Friday, April 23, 2010

बेचैन सी हैं पलकें शायद

बेचैन सी हैं पलकें शायद।
रोई हैं बहोत आंखें शायद।
कुछ देर तो बैठें साथ कभी,
कुछ प्यार की हों बातें शायद्॥
जो शीश'ए दिल कल टूट गया,
चुभती हैं वही किरचें शायद्॥
इस बार गुज़ारिश फिर से करूं,
मंज़ूर वो अब कर लें शायद॥
कैफ़ीयते-दिल पहचानती हैं,
सहमी-सहमी यादें शायद्॥
ठहरी थीं मेरे घर में भी कभी,
महताब की कुछ किरनें शायद्॥
हर एक के दिल की धड़कन में,
कल शेर मेरे गूंजें शायद्॥
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3 comments:

शारदा अरोरा said...

बहुत सुन्दर बयान किया है ...
जो शीश'ए दिल कल टूट गया, चुभती हैं वही किरचें शायद् ...
...शायद्...

दिलीप said...

waah sundar...

नरेश चन्द्र बोहरा said...

॥ठहरी थीं मेरे घर में भी कभी, महताब की कुछ किरनें शायद्॥
हर एक के दिल की धड़कन में, कल शेर मेरे गूंजें शायद्॥
बहुत ही उम्दा. आपने लिखा ही कुछ ऐसा है कि हर एक की धड़कन में आपके शेर ज़रूर गूंजेंगे.