Wednesday, April 7, 2010

फ़िक्रे-बूदोबाश है ज़जीरे-इश्क़ / فکر بود و باش ہے زنجیر عشق

फ़िक्रे-बूदोबाश है ज़जीरे-इश्क़ ।
नक़्श है दीवार पर तह्रीरे-इश्क़्॥1॥
भर गयी बुनियाद संगे-हिज्र से,
रफ़्ता-रफ़्ता हो गयी तामीरे-इश्क़्॥2॥
रंगो-रोग़न था फ़क़त दिल का लहू,
बेश-क़ीमत थी बहोत तस्वीरे-इश्क़्॥3॥
देखता है रख के अपने रू-ब-रू,
शौक़ से वो मंसबे ताबीरे-इश्क़॥4॥
लोग कह देते हैं जिसको बर्क़े-तूर,
दर हक़ीक़त है वही तनवीरे-इश्क़्॥5॥
बाए-बिस्मिल्लाह से वन्नास तक,
कुछ नहीं जुज़ मंबए-तफ़सीरे-इश्क़॥6॥
सुन्नते-ख़ैरुलबशर तल्क़ीने-हक़,
सुन्नते-मुश्किलकुशा तौक़ीरे-इश्क़॥7॥
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فکر بود و باش ہے زنجیر عشق
نقش ہے دیوار پر تحریر عشق
بھر گئی بنیاد سنگ ہجر سے
رفتہ رفتہ ہو گئی تعمیر عشق
رنگ و روغن تھا فقط دل کا لہو
بیش قیمت تھی بہت تصویر عشق
دیکھتا ہے رکھ کے اپنے رو بہ رو
شوق سے وہ منصب تعبیر عشق
لوگ کہہ دیتے ہیں جس کو برق طور
در حقیقت ہے وہی تنویر عشق
باے بسم الله سے والنّاس تک
کچھ نہیں جزمنبع تفسیر عشق
سنّت خیر البشرتلقین حق
سنّت مشکل کشا توقیر عشق
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2 comments:

neelima garg said...

nice...

संजय भास्कर said...

ये समझना आसान नही .