Wednesday, November 19, 2008

कल्पना के सामने बन जायेगा मिथ्या यथार्थ.

कल्पना के सामने बन जायेगा मिथ्या यथार्थ.
रुक्मिणी कुछ भी नहीं हैं, आज हैं राधा यथार्थ.
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सब की अपनी-अपनी ढपली, सब के अपने-अपने राग,
कोई क्या जाने प्रबल हो जाये कब किसका यथार्थ.
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सेतु आदम ने बनाया या बनाया राम ने,
किस मिथक में क्या पता कितना है भ्रम कितना यथार्थ.
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आस्थाएं धर्म की इतिहास से जुड़तीं नहीं,
धर्म गढ़ लेता है धीरे-धीरे मन-चाहा यथार्थ.
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सच कोई भी हो, कभी सच शाश्वत होता नहीं,
हर किसी का, ध्यान से देखें तो है अपना यथार्थ.
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झूठ को दुहराते रहिये सच बनाकर बार-बार,
एक दिन हो जायेगा यह झूठ ही सबका यथार्थ.
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1 comment:

Dr. Amar Jyoti said...

गंभीर दार्शनिक भावों की अभिव्यक्ति सरल सहज भाषा में।बधाई।