Monday, June 30, 2008

एक दीवार जो गिर गई / शैलेश ज़ैदी




प्रकाशकीय टिप्पणी
यह कविता प्रो. शैलेश ज़ैदी ने अपनी पत्नी डॉ. शबनम ज़ैदी के निधन के बाद लिखी थी. यह मुझे 'शैलेश ज़ैदी का रचना संसार' शीर्षक शोध-प्रबंध लिखते समय उनके पुराने कागजों में मिली थी जहाँ से निकालकर मैंने इसे 'तलाश' हिन्दी त्रैमासिक के अंक 4 में 1999 में प्रकाशित किया था. वे इसे नितांत निजी मानते हुए इसके प्रकाशन के पक्ष में नहीं थे. किंतु मुझे इस कविता का फलक इतना विस्तृत प्रतीत हुआ कि इसमें हर व्यक्ति का दर्द मुखरित दिखायी दिया. इसकी परतों में एक पूरा इतिहास करवटें ले रहा है. तलाश के पाठकों की पसंद मुझे प्रेरित करती है कि मैं इसे पोस्ट करूँ. [ प. फ़ा.]
वो इक गुलाब जिसे रौंद डाला धरती ने
मैं उस गुलाब की रंगत संजोये बैठा हूँ.
सुगंध जिसकी खिलाती थी फूल स्वप्नों के
मैं आज स्वप्नों की चाहत संजोये बैठा हूँ.
पता नहीं मुझे, सोचा है क्या मेरे जी ने !
किसी भी तथ्य की अवहेलना करूँ कैसे
मैं जनता हूँ कि शाश्वत नहीं वसंत का रूप,
क्षणों के मोह में लिपटी हुई विसंगतियां
न देख पायीं कभी एक पल अनंत का रूप.
विचार उठते हैं मन में तो चुप रहूँ कैसे !
कभी भी काम न आई किसी के भावुकता
कहाँ से लाये कोई आज नीलकंठ का शील !
अप्राण देह में बजते हैं शब्द ऊट-पटांग,
रुदन के गीत सुनाती है आंसुओं की झील
छुपाये बैठा है मन में मनुष्य कामुकता.
करूँ जो बात कभी न्याय और समता की
तो एक टक मुझे सब देखते हैं हैरत से,
प्रलोभनों से घिरे लोग, रुख बदलते हैं,
समय ने उनको सिखाया है जुड़ना ताक़त से.
सुनाऊं किसको कथा प्यार और ममता की !
मेरे मकान की दीवारें, फ़र्श, छत, आँगन
सभी हैं मौन, सभी हैं उदास मेरी तरह,
सभी में दौड़ता है रक्त मेरे चिंतन का ,
सिमट गये हैं सभी मरे पास मेरी तरह.
सभी के साथ मैं करता हूँ चित्त का मंथन !
विहंग उड़ते हैं यादों के मेरे गाँव की ओर,
मैं देखता हूँ जो अपने शरीर को छू कर,
तो लगता है मुझे, मैं बन गया हूँ जेठ की धूप,
तपन से सूख के फट-फट गये हैं सब पोखर.
उदास शामें हैं, दिन है उदास, उदास है भोर !
नहर को काट के लाते हैं लोग खेतों में
ज़मीन प्यासी है, पानी मिले तो बोल उठे.
पड़ोसी मेंड़ें जो काटी गयीं, तो आग लगी.
कफ़न लपेटे हुए, लाठियों के गोल उठे.
लहू से फ़स्ल उगाते हैं लोग खेतों में !
असामियों को बंधे देखता हूँ रस्सी से
लगी है चोट जो कोड़ों की, पीठ सूजी है,
किसी के घर में कहीं फूटी कौडियाँ भी नहीं
ज़मीन जोतने की यह सज़ा अनोखी है !
घृणा अनाज के बदले मिली है खेती से !
न भूल पाऊंगा मैं गाँव की वो तस्वीरें
लकीरें जिनकी बनाती गयीं मुझे बागी.
पिता के स्नेह से आक्रोश मन का कम न हुआ,
ज़मीनदार के बेटे की चेतना जागी.
सहज ही तोड़ दीं मैंने, तमाम ज़ंजीरें!
मगर वो गाँव कहीं अब भी मन में बसता है
पुकारते हैं मुझे बौर मीठे आमों के
मैं छुप के बैठा हूँ बंस्वारियों के झुरमुट में
झिंझोड़ देते हैं शीतल हवाओं के झोंके
अभी भी गाँव में रहने को जी तरसता है
अलाव तापते लोगों की रस भरी बातें
किसी के घर की कहानी, किसी के प्यार की बात
कहीं नटों के तमाशे, कहीं पे नौटंकी
शहीद बाबा के बरगद पे एतबार की बात
बनावटों से बहोत दूर सब खरी बातें
मुझे है लगता, उसी गाँव की ज़मीन हूँ मैं
जभी तो लोग मेरा मोल-भाव कर न सके
मैं बार बार समय के थपेडे खाता रहा
विचार दृढ़ थे कुछ ऐसे कि जो बिखर न सके
हवाएं जैसी भी हों, अपने ही अधीन हूँ मैं
वो इक गुलाब जिसे रौंद डाला धरती ने
उसे भी गाँव से मेरे था प्यार,मेरी तरह
सदा वो गाँव रहा उसकी कल्पनाओं में
उठे थे उसके भी मन में विचार, मेरी तरह
पड़े थे उसको भी विष के कई चषक पीने
मैं उस गुलाब के सम्पर्क में जब आया था
तो जिंदगी मेरी बेढब सपाट पत्थर थी
तराशा उसने, जो पंखुरियों से मुझे अपनी
प्रत्येक साँस मेरी प्यार का समंदर थी
भविष्य सोच के मैं अपना, गुनगुनाया था
मैं जनता न था शायद, है क्या भविष्य का अर्थ
मगन था देख के निश्छल बहाव जीवन का
उमड़ रही थीं मेरे मन में कितनी तस्वीरें
सुनहरा लगता था सारा रचाव जीवन का
मैं कल्पना भी न कर पाया, होगा ऐसा अनर्थ
मनुष्य कितने विकल्पों में साँस लेता है
मगर मनुष्य की हर आस्था अधूरी है
यथार्थ जैसा भी हो, सालता है भीतर तक
ऋचाएं जैसी भी हों, वन्दना अधूरी है
तमाम उम्र कोई किसका साथ देता है !
मैं पत्थरों के नगर में बड़ा हुआ पल कर
हथेली पर मुझे अपनी, उठाया गंगा ने
चुनारगढ़ से मी मुझको चित्त की दृढ़ता
संवारा मेरे विचारों को माँ की ममता ने
उमंगें फूट पड़ीं श्वेत झरनों में ढलकर
मगर अतीत का हर दृश्य आज धुंधला है
नदी के बहने की आवाज़ तक नहीं आती
खिसक गई हैं क़िले की तमाम दीवारें
ममत्व की कहीं कोई महक नहीं आती
समझ में कुछ नहीं आता, मुझे हुआ क्या है !
पुकारती नहीं अब मुझको 'विन्ध्य' की देवी
सपाट हो गए सारे शिखर चटानों के
अंधेरों में कहीं 'कंतित शरीफ' दफ़्न हुआ
हवास उड़ गए जीवन के संविधानों के
दिखायी देती है हर चीज़ उल्टी पुल्टी सी
मैं देखता हूँ सड़क पर पड़ा हूँ मैं चुप-चाप
दबाये मुट्ठी में सूरज की आग के सपने
दहकते लोहे की चादर का सिर पे टोप धरे
चमकती आंखों में हैं शेषनाग के सपने
सिमट रही है ज़मीं मेरे गिर्द आप-से-आप
धमाका कोई हुआ दहशतों के जंगल में
लहू-लुहान हवाओं में है अजीब तनाव
घिसट रही है कहीं रोशनी की एक किरण
सुलग रहा है कहीं बेबसी का सर्द अलाव
घुला-घुला सा है विष बद हवास हलचल में
जुलूस, आगज़नी, नारे, सिसकियाँ, आंसू
स्वतंत्रता के यही अर्थ हैं ज़बानों पर
चबा चुके हैं सभी अपने हाथ बाज़ू तक
लगे हैं मेले घृणाओं के कारखानों पर
संजो रहा हूँ मैं, इतिहास से ये तारीखें
ज़मीन बँट गई, तक़सीम हो गया सब कुछ
भरी हैं रेल के डिब्बों में अनगिनत लाशें
समय ने घोल के गंगा के जल में रक्त की गंध
नदी की तह में बिछा दीं परत परत लाशें
अंधेरे दृश्यों के आँचल में खो गया सब कुछ
बुझा-बुझा सा है रावी के रूप का जादू
घुटी-घुटी सी है जमुना की साँस भीतर तक
बिलख रहा है किसी हीर के लिए रांझा
चुभी हुई है विभाजन की फाँस भीतर तक
सुबक रही है सरे-आम प्यार की खुशबू
लहू के चूल्हे पे इतिहास की पतीली है
घृणा की आंच में दुष्कांड फद्फदाते हैं
घरों के ठंडे तवे लिख रहे हैं दुःख की कथा
चमक-चमक के छुरे बिजलियाँ गिराते हैं
स्वतंत्रता ने बहुत सी शराब पी ली है
मुखौटा ओढ़ के धर्मों का पाशविकता ने
ज़मीन काट दी नफ़रत के तेज़ चाकू से
बहाव थम गया दरया के बहते पानी का
मनुष्य चीख उठा यातना की बदबू से
अमन की माला के सारे बिखर गए दाने
मैं सोचता रहा सूरज का स्वप्न धोखा था
कटी जो रात, तो काली सुबह दिखायी दी
अंधेरे फैल गए दैत्य बनके चार तरफ़
हरेक शक्ल मुसीबत-ज़दह दिखायी दी
सभी दिशाओं में बस सनसनी का पहरा था
मेरे भी घर को समय की लहर ने तोड़ दिया
पसंद आ गई चाचा को सिंध की धरती
बहेन जो सबसे बड़ी थीं, चली गयीं लाहौर
पिता ने किंतु न छोड़ी स्वदेश की मिट्टी
ये और बात है, दंगों ने मन मरोड़ दिया
अलग किया गया अश्फ़ाक़ को भगत सिंह से
न सिर्फ़ राष्ट्र बँटा, राष्ट्रीयता भी बंटी
मनुष्य मुर्दा था, जिंदा थी साम्प्रदायिकता
दिओं की राह बंटी, राह की हवा भी बंटी
विचारशील दिमागों पे लग गये ताले
फिर एक दिन तो क़यामत ही जैसे टूट पड़ी
तड़प रहा था पड़ा रामराज्य धरती पर
लहू में तर था अहिंसा की मांग का सिन्दूर
दिखा रहा था तमाशे अजीब बाज़ीगर
बिखर गई थी मनुष्यत्व की हर एक कड़ी
बढे थे जिसके क़दम प्रार्थना-सभा के लिए
गिरा ज़मीन पे, सीने पे गोलियाँ खा कर
स्वतंत्र देश ने लिख दी लाहू कि रामायण
अटक के रह गया 'हे राम' शब्द अधरों पर
कलंक 'गोडसे' था इस वसुंधरा के लिए
हवाएं मौन थीं, सुनसान धड़कनों की तरह
जमा था रक्त शरीरों में, आँख ख़ाली थी
जगह-जगह पे था सडकों पे दहशतों का हुजूम
समय ने विष से भरी पोटली उछाली थी
ख़ुद अपना साया भी लगता था रहज़नों की तरह
सभी घरों के उजालों में घुप अँधेरा था
सुलगती धुप सियाही लपेटे बैठी थी
विलापिका के करुण गीत लिख के सूरज ने
समाधि राष्ट्र-पिता की भिगो-भिगो दी थी
जिधर भी देखिये नैराश्य का बसेरा था
छटी जो धुंध तो भारत का संविधान बना
अधूरा रह गया फिर भी सवा भाषा का
सहानुभूति दलित वर्ग से जताई गई
ख़बर किसे थी ये सब ऊपरी दिखावा था
सवर्ण जो था वो कुछ और भी महान बना
कठिन था वक़्त बहुत मार्क्सवादियों के लिए
खटक रहे थे वो हिंदुत्व की निगाहों में
उदारता का सुनहरा कवच पहन कर भी
बिछा रहा था समय जातिवाद राहों में
तरस रहा था मुसलमाँ तसल्लियों के लिए
मगर था शह्र मेरा मुक्त वारदातों से
गिरह सशक्त थी आपस में भाईचारे की
लहू के दीप थे रौशन शरीर के भीतर
फटी-फटी सी थीं आँखें समय के धारे की
भजन थे हाथ मिलते नबी की नातों से
शहर में जितने थे हिन्दू सनातनी थे सभी
कहीं भी आर्यसमाजी वितंडावाद न था
सभी के मन में था वर्चस्व शांत गंगा का
कहीं भी खून-खराबा न था, फ़साद न था
विचारवान थे, संकल्प के धनि थे सभी
मैं छोड़ आया हूँ बचपन उसी फ़िज़ा में कहीं
मेरी धमनियों में बहता है रक्त गंगा का
नबी ने पायी थी भारत से ईश्वरत्व की गंध
मेरी नज़र में है इस्लाम भक्त गंगा का
अगर न होती ये गंगा, तो मैं था कुछ भी नहीं
गंगा बीच से काटती है
मेरे समूचे शहर को
और मैं गंगा को उतार लेता हूँ
अपने अन्तर में बीचों-बीच.
शहर का पूरा अस्तित्व
बँट गया है दो टुकड़ों में
जिसे जोड़ती हैं पानी में तैरती नौकाएं
बाढ़ और सूखे में गंगा एक सी नहीं रहती.
और शहर भी गंगा के सिकुड़ने और फैलने से
हो जाता है फ़ालिज-ग्रस्त.
बचपन में पहली बार
जब मैंने होश की आंखों से गंगा को देखा था
और उस तक पहुँचने के लिए
गिनी थीं अनगिनत सीढियां
मुझे लगा था
कि गंगा भी मेरी माँ कि तरह बेजुबान है
उसकी आंखों में भी डबडबाती है एक कहानी
और तैरती है एक कविता
जिससे शायद वह स्वयं भी अनजान है.
बात उस समय की है
जब गंगा कुतर रही थी,
फांक और चबा रही थी
मेरी वह पाठशाला
जो पत्थरों से निर्मित थी
और जिसमें मैं पढ़ता था.
गंगा क्यों कर रही थी ऐसा
मैं नहीं समझ पाया था
और आज ! जब मैं पाठशाला का
वहाँ निशाँ भ नहीं पाटा,
केवल गंगा को देखता हूँ बहते
मुझे लगता है कि मेरी माँ भी
गंगा की तरह बहुत भूखी थी.
उसे भी फांकने और चबाने पड़े थे
पत्थर, जीवन भर.
और वे पत्थर उस पाठशाला के थे
जो हुई थी निर्मित, स्वयं उसी के हाथों से.
कहते हैं कि पानी की चोट से घिस कर
चट्टानें बन जाती हैं महादेव.
गंगा निकलती है महादेव के अन्तर से
और गंगा के भीतर से निकलते हैं,
कितने ही महादेव.
फिर भी यह गंगा महादेव की जननी नहीं है !
ऐसा क्यों है ?
क्या मैं अपनी माँ के माँ होने को नकार दूँ ?
मेरे शरीर में दौड़ता है मेरी माँ का रक्त
और गंगा जो मेरी रग-रग में समाई है
मेरा अपना रक्त बनकर
उसका रंग और रूप और गुण
मेरी माँ के रक्त से अलग नहीं है.
और इस रक्त की चोट से -
जन्म लेते हैं मेरे शरीर के भीतर
कितने ही महादेव !
इनसे मिति है मुझे शक्ति
जीवित रहने की
गंगा की तरह सहज भाव से बहने की.
वैसे तो मेरी माँ अभी जीवित है
पर जब वह शरीर छोड़ देगी
तब भी जीवित रहेगी -
मेरे रक्त में, मेरी रगों में
और मेरे शरीर के भीतर जन्मे महादेवों की शक्ति में.
मैं अपनी माँ को गंगा से अलग करके कैसे देखूं ?
जबकि दोनों ही मेरे शरीर में एकमेक हैं
जबकि दोनों ही मेरी आत्मा हैं,
मेरा विवेक हैं.
मैं मुसलमान हूँ या हिंदू या सिख
या रखता हूँ किसी अन्य धर्म में विशवास
गंगा यह प्रश्न मुझसे कभी नहीं करती.
मैंने मुहर्रम में प्रतेक वर्ष
विसर्जित किए हैं कितने ही ताज़िये
इसी गंगा में
और हर ताज़िये के साथ मैंने विसर्जित किए हैं
लोगों की मन्नतों मुरादों के हजारों धागे
ताज़िये पर चढाये गए गुलाब और बेले के हजारों फूल
गंगा मेरे लिए पवित्र है - कर्बला की तरह
और यह कर्बला, एक तीर्थ-स्थल है
इसलिए मैंने अपनी यह वसीयत
हर समझदार व्यक्ति की डायरी में दर्ज करा दी है
कि मेरी कब्र में कर्बला की मिटटी के साथ-साथ
थोड़ा सा गंगा जल ज़रूर रख दिया जाय.
मेरे देश के लोग शायद यह नहीं जानते
कि गंगा नहीं है किसी ख़ास मज़हब की मीरास
कि वह भरती है सबमें एक समता का एहसास
और अगर वे जानते तो आज होता
मेरे समूचे देश का एक अखंड अस्तित्व.
गंगा को अन्तर के बीचों-बीच उतार पाना
नहीं है आसान
गंगा है मेरे देश का संविधान !
और मेरे देश से अलग नहीं है मेरा शहर
इस लिए मेरे शहर का संविधान भी गंगा है.
और यह गंगा सिखाती है आज़ादी का अर्थ
जुटाती है छोटे-बड़े आसरे
माँ ने भी बताया था मुझको,
जब मैं बहुत छोटा था
आज़ादी का मतलब
और मैंने लगाए थे आज़ादी के पक्ष में नारे !
गांधी और नेहरू
बन गए थे मेरे लिए आज़ादी का पर्याय
और मैं देखने लगा था उनमें
गंगा का विस्तार और माँ की ममता.
पर आज ! शायद लोग भूल गए हैं पढ़ना
गंगा के वक्ष पर लिखी भाषा
और यह भाषा मेरे बचपन में जैसी थी
आज भी है, ज्यों-की-त्यों, वैसी ही
माँ और गंगा की भाषा में
आज भी, नहीं कर पाता मैं कोई अन्तर.
मिला है मुझको यही संस्कार भाषा का
ये घर में खुसरो के आई थी हिन्दवी बनकर
कबीर ने इसी भाषा को 'बहता नीर' कहा
जवान ये हुई ग़ालिब की शायरी बनकर
विपन्न है वो, न पाये जो प्यार भाषा का
मैं कर रहा हूँ अलीगढ में जबसे अध्यापन
अतीत मेरा, मेरे साथ-साथ रहता है
शहर ये मेरे शहर से अलग-थलग क्यों है ?
यहाँ के लोगों की अपनी विचित्र माया है
मैं कर न पाया कभी उसमें प्यार का दर्शन
यहीं की धरती ने मुझसे गुलाब छीन लिया
छुपे थे साज़िशों के घोसले गुफाओं में
उफनती आहटें, संकेत दे रही थीं, मगर
मैं खो गया था कहीं रेशमी हवाओं में
झुलसती धूप ने मौसम का ख्वाब छीन लिया
मदिर सुगंधों की शहनाइयों ने दम तोड़ा
पड़ी थी कोने में जाड़े की धूप की खुरचन
दिवस की घास से लिपटी थी बूँद शबनम की
छुपी थी जिसमें अमावस की सुगबुगी धड़कन
बनाके कब्र हवाओं ने हर भरम तोड़ा
लखनऊ में एक कब्र है
लखनऊ में और भी कई एक कब्रें हैं,
लखनऊ में जगह-जगह
क़ब्रों के कई-कई बाग़ हैं, बाडियाँ हैं ,
मगर वह जो एक कब्र है,
भीड़ में रहकर भी, भीड़ से अलग,
माथे पर बिना किसी तनाव के
केवल मुस्कुराती,
निष्प्राण होने की तमाम संभावनाओं से -
बचती-बचाती,
लखनऊ को शांत आंखों से निहारती,
वह किसी नवाब की कब्र नहीं है.
उसपर घोडों के खुरों की टापों का
कोई निशान नहीं है.
उसपर लखनऊ में आए, रूमानी भूकम्पों,
राजनीतिक-गैर-राजनीतिक सैलाबों
और ज़मीन में धंसी-धंसी - हुक्मनामा जारी करती
सामंती मेहराबों का भी कोई निशान नहीं है.
उसपर खुदी हैं -
हँसी के वैदिक मंत्रों की गुलाबी ऋचाएं
आंसुओं की श्वेताम्बरी -
जिब्रईली गर्माहट से लबरेज़ आयतें
उसपर खुदे हैं - बबूल की झाडियों के बीच
अपनी पूरी ताज़गी के साथ खिलखिलाते
दो खूबसूरत फूल,
बहत्तर घंटे का कोमा,
आक्सीजन का सिलेंडर,
स्टैंड पर उलटी लटकी,
बूँद-बूँद शरीर में दाखिल होती,खून की बोतल.
उसपर खुदे हैं -
अनाडी डाक्टरों की अंधी समझ से जन्मे
दवाओं के अधकचरे नुस्खे,
प्रथम श्रेणी के ढेर-सारे प्रमाण-पत्रों के बीच
हठधर्मी से नत्थी अस्थायी नियुक्तियां.
और करीबी रिश्तेदारों'
मित्रों और प्रियजनों की ऊब
और उस ऊब के साथ छटपटाते हालात.
आप अगर लखनऊ की उस कब्र को देखेंगे
ततो न आपके होंठ हिलेंगे
न आँखें छाल्केंगी, न पलकें भीगेंगी,
बस आप एक तक देखते रहेंगे उसे -
मौन ! स्तब्ध !
शायद इसलिए कि उस कब्र से आपका गहरा रिश्ता है,
शायद इसलिए भी कि वैसी ही बहुत सी कब्रें
कहीं आपके भीतर जी रही हैं.
और आप ! उन क़ब्रों की बारूदी सुरंगों पर खड़े -
अपने फालिजग्रस्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
मैं अगर कहूँ भी
तो आप विशवास नहीं करेंगे.
और अगर आपने विशवास कर भी लिया
तो किसी से कहते डरेंगे.
सच मानिए
पहले वह कब्र मेरे अपने घर में थी
और मेरा घर,
और घर के लोग
लकड़ी के तख्तों के नीचे, बहुत नीचे उतर कर
ठहाके लगाते थे
और आपस में मिलकर गाते थे सूरदास का भजन-
"प्रभू जी मोरे अवगुन चित न धरो"
आपने भी यह भजन गाया होगा
गुनगुनाये होंगे इसके एक-एक बोल
इस तथ्य से बेखबर रहकर
कि आपके घरों में भी बहुत सारी कब्रें हैं
और आपके घर भी
इन्हीं क़ब्रों के भीतर कहीं हँसते खेलते हैं,
और थकन उतारने के लिए
गाने लगते हैं सूरदास का भजन.
अगर आप लखनऊ गए हैं
तो आपने देखा होगा
कि लखनऊ में क़ब्रों की चीखती-उजाड़ जिंदगी को
चूने और सुर्खी की तरह आपस में मिलाकर
सरिया और सीमेंट की मदद से
बहुत ऊंचा उठाकर,
सरकारी कार्यालयों में तब्दील कर दिया गया है.
और लखनऊ की इन क़ब्रों के मुर्दे
भूरी-बादामी फाइलों के बीच नत्थी
एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक चुप-चाप दौड़ते हैं.
और अपने लावारिस होने का मातम किए बगैर
बेदर्दी से एक-दूसरे पर लुढ़का दिए जाते हैं.
पर लखनऊ में वह जो एक कब्र है
जो कभी मेरे घर में थी
और जिसके भीतर मेरा घर लगाता था ठहाके
चहारबाग से जाने वाले सभी रास्ते
और उन रास्तों पर चलने वाले सभी लोग
उस कब्र से होकर गुज़रते हैं
कुछ आगे बढ़ जाते हैं
कुछ रुकते हैं, ठहरते हैं
और अपनी आंखों में उगे अग्निमंत्रों को
अंधेरों के बारूदखाने में फेक कर
किसी धमाके की प्रतीक्षा करते हैं.
आपने कई वर्षों से देखा होगा
कि आप जब आते हैं 'ईद' पर मेरे घर
तो न मैं मिलता हूँ , न मेरे बच्चे
बस एक ताला लटकता रहता है चुप-चाप !
आपने अगर लखनऊ की वह कब्र देखी होती
तो आप जानते -
कि उस कब्र के इर्द-गिर्द बैठने का नाम 'ईद' है
और यह 'ईद' सिर्फ़ लखनऊ में हो सकती है.
मैं अबतक पढ़ चुका हूँ 'ईद' की ढेर-सारी 'नमाजें'
उसी कब्र पर.
मैं नहीं जनता कि 'शरीअत' की दृष्टि में
नमाज़ का अर्थ क्या है ?
हो सकता है कि लोग मुझे काफिर समझते हों
मेरी नमाजें तो घर बैठे भी हो जाती हैं
शर्त यह है कि मैं उस कब्र को
अपने भीतर कहीं ताज़ा रख सकूँ
और अपने आँगन के फूलों कि रंगत
और खुशबू और ताज़गी को
और भी जीवंत बना सकूँ.
ताकि लोग देख सकें -
इस खुशबू और ताजगी में
अतीत की ऊर्जा से जन्मा
वर्त्तमान का चमकदार चेहरा.
ताकि लोग जान सकें
कि वह दीवार जो गिर गई
उसकी छाया आजभी मौजूद है -
उसी तरह, वैसे ही.
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