Tuesday, May 27, 2008

बग़दादी कवयित्री नाज़िक अल-मलाइका की तीन कविताएं

अनुवाद एवं प्रस्तुति : नासिरा शर्मा
परिचय
नाज़िक अल-मलाइका का जन्म बग़दाद में 1923 में हुआ. बी.ए. की डिग्री 1943 में 'हायर टीचर्स ट्रेनिंग कालेज' बग़दाद के अरबी विभाग से प्राप्त की. उनकी प्रख्यात रचनाओं में 'रात के आशिक', 'चिंगारी और राख,'चाँद पेड़,' 'समुद्र का रंग विशेष उलेख्य हैं. कुवैत विश्वविद्यालय में 1969 से अध्ययन-अध्यापन में व्यस्त नाज़िक की वह कविताएं जो बग़दाद की तबाही पर चार-पाँच दशक पूर्व लिखी गई थीं,उन्हें पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे आज का बग़दाद कवयित्री की आँखों के सामने रहा हो. इन कविताओं में निरंतर संघर्ष की जो चिंगारी है, वह साबित करती है कि सम्पूर्ण क्षेत्र में बड़ी शक्तियों का नंगा नाच कब से चल रहा है और आम आदमी नस्ल-दर-नस्ल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में जुटा हुआ है. राजनीतिक पृष्ठभूमि से अलग भी यह कविताएं उस दुःख-दर्द को हम से रूबरू कराती हैं जो हर इंसान के दिल में किसी-न-किसी रूप में मौजूद है और वह जीवन-पर्यंत उससे छुटकारा प्राप्त करने के लिए छटपटाता रहता है.
1, वह कोना
वह है हमारी रातों को दुःख-दर्द देने वाला
उसी ने तो भर दी है जागते रहने की शक्ति
हमारी आंखों के प्यालों में.
हमने उसे पाया बारिश की एक सुबह राह चलते
थपथपाया उसका कंधा
और दे दिया प्यार का एक छोटा सा कोना
जो धड़कता है हमारे दिल में
अब वह नहीं छूटता है या होता है ओझल
एक क्षण को भी हमारी आंखों से
वह पीछा करता रहता है
हर दिशा में हमारा अपने पूरे वजूद के साथ.
काश ! हमने उसे एक बूंद भी न दी होती
उस नीली सुबह में
जो देता है हमारी रातों को दुःख-दर्द
साकी
जिसने भर दी है हमारी आंखों में
जागते रहने की शक्ति.
२. अंततः कहाँ से
कहाँ से आ खड़ा होता है दुःख-दर्द हमारे सामने
अंततः कहाँ से ?
यह सहयात्री है हमारे स्वप्नों का
इसने युगों से दिशा दी है हमारे गीतों को
कल हम इसके साथ चले बल खाती जलतरंगों में
हमने फिर इसे तोडा और बिखेर दिया
झील की लहरों में बिना एक बूंद आंसू टपकाए
और बिना कोई आह भरे.
हमने सोंचा कि हम बच गए
और अब चोट न पहुँचेगी हमें कभी
नैराश्य कभी छीन नहीं पायेगा हमारी मुस्कान.
अब नहीं बोए जायेंगे हमारे गीतों में कड़वे अनुभवों के बीज.
हम तक निश्चय ही पहुँच गया वह सुगन्धित लाल गुलाब
जिसे भेजा है हमारे महबूब ने सात समुद्र पार से
इसे हम किसका संकेत समझें
खुशी का या शांति का ?
मगर यह क्या !यह तो मुरझाया और गिर गया
गर्म प्यासे आंसुओं के साथ
और हमारी उदास उँगलियों को भिगो गया
अपने सुरों से.
हम तुम्हें प्यार करते हैं, ऐ हमारे दुःख दर्द
कहाँ से आ खड़ा होता है दुःख-दर्द हमारे सामने
अंततः कहाँ से ?
यह सहयात्री है हमारे स्वप्नों का
इसने युगों से दिशा दी है हमारे गीतों को
कल हम इसके साथ चले बल खाती तरंगों में
हमारे होंठों पर इस कि प्यास है
जो हमें सींचती है और हमें देती है ज़िंदगी.
3. उदास गीतों में
ऐ हमारे प्यार के दुःख !
पौ फटते ही हमने तुम्हें बनाया अपना हाकिम
और तुम्हारी रुपहली बलिबेदी पर झुका दिया अपना सर
जलाई लोबान और धूप बत्ती
हमने पूजा की तुम्हारी
और गाए गीत बेबिलोनियाई सुरों में
हमने बनाए तुम्हारे मन्दिर
सुगंधों में बसी दीवारों से
और उसके फर्श पर छिड़का जैतून का तेल
ताज़ा शराब और जलते आंसू
अपनी लम्बी-लम्बी रातों में हमने जलाई हैं तुम्हारे लिए
खजूर की शाखें, अपने दुःख और रोटियाँ
बंद होंठों से हमने गीत गए
तुम्हें आवाज़ दी और मन्नतें मांगीं
नशे में चूर बेबीलोन से
खजूर के दरख्त, रोटी, शराब और खिले हुए गुलाब की.
हमने तुम्हारी आंखों के लिए तपस्या की
बलि दी
और हमने गर्म और उपयोगी आंसुओं के मोती चुने
जिस से बनाए सुमिरनी के दाने
आह तुम !जिसके हाथों ने हमें गीत दिए,लय दी
तुम वह आंसू हो जिसने हमें सद्बुद्धि दी
तुम झरना हो चेतना का, परिपक्वता का, उपजाऊपन का
कृपाशीलता का और लाभप्रद आक्रोश का
हमने तुम्हें जिया है अपने स्वप्नों में
अपने उदास गीतों की हर लय में
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