Thursday, April 29, 2010

ख़्वबों से थक जाएं पलकें

ख़्वबों से थक जाएं पलकें।
कितना बोझ उठाएं पलकें॥
दिल की तमन्ना बर आने पर,
झूमें नाचें गाएं पलकें॥
मातम है एहसास के घर में,
बच्चे आँसू माएं पलकें॥
झपकें तो हलचल मच जाए,
ठहरें तो शरमाएं पलकें॥
आधी आधी जब खुलती हैं ,
एक क़यामत ढाएं पलकें॥
खामोशी के स्वाँग रचा कर,
बेहद शोर मचाएं पलकें॥
आँखों मे तुम आकर देखो,
देंगी ख़ूब दुआएं पलकें॥
दिल रंजीदा आँखें पुरनम,
किस किस को समझाएं पलकें॥
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4 comments:

घनश्याम मौर्य said...

बच्चे आंसू माए पलके! बहुत खूब.

संजय भास्कर said...

... बेहद प्रभावशाली

Nikita Banerjee said...

Hi,

Very nice poem. Meri Hindi mein likhne ki shamta itni achi nahi hai magar yeh bahut sundar kavita hai!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

वाह ! क्या बढ़िया ग़ज़ल है ... बहुत अच्छी लगी !
मातम है एहसास के घर में,
बच्चे आँसू माएं पलकें॥

क्या शेर है, क्या एहसास है ...