Monday, November 10, 2008

ज़हनों को ऐसा क्या हुआ आख़िर अवाम के.

ज़हनों को ऐसा क्या हुआ आख़िर अवाम के.
हैराँ हूँ फ़र्क़ मिट गये क्यों सुब्हो-शाम के.
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फैलाए बाँहें देर से मंज़िल है मुन्तज़िर,
ऐ रह-रवाने-शौक़! बढो दिल को थाम के.
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नफ़रत में और उल्फ़ते-दुनिया में इश्क़ है,
रिश्ते हैं इनके जैसे शराब और जाम के.
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वो ख़ुद-ग़रज़ है और वो बे-लौस है तो क्या,
बस फ़ासले हैं दोनों में दो-चार गाम के.
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मैंने समन्दरों को भी पाया न मुत्मइन,
शिकवे उन्हें भी लोगों के हैं इज़्दहाम के.
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दो-चार लम्हों के लिए आया था वो फ़क़त,
नज़रें तवाफ़ करती रहीं उसके बाम के.
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1 comment:

"अर्श" said...

मैंने समन्दरों को भी पाया न मुत्मइन,
शिकवे उन्हें भी लोगों के हैं इज़्दहाम के.


bahot khub, kya bat kahi hai apane ,,umda ...

dhero sadhuwad.......