Sunday, April 11, 2010

निशा नीरव भी है निस्पन्द भी है / نشا نیرو بھی ہے نسپند بھی ہے

निशा नीरव भी है निस्पन्द भी है।
कि मन स्थिर भी है निर्द्वन्द भी है॥
वो मनमानी भी कर लेता है अक्सर,
वो मर्यादाओं का पाबन्द भी है॥
समय ठहरा नहीं रहता किसी क्षण,
समय गतिशील भी गतिमन्द भी है॥
न आयें किस तरह फूलों पे भँवरे,
कि अन्तस में छुपा मकरन्द भी है॥
ये पीड़ा कष्टप्रद भी है सुखद भी,
कि इस पीड़ा में कुछ आनन्द भी है॥
हमारी गुमशुदा संपन्नता का,
हमारे वस्त्र में पेवन्द भी है॥
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نشا نیرو بھی ہے نسپند بھی ہے
کہ من استہر بھی ہے نردوند بھی ہے
وہ من مانی بھی کر لیتا ہے اکثر
وہ مریاداؤن کا پابند بھی ہے
سمے ٹھہرا نہیں رہتا کسی چھن
سمے گتی شیل بھی گتی مند بھی ہے
نہ آئیں کس طرح پھولوں پہ بھنورے
کہ انتس میں چھپا مکرند بھی ہے
یہ پیڑا کشٹ پرد بھی ہے سکھد بھی
کہ اس پیڑا میں کچھ آنند بھی ہے
ہماری گم شدہ سمپنتا کا
ہمارے وستر میں پیوند بھی ہے
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4 comments:

Sadhana Vaid said...

इतनी खूबसूरत रचना में सास नन्द का पैबन्द क्यों लगा दिया आपने ? क्या आप सच में यही समझते हैं कि घर में सुख शांति सास नन्द ही भंग करती हैं ? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है ! कई घरों में परिवार के बिखरते सूत्रों को सास नन्द ही संजो कर रखती हैं ! वैसे इस अंश को छोड़ कर बाकी रचना बहुत सुन्दर है ! धन्यवाद !

Suman said...

nice

कविता रावत said...

कि अन्तस में छुपा मकरन्द भी है॥
ये पीड़ा कष्टप्रद भी है सुखद भी,
कि इस पीड़ा में कुछ आनन्द भी है॥
हमारी गुमशुदा संपन्नता का,
हमारे वस्त्र में पेवन्द भी है॥
..manobhavon ka sundar atardwandh prastut kiya hai aapne...
Bahut shubhkamnayne...

Kamlesh Kumar Diwan said...

tulnatmak bate kavita ko or shasakt banati hai.