Sunday, April 11, 2010

खो जाता है मन क्यों बाल कथाओं में

खो जाता है मन क्यों बाल कथाओं में।
जादू सा है कथा सुनाती माओं में॥

परियों की संगत में उड़ता रहता हूं,
पंख से जुड़ जाते हैं मेरे पाओं में॥

उड़न खटोला आँगन में जब उतरेगा,
झूम के नाचूंगा मैं तेज़ हवाओं में॥

माँ का हाथ हो सिर पर तो चिन्ता कैसी,
फूल की ख़ुश्बू सी है माँ विपदाओं में॥

गाँव के पनघट की तस्वीरेंजीवित हैं,
गागर भर कर आती हुई घटाओं में॥
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کھو جاتا ہے من کیوں بال کتھا ؤن میں
جاد وسا ہے کتھا سنا تی ما ؤں میں
پریوں کی سنگت میں اڑتا رہتا ہوں
پنکھ سے جڑ جاتے ہیں میرے پاؤں میں
اڑن کھٹولا آنگن میں جب اترے گا
جھوم کے ناچوں گا میں تیز ہواؤں میں
ماں کا ہاتھ ہو سر پر تو چنتا کسی
پھول کی خوشبو سی ہے ماں وپداؤن میں
گاؤں کے پنگھٹ کی تصویریں جیوت ہیں
گاگر بھر کر آتی ہوئی گھٹاوں میں
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3 comments:

Kamlesh Kumar Diwan said...

bahut sundar rachana hai,badhai.

सुमन'मीत' said...

बचपन होता ही ऐसा है कि भूलाए नहीं भूलता

Shekhar kumawat said...

bahut kub

http://kavyawani.blogspot.com/

shekhar kumawat