Wednesday, June 4, 2008

सूफ़ी दोहे / प्रो. शैलेश ज़ैदी

हिन्दी सूफ़ी काव्य का अध्ययन केवल प्रेमाख्यानाकों के प्रकाश में किया गया. कुछ तो जानकारी की कमी और कुछ उसके प्रति विशेष लगाव का न होना इस अध्ययन के मार्ग में बाधक रहा. वासुदेव शरण अग्रवाल का प्रयास मलिक मुहम्मद जायसी की रचनाओं को समझने में सहायक अवश्य हुआ, किंतु अन्य अध्येता पद्मावत को अन्योक्ति और समासोक्ति की बहसों में उलझा कर उसके मर्म पर निरंतर आघात करते रहे. कथा-काव्य को एक विधा के रूप में मान्यता देकर हिन्दी के सभी कथा काव्यों का अध्ययन एक साथ किया जाना चाहिए था. इस स्थिति में 'राम चरित मानस' का अध्ययन भी इसी विधा के अंतर्गत किया जाता. किंतु हिन्दी के वैष्णव आलोचक इसे स्वीकार नहीं कर सकते थे. प्रेमाख्यानक काव्यों के स्पर्श से मानस के अशुद्ध हो जाने का खतरा था. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी में राम काव्य की कोई ठोस परम्परा न होने के बावजूद, मानस के लिए एक पृथक पहचान तलाश ली और तुलसी के अध्ययन को सनातन धर्मी वैष्णव आस्थाओं की तुष्टि का केन्द्र बना दिया. सूर की गोपियों और सूफियों के इश्क को दूसरे दर्जे का साबित करने के मोह में इश्क को चार प्रकार का बताते हुए विवाहोपरांत के प्रेम को आदर्श माना और राम और सीता को विशिष्ट मर्यादाओं में रखकर देखने का प्रयास किया. शुक्ल जी के लिए शायद 'इश्क़' शब्द ही बिदका देने के लिए पर्याप्त था. अब वो चाहे गोपियों का 'इश्क़' हो या सूफियों का. सूरदास की गोपियों का इश्क़ मधुरा भक्ति के खाने में डाल दिया गया और सूफियों को रहस्यवाद की भूल-भुलैयों में छोड़ दिया गया. इतना ही नही एक फलीता और लगा दिया गया कि सूफियों के यहाँ ईश्वर की कल्पना नारी रूप में की गई है जो भारतीय चिंतन परम्परा से मेल नहीं खाती. काश शुक्ल जी या उनकी परम्परा के दूसरे आलोचकों ने सूफियों के दोहों की ओर ध्यान दिया होता. किंतु ऐसा शायद जान-बूझ कर नहीं किया गया.
ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक सूफियों की आध्यात्मिक गोष्ठियों में फ़ारसी शेरों का वर्चस्व था. किंतु तेरहवीं शताब्दी में हिन्दवी दोहे ग़ज़ल के शेरों की तुलना में अधिक प्रभावशाली साबित होने लगे और समां (सूफ़ी गायन-वादन) की गोष्ठियों में उनकी लोकप्रियता निरंतर गहराती गई. फ़ारसी गजलों के हिन्दवी दोहों में अनुवाद भी किए गए. हमीदुद्दीन नागौरी का ऐसा अनुवाद उपलब्ध है जिसके प्रकाश में यह निष्कर्ष निकालना अनुपयुक्त नहीं है कि फारसी ग़ज़ल के सभी गुण हिन्दवी दोहों में ऊँडेलने का प्रयास किया गया. ग़ज़ल के शेरों की तरह प्रत्येक दोहा अपने आप में स्वतंत्र अर्थ रखता था. फलस्वरूप सिद्ध कवियों का यह छंद सूफियों के माध्यम से इतना लोकप्रिय हुआ कि संतों ने ही नहीं श्रृंगार काल के सभी कवियों ने इसे अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया.
सिद्ध काव्य में दोहों का कोई एक निश्चित नियम नहीं है. सामान्य रूप से तेरह ग्यारह मात्राओं वाले दोहे अधिक प्रचलित हुए. किंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि अन्य प्रयोग नहीं किए गये. केवल अड़तालीस अक्षरी दोहों की ही भ्रमर, सुभ्रमर, शरभ, शयन, मंडोक, मर्कट, नर,हंस आदि तेईस किस्में हैं. दोहा और दोहरा में भी मात्राओं के आधार पर अन्तर किया गया. पचास अक्षरी, बावन अक्षरी, चौवन अक्षरी और छप्पन अक्षरी दोहे भी बड़ी संख्या में लिखे गए. भारत में ही नहीं पाकिस्तान में भी 'दोहा-निगारी' की परम्परा आज भी पर्याप्त लोकप्रिय है. उर्दू दोहे चौबीस मात्राओं वाले दोहों से हट कर सत्ताईस मात्राओं की एक पृथक पहचान बनाते हैं. जमीलुद्दीन 'आली' और क़तील शिफाई के दोहों को उर्दू जगत में जो सम्मान मिला है वह उल्लेखनीय है. भारत में बेकल उत्साही के दोहे भी खासे चर्चित हुए हैं. मेरा अभीष्ट यहाँ दोहों की तकनीक में जाना नहीं है. इस लिए मैं सीधे-सीधे सूफ़ी दोहों की बात करना चाहूँगा.
कबीर ने राम नामी दुपट्टा ओढ़ लिया और बिहारी ने राधा और कृष्ण के नामों का माथे पर तिलक लगा लिया. फलस्वरूप दोहा रचनाकारों में वे सौभाग्यशाली थे कि स्नातकोत्तर कक्षाओं के पाठ्य-क्रम में शामिल कर लिए गए. सिद्धों की रचनाएं ब्राह्मण विरोधी थीं और बाबा फरीद, खुसरो, रविदास, गुरुनानक, मलूकदास, रहीम आदि की रचनाएं मुख्य धारा के साहित्यिक दिग्गजों की संस्कारगत प्रकृति के बहुत अनुकूल नहीं थीं, इसलिए इनमें से कुछ एक को बारहवीं कक्षा तक प्रवेश मिल पाया. बाबा फरीद (1173-1265) के दोहे गुरु ग्रन्थ साहब में संकलित होने के कारण किसी से ढके-छुपे नहीं थे. किंतु प्राचीन काव्य के नाम पर रासो ग्रंथों को, उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध होने के बावजूद, स्नातकोत्तर कक्षाओं में पढाया गया और बाबा फरीद या अमीर खुसरो को पाठ्यक्रम में शामिल करने में झिझक महसूस की गई. वस्तुतः भक्ति काल का विभाजन ही बेढंगा है और संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचायक भी. निर्गुण और सगुण खानों में इसे बाँट कर तुलसी की इस उक्ति को "निगुनहि सगुनहि नहिं कछु भेदा" अनावश्यक चुनौती दी गई है. सच पूछा जाय तो सूफियों का इश्के-हकीकी और इश्के मजाज़ी ही निर्गुण और सगुण भक्ति का पर्याय है. सूरदास ने "अविगत गति कछु कहत न आवै" कहकर निर्गुण के महत्त्व को स्वीकारते हुए सुविधा की दृष्टि से सगुण लीला को अपनाने का तर्क दिया -"सब बिधि अगम बिचारहिं ताते, सूर सगुन लीला पद गावे."
हिन्दी आचार्यों को भक्ति काल का विभाजन करने की ही यदि ज़िद थी तो उसे 'सम्प्रदाय-मुक्त भक्ति' और 'सम्प्रदाय-बद्ध भक्ति' के खानों में बांटना चाहिए था. सम्प्रदाय-मुक्त भक्ति में सारे संत आ जाते और सम्प्रदाय-बद्ध की मुख्य रूप से दो शाखाएं की जातीं- वैष्णव-भक्ति और सूफी-भक्ति. यह विभाजन फिर भी एक तर्क रखता. किंतु अब तो जो प्रचलन है सो है. मैं यहाँ केवल इतना ही कह सकता हूँ - जो चाहे आपका हुस्ने-करिश्मा-साज़ करे.
सूफ़ी कविता का बीज-बिन्दु इश्क है जिसे अनन्य प्रेम भी कह सकते हैं. आशिक की दीवानगी इसमें रूह फूंकती है. 'मैमंता घूमत रहै, नाहीं तन की सार' वाली स्थिति ही इस इश्क को व्याख्यायित कर पाती है आशिक इस इश्क में स्वयं को इस प्रकार समर्पित कर देता है कि 'मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कछु है सो तेरा' का स्वर सहज ही गूंजने लगता है. यहाँ देवालय, काबा, मक्का, काशी इत्यादि अपना अर्थ खो बैठते हैं. शेष रह जाता है तो केवल इश्क़, और यह इश्क़ अलग अलग रंगों में नहीं बांटा जा सकता. सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने समय के लोकप्रिय सूफी दोहों में उर्दू हिन्दी भाषाओं के विकास की कडिया सहज ही तलाश की जा सकती हैं.
अब कुछ प्राचीन सूफ़ी कवियों के दोहे उद्धृत किए जा रहे हैं जिनके प्रकाश में सूफ़ी दोहों की ग़ज़ल के समकक्ष प्रचलित परम्परा को समझा जा सकता है.
बाबा फरीद [ 1173-1265 ]
साईँ सेवत गल गई, मास न रह्या देह
तब लग साईँ सेवसां, जब लग हौं सौं गेह
फ़रिदा रत्ती रत्त न निकलै, जौ तन चीरै कोय
जौ तन रत्तय रब सेओं, तिन तन रत्त न होय
मैं जाना दुःख मुज्झ कों,दुक्ख सेआये जग्ग
ऊचे चढ़ के देखया, घर घर ईहे अग्ग
हमीदुद्दीन नागौरी [ 1193-1274 ]
जो बिस्तरै तो सबै सकत, जो संकुचै तो सोय
एक पुरुख के नाम दस, बिरला जानै कोय
जोगन क्यों नहिं जानई, तिस गुन किज्जह कायं
बहल न जोगी हाथ, परतीतह आरायं
औखदि भेजन धनि गई, ओऊ हुई बिरहीन
औखदि दोख न जानई,नारी न चेतै तीन
बू अली क़लंदर [मृ0 1323 ]
सजन सकारे जायंगे, नैन मरेंगे रोय
बिधना ऐसी रैन कर, भोर कधूं ना होय
सार हिरदै नहि मानियों , पीऊ कै नहिं ठाँव
किनहु न बूझै बात ओई,धनी सुहागन नांव
अमीर खुसरो [ 1253-1325 ]
पंखा होकर मैं डुली, साती तेरा चाव
मनजहि जलते जनम गया, तेरे लेखन बाव
गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस
उज्जल बरन, अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान
देखत में तो साधु है, निपट पाप की खान
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो, मन पीऊ को दोउ भये इक रंग
यह्या मनियरी [मृ0 1380 ]
काला हंसा निर्मला, बसै समंदर तीर
पंख पसारै बिख हरै, निर्मल करै सरीर
बाट भली पर सांकरी, नगर भला पर दूर
नांह भला पर पातरा, नारी कर हिय चूर
सागर,कुएँ,पाताल जल, लाखन बूंद बिकाय
बज्र परै या मथुरा नगरी, कान्हा प्यासों जाय
शाह मीरानजी बीजापूरी [ मृ0 1496 ]
जिस मारग जिउ संचरै, सो ही मारग सार
मारग छोड़ कुमारग चले, तन का रखा बिचार
करैं जभैं वह तीरथ पट्टन, योग उभालें ध्यान
पांचों चीज़ रिया सों राखैं, क्योंकर दीजे मान
बुद्धि कहै कुछ खेल्या लोड़ी, बाचें ऐसी बात
इश्क कहै यह खेल खिलाना, सब है उसके हात
बुद्धि कहै यों तस्लिम हो ना, तू कुछ परत रहै
इश्क कहै जिउ देना बेहतर, दुःख यह कौन सहै
सय्यद मुहम्मद जौनपूरी [ 1433-1504 ]
चंदर कहै तराइन कों, सूरज देखौ आय
ऐसा भगवन बीहटे, दिष्टि पाप झर जाय
तुव रूपै जग मोहिया, चन्द तराइन भान
उनहि रूप फुनि होन कों, वाही न होवै आन
हियरो नित्त पखाल तू, कांपड़ धोय मधोय
ओझल होय नछूत सी, सुख निंदरी ना सोय
शेख बाजन [ मृ0 1506 ]
भंवरा लेवे फूल रस, रसिया लेवे बास
माली पहुंचे आस कर, भंवरा खड़ा उदास
प्रीत हिए दरवेश की, जिस देवे करतार
इस जग म्याने राज कर, उस जग उतरै पार
गौर अंध्यारी डर बड़ा, बाजन है मुफलिस
हियरा काँपै जिउ डरै, यह दुःख आखौं किस
******************

No comments: