
गोर्की को दिसम्बर 1905 में कारागार के कष्टों से मुक्ति के लिए रूस से भाग कर स्वीडेन और डेनमार्क होते हुए जर्मनी में शरण लेनी पड़ी थी. किंतु हसरत के इन्क़लाबी संस्कारों में पलायन के लिए कोई स्थान नहीं था. उनकी दृष्टि में गिरफ्तारी के दुखों से उनका परिचय भी नहीं था. कारण यह था कि उनके समक्ष आज़ादी का जो लक्ष्य था वह इस दुःख को इतना छोटा कर देता था कि इसका होना न होना कोई अर्थ नहीं रखता था और फिर 'कैदे-वफ़ा' में ऐशो-आराम की सारी दौलत समाई प्रतीत होती थी -
मायए-इशरते-बेहद है गमे-कैदे-वफ़ा
मैं शानासा भी नहीं रंजे-गिरफ्तारी का
हसरत मोहानी का विश्वास था कि जिस व्यक्ति ने देश की आजादी जैसे बड़े उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया हो वह क़ैद की बंदिशों में भी हमेशा आजाद रहेगा -
आजाद हैं क़ैद में भी हसरत
हम दिल-शुदगाने-ख़ुद-फरामोश
हसरत की इन्क़लाबी सोंच भारत की मुक्ति के लिए बेचैन थी. नैराश्य इस मार्ग में अवरोधक था और हौसला इस रास्ते की बुनियादी शर्त. उनका विश्वास था कि ब्रिटिश राज जितना अत्याचार करता जाएगा, देश भक्ति की भावना उतना ही और अधिक बल पकड़ती जायेगी. उनका ख्याल था कि 'कोशिशे-जाते-खास' (आत्म-निर्भर प्रयास) की जो भूमिका है वह गैरों के संघर्ष पर तकिया करने से कहीं अधिक शक्तिशाली है.
हसरत का सम्पूर्ण जीवन स्वाधीनता प्राप्ति के उद्देश्य के लिए समर्पित था. यही कारण है कि जी तोड़ मेहनत, दुःख और पीड़ा, विपत्तियाँ और अपमान सब झेलकर भी वे हमेशा स्वयं को मंजिल से निकट और बहुत निकट महसूस करते रहे. इस महान उद्देश्य के प्रति उनका यह अटूट विश्वास जहाँ एक ओर कारागार के कष्टों से उन्हें मुक्त रखता है वहीं दूसरी ओर सत्य की जीत में उनके विश्वास को और भी गहरा देता है. उनके इन्क़लाबी स्वर में हर लम्हा एक नई शक्ति जन्म लेती है. उनके हौसले धूमिल नहीं पड़ते और उनका जीवट शत्रु के प्रबल वर्चस्व के समक्ष निर्भीक डटे रहने की प्रेरणा देता है.
मैं गल्बए-आदा से डरा हूँ न डरूँगा
ये हौसला बख्शा है मुझे शेरे-खुदा ने
हसरत के साधना मार्ग में शहीद का दर्जा बहुत ऊँचा है. उन्हें पता है की 'ज़ेबाइशे-फ़र्के-आशिक़' (आशिक़ के सिर की शोभा) के लिए दस्तारे-जूनून (दीवानगी की पगड़ी) में गम के पेवंद का होना ज़रूरी है. कदाचित इसीलिए वो किसी अत्याचार की शिकायत नहीं करते. बल्कि शुक्र अदा करते हैं -
यूं शुक्रे-जौर करते हैं तेरे अदा-शनास
गोया वो जानते ही नहीं हैं गिला है क्या.
इस स्थल पर शुक्रे-जौर अर्थात अत्याचार के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन का भाव, सौन्दर्य-बोध को एक नया अर्थ देता है और इस अर्थ की खनक एक दुसरे शेर में और भी मुखर हो उठती है-
जो चाहो सज़ा दे लो, तुम और भी खुल खेलो
पर हमसे कसम ले लो, की हो जो शिकायत भी
यहाँ शब्दों की ध्वनियाँ मस्ती और छेड़-छाड़ का रंग पैदा करती हैं. वतन की मुहब्बत से शराबोर हसरत मोहानी एक ऐसे कारसेवक हैं जो शिकवा-शिकायत करना अपने सम्प्रदाय के विरुद्ध समझते हैं-
हैं रज़ाकार तो हम पर भी बहरहाल है फ़र्ज़
शुक्रे-हक लब पे रहे, शिक्वए आदा न करें
हसरत ने अपने रस्ते का चुनाव किसी से पूछ कर नहीं किया था और राजनीति में उनकी रूचि किसी विवशता या दबाव का परिणाम नहीं थी. वस्तुतः वो सोई हुई कौम को जगाना ज़रूरी समझते थे. बी.ए. करने के बाद वो चाहते तो आसानी से एक अच्छी नोकरी कर सकते थे. किंतु उन्हें तो देश की सेवा का रास्ता पसंद था. कबीर की भांति वो 'जे घर फूंके आपना चलै हमारे साथ' के पक्षधर थे. सम्पूर्ण देश में छटपटाहट और बेचैनी के फलस्वरूप भड़कती हुई आग के शोले उनकी आंखों के सामने थे - "दहका हुआ है आतिशे-गुल से चमन तमाम." फिर क्या था हसरत को कातिल के रु-ब-रु खड़े होने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई.
1907 के उर्दूए-मुआल्ला में, जिसके वो संपादक भी थे, उन्होंने बाल गंगा धर तिलक के व्यक्तित्व पर एक ऐसा लेख लिखा जिस से सही अर्थों में स्वयं उनके व्यक्तित्व का परिचय भी मिलता है. उन्होंने लिखा था- "उन्होंने (तिलक ने) अपनी सारी उम्र और सारी हिम्मत मुल्क की खिदमत में सर्फ़ कर दी. ऐशो-आराम और मॉल को हाथ से देना बखुशी गवारा किया, पर एलान- कलमए-हक से बाज़ नहीं आए."
अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय का वह दौर जिसमें हसरत ने यहाँ शिक्षा पायी, देश भक्तों से भरा हुआ था. मुहम्मद अली जौहर, शौकत अली, राजा महेन्द्र प्रताप सब इसी दौर की पैदावार थे, और किसी की कुर्बानी और त्याग किसी से कम नहीं था. ये वो लोग थे जिन्होंने महात्मा गाँधी को भी अपने व्यक्तित्व से आकृष्ट किया.
4 जनवरी 1908 को जब हसरत को दो वर्ष की क़ैद बा मशक्क़त और पाँच सौ रूपए का जुर्माना हुआ, उनके चेहरे पर चिंता की कोई लकीर नहीं पाई गई. उनकी दूध पीती बच्ची बहुत बीमार थी, किंतु हसरत ने स्वयं को कानून के हवाले कर दिया. इलाहाबाद जेल में जब सुप्रिनटेनडेंट ने उनकी आंखों का चश्मा दाखिल दफ्तर कर दिया और उन्हें लगभग अँधा बना दिया, उन्होंने धैर्य से काम लिया और उफ़ तक नहीं की. इसी ज़माने में उनके पिता का निधन हो गया और उन्हें इस घटना की सूचना तक नहीं दी गई. जुर्माने की रक़म न भर पाने के कारण उनका दुर्लभ पुस्तकालय नीलाम कर दिया गया और रद्दी की तरह बेशकीमती पुस्तकों को ठेलों और बैलगाडियों पर लादकर ले जाया गया, किंतु हसरत के माथे पर सिल्वटें नहीं उभरीं. उन्होंने दोस्तों के सुझाव के बावजूद राजनीति से अलग होना पसंद नहीं किया. वो तिलक की भांति आज़ादी को अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मानते थे.
मुंशी प्रेमचंद ने 1930 में उनके सम्बन्ध में ठीक ही लिख था "मुसमानों में गालिबन हसरत ही वो बुजुर्ग हैं जिन्होंने आज से पन्द्रह साल क़ब्ल, हिन्दोस्तान की मुकम्मल आज़ादी का तसव्वुर किया था और आजतक उसी पर क़ायम हैं. नर्म सियासत में उनकी गर्म तबीअत के लिए कोई कशिश और दिलचस्पी न थी" हसरत मोहानी ने अपने प्रारंभिक राजनीतिक दौर में ही स्पष्ट घोषणा कर दी थी "जिनके पास आँखें हैं और विवेक है उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि फिरंगी सरकार का मानव विरोधी शासन हमेशा के लिए भारत में क़ायम नहीं रह सकता. और वर्त्तमान स्थिति में तो उसका चन्द साल रहना भी दुशवार है." कुछ ही वर्षों के अंतराल से भारत के सम्बन्ध में ऐसी ही एक घोषणा गोर्की ने भी की थी -"अब वह समय आ गया है जब भारतीयों के लिए आवश्यक हो गया है कि सामजिक और राजनीतिक रचनात्मक कार्य वे अपने हाथों में ले लें क्योंकि भारत में अंग्रेज़ी राज के दिन पूरे हो चुके हैं." रोचक बात ये है कि गोर्की के लिए गांधी आदर्श थे और हसरत के लिए लेनिन,
स्वराज के 12 जनवरी 1922 के अंक में हसरत मोहनी का एक अध्यक्षीय भाषण दिया गया है. यह भाषण हसरत ने 30 दिसम्बर 1921 को मुस्लिम लीग के मंच से दिया था- "भारत के लिए ज़रूरी है कि यहाँ प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली अपनाई जाय. पहली जनवरी 1922 से भारत की पूर्ण आज़ादी की घोषणा कर दी जाय और भारत का नाम 'यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ़ इंडिया' रखा जाय." ध्यान देने की बात ये है कि इस सभा में महात्मा गाँधी, हाकिम अजमल खां और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे दिग्गज नेता उपस्थित थे. सच्चाई यह है कि हसरत मोहानी राजनीतिकों के मस्लेहत पूर्ण रवैये से तंग आ चुके थे. एक शेर में उन्होंने अपनी इस प्रतिक्रिया को व्यक्त भी किया है-
लगा दो आग उज़रे-मस्लेहत को
के है बेज़ार अब इस से मेरा दिल
हसरत मोहानी का मूल्यांकन भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में अभी नहीं हुआ है. किंतु मेरा विश्वास है कि एक दिन उन्हें निश्चित रूप से सही ढंग से परखा जाएगा. रोचक बात यह है कि इस स्वभाव का व्यक्ति शायरी की दुनिया में अपनी रूमानी गजलों से पहचाना गया. गुलाम अली ने उनकी ग़ज़ल चुपके चुपके रत दिन आंसू बहाना याद है को अपना मधुर स्वर देकर अमर बना दिया. पाठकों की रूचि के लिए यहाँ प्रस्तुत हैं हसरत की पाँच ग़ज़लें.
[ 1 ]
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्के-उल्फ़त पर, वो क्योंकर याद आते हैं
न छेड़ ऐ हम-नशीं कैफ़ीयते-सहबा के अफ़साने
शराबे-बेखुदी के मुझको साग़र याद आते हैं
रहा करते हैं कैदे-होश में ऐ वाय नाकामी
वो दस्ते-खुद्फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं
नहीं आती तो याद उनकी महीनों भर नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
हकीकत खुल गई हसरत तेरे तर्के-मुहब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़कर याद आते हैं
[ 2 ]
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना
शेवए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुसवा करना
इक नज़र ही तेरी काफ़ी थी के ऐ राहते-जाँ
कुछ भी दुशवार न था मुझको शकेबा करना
उनको याँ वादे पे आ लेने दे ऐ अब्रे-बहार
जिस तरह चाहना फिर बाद में बरसा करना
शाम हो या के सेहर याद उन्हीं की रख ले
दिन हो या रात हमें ज़िक्र उन्हीं का करना
कुछ समझ में नहीं आता के ये क्या है हसरत
उनसे मिलकर भी न इज़हारे-तमन्ना करना
[ 3 ]
है मश्के-सुखन जारी चक्की की मशक्क़त भी
इक तुर्फा तमाशा है हसरत की तबीयत भी
जो चाहे सज़ा दे लो, तुम और भी खुल खेलो
पर हमसे क़सम ले लो ,की हो जो शिकायत भी
ख़ुद इश्क़ की गुस्ताखी, सब तुझको सिखा देगी
ऐ हुस्ने-हया-परवर, शोखी भी, शरारत भी
उश्शाक के दिल नाज़ुक, उस शोख की खू नाज़ुक
नाज़ुक इसी निस्बत से , है कारे-मुहब्बत भी
ऐ शौक़ की बेबाकी , वो क्या तेरी ख्वाहिश थी
जिसपर उन्हें गुस्सा है, इनकार भी, हैरत भी
[ 4 ]
कैसे छुपाऊं राजे-ग़म, दीदए-तर को क्या करूं
दिल की तपिश को क्या करूं , सोज़े-जिगर को क्या करूं
शोरिशे-आशिकी कहाँ, और मेरी सादगी कहाँ
हुस्न को तेरे क्या कहूँ, अपनी नज़र को क्या करूं
ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूं बसर
सब ये कुबूल है मगर, खौफे-सेहर को क्या करूं
हां मेरा दिल था जब बतर, तब न हुई तुम्हें ख़बर
बाद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूं
[ 5 ]
फिर भी है तुमको मसीहाई का दावा देखो
मुझको देखो, मेरे मरने की तमन्ना देखो
जुर्मे-नज्ज़रा पे क्यों इतनी खुशामद करता
अब वो रूठे हैं ये लो और तमाशा देखो
हम न कहते थे बनावट से है सारा गुस्सा
हंसके, लो फिर वो उन्होंने मुझे देखा, देखो
मस्तिए-हुस्न से अपनी भी नहीं तुमको ख़बर
क्या सुनो अर्ज़ मेरी, हाल मेरा क्या देखो
घर से हर वक्त निकल आते हो खोले हुए बाल
शाम देखो न मेरी जान, सवेरा देखो
खानए-जाँ में नमूदार है इक पैकरे-नूर
हसरतों आओ रूखे -यार का जलवा देखो
सामने सब के मुनासिब नहीं हम पर ये अताब
सर से ढल जाय न गुस्से में दुपट्टा देखो
मर मिटे हम तो कभी याद भी तुमने न किया
अब मुहब्बत का न करना कभी दावा देखो
******************

2 comments:

पंकज शुक्ल said...

जनाब हसरत मोहानी पर बहुत ही उम्दा जानकारी वाला ये लेख है। अलीगढ़ आने पर आपसे भेंट करने की कोशिश करूंगा।

कहा सुना माफ़,
पंकज शुक्ल

DUSHYANT said...

behatareen piece of writing....regards