Tuesday, May 6, 2008

मेज़ो कवितायें / प्रस्तुति : नासिरा शर्मा

परिचय
मेज़ोरम भारत का मात्र एक प्रांत ही नहीं, ये रंग-बिरंगी दुनिया और मीठी आवाज़ों वाला इलाका भी है. यहाँ लोकगीतों का खजाना है. लौशायी कबीला जो यहाँ गवय्या कबीला भी कहलाता है, संगीत उसकी रगों में खून की तरह बहता है. मेज़ोरम की पहली कवयित्री हम्वाकी थीं जिन्हें उनके गाँव वालों ने ज़िन्दा दफ़ना दिया था कारन केवल इतना था की यह महिला हर विषय पर कविता रचती है. यहाँ मेज़ो कवयित्रियों की तीन कवितायें प्रस्तुत हैं.
1.टूटे सपने और सूखी हड्डियाँ /माल्सोम रआत ज़ाली जेकब
टूटे सपने, सूखी हड्डियाँ,
बस यही है मेरे पास
कौन क्या करेगा इन दो वस्तुओं का ?

क्या कभी धूरा भी प्रशंसा भरे गीत गा सकता है ?
क्या सूखी हड्डियाँ भी
तालियाँ बजा नृत्य कर सकती हैं ?
फिर भी जाने क्योंमन को प्रतीक्षा रहती है.

इस राख के ढेर में
संयोग से
कहीं कोई फोएनेक्स
तो नहीं दफ़न है.?
२. बारिश के बाद / नाल्थियांग लेमी ज़ोत
चिडियां अपनी चहचहाहट से घोषित करती हैं
कि वे ऊंचा बहुत ऊंचा उड़ सकती हैं.
पूरे संतोष के साथ
अपनी पत्तियां निकालते हैं लंबे वृक्ष
नन्ही घास.

पहाड़ दूर हैं और आसमान ऊपर,
ताजगी फैली है जहाँ तक जाती है दृष्टि
बारिश के बाद.
प्रकृति अपने धुले हरियाले कपडों के संग
भर देती है मिठास हवाओं में

बादल की गरज और बिजली की चमक से प्रकृति
डराती है हमें अपना रौद्र रूप दिखा कर
कुछ ऐसा ही भयानक तूफ़ान
इस समय उठा है मेरे मन में
जिसने मेरे ह्रदय को
दुःख और उदासी से भर दिया है.

मेरे स्थिर मस्तिष्क पर दस्तक देता है
अक्सर यह मुहावराहर
बादल में छुपी होती है आशा की किरण
यह बहुत बड़ी चुनौती है
जिसका डटकर सामना करना है
फिर क्यों बैठी हो तुम
बिना संघर्ष के, यूं चुपचाप ?

क्या प्रकृति के पास नहीं है
इस प्रश्न का कोई उत्तर ?
दक्ष हाथों ने रची है विभिन्नता से सजी यह धरती.
अभी देर नहीं हुई है इस से कुछ सीखने में
एक सुंदर संसार पा लेना अपने भीतर
बारिश के बाद.

3. मूर्ख गया नरक में / मोना ज़ोत
उसने स्थान चुना
और लगाया ठीक उस स्थान पर
क्रॉस का निशान
लाया एक कुर्सी
ताके रख सके उसे वहां.

उसने रस्सी कसी
ऊपर छत की कड़ी में
और डाला फन्दा अपनी गर्दन में
पैर से धक्का दे गिराया
कुर्सी को ज़मीन पर
और अब वह गया नरक में
यही कर पाया वह
(अपनी माँ के अनुसार)
अपनी पूरी ज़िंदगी में
इकलौता अच्छा काम.

1 comment:

राजीव रंजन प्रसाद said...

इन रचनाओं की प्रशंसा करते हुए इस दुर्लभ प्रस्तुति के लिये आपका आभार...

***राजीव रंजन प्रसाद