Wednesday, June 25, 2008

कविता के हस्ताक्षर / सुमित्रा नंदन पन्त [1900-1977 ]

[ 1 ] तप रे मधुर मधुर मन
विश्व वेदना में तप प्रतिपल,
जग-जीवन की ज्वाला में गल,
बन अकलुष, उज्जवल औ' कोमल
तप रे विधुर विधुर मन !

अपने सजल-स्वर्ण से पावन
रच जीवन की मूर्त्ति पूर्णतम,
स्थापित कर जग में अपनापन
ढल रे ढल आतुर मन !

तेरी मधुर मुक्ति ही बंधन
गंध-हीन तू गंध-मुक्त बन
निज अरूप में भर स्वरुप, मन
मूर्त्तिमान बन निर्धन !
गल रे गल निष्ठुर मन !

[ 2 ] भारत माता ग्रामवासिनी
खेतों में फैला है श्यामल
धूल भरा मैला-सा आँचल
गंगा जमुना में आंसू जल
मिटटी की प्रतिमा उदासिनी !
भारत माता ग्रामवासिनी !

दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन
अधरों में चिर नीरव रोदन
युग युग के तम् से विषंण मन
वह अपने घर में प्रवासिनी !
भारत माता ग्रामवासिनी !

तीस कोटि संतान, नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन
नतमस्तक तरु-ताल निवासिनी !
भारत माता ग्रामवासिनी !

स्वर्ण शस्य पर पद-तल लुंठित
धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित
क्रंदन कम्पित अधर मौन स्मित
राहू ग्रसित शरदिंदु हासिनी !
भारत माता ग्रामवासिनी !

चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित
नमित नयन नभ वाश्पाच्छादित
आनन् श्री छाया शशि उपमित
ज्ञानमूढ़ गीता प्रकाशिनी !
भारत माता ग्रामवासिनी !

सफल आज उसका तप संयम
पिला हिंसा स्तन्य सुधोपम
हरती जन-मन भय, भव तन भ्रम
जग जननी जीवन विकासिनी !
भारत माता ग्रामवासिनी !

[ 3 ] विजय
मैं चिर श्रद्धा लेकर आई
वह साध बनी प्रिय परिचय में
मैं भक्ति ह्रदय में भर लाई
वह प्रीती बनी उर परिणय में.

जिज्ञासा से था आकुल मन
वह मिती हुई कब तन्मय मैं,
विश्वास मांगती थी प्रतिक्षण
आधार पा गई निश्चय मैं !

प्राणों की तृष्णा हुई लीन,
स्वप्नों के गोपन संचय में,
संशय भय मोह विषाद हीन,
लज्जा करुणा में निर्भय मैं.

लज्जा जाने कब बनी मान
अधिकार मिला कब अनुनय में
पूजन आराधन बने गान
कैसे ! कब ? करती विस्मय मैं.

उर करुणा के हित था कातर
सम्मान पा गई अक्षय मैं
पापों अभिशापों की थी घर,
वरदान बनी मंगलमय मैं.

बाधा-विरोध अनकूल बने
अंतर्चेतन अरुणोदय में,
पथ भूल विहंस मृदु फूल बने
मैं विजयी प्रिय, तेरी जय में.
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