रविवार, 2 अगस्त 2009

हिंदी साहित्य को मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान [1200 ई0 से 1850 ई0 तक] /प्रोफ़ेसर शैलेश ज़ैदी

विषय रोचक भी है और चिंताजनक भी. रोचक इस दृष्टि से है कि इसमें मुस्लिम साहित्यकारों के विदेशी होने का एहसास अपने पूरे नैरन्तर्य के साथ बना हुआ है । यदि वे भी हिन्दू हो चुके होते तो भारतीय होना उनकी स्वाभाविक प्रकृति समझ ली जाती। अपने मूल की दृष्टि से जो लोग शक, तातारी, हूण, मंगोल आदि थे और आक्रमणकारियों के रूप में विदेशों से आये थे, अपनी पहचान खो कर, हिंदुत्व के साथ घुल-मिल जाने के कारण उनका विदेशीपन विलुप्त होगया और वे विशुद्ध भारतीय समझे जाने लगे। इसलिए उनके योगदान पर पृथक रूप से कोई चर्चा कभी नहीं की गयी । यहीं से यह विषय चिंताजनक भी हो जाता है ।

1947 में रेलवे स्टेशनों पर हिन्दू पानी और मुस्लिम पानी के बोर्ड लगे रहते थे। यानी ज़मीन से निकलने वाला पानी, पिलाने वालों के धर्मानुकूल हिन्दू और मुसलमान हो जाया करता था। साहित्य और भाषा को भी धर्मों में बाँट कर देखना एक ऐसी ही अलगाववादी मानसिकता का संकेत है। उन्नीसवीं शताब्दी में यह मानसिकता इस प्रकार जड़ पकड़ती गयी कि हिंदी हिन्दुओं की भाषा और उर्दू मुसलामानों की भाषा के रूप में स्वीकार की जाने लगी [1] और बेचारा हिन्दुस्तान बिना किसी भाषा के गूंगा बन कर रह गया। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में पंडित प्रताप नारयण मिश्र के "जपौ निरंतर एक ज़बान / हिंदी हिन्दू हिन्दुस्तान"[2] जैसे मादक महामंत्र ने विद्वानों की सोच का धरातल ही बदल दिया। साहित्येतिहास जब लिखा गया तो बंटवारे की यह मानसिकता प्रखर रूप में दिखाई दी । सिद्ध, नाथ, जैन, संत, सूफी आदि नामों से, साहित्य को लेखकों की धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप बांटा गया और भक्ति काव्य की मुख्य-धरा से अलग, हाशिये पर रख कर उनका मूल्यांकन किया गया ।. यानी हमारा अभीषट सिद्धों, नाथों, सूफ़ियों, सन्तों, जैनियों आदि को पढ़ना रह गया, साहित्य को नहीं।

हिंदी साहित्य की मुख्य-धारा के दावेदार तथाकथित मठाधीशों ने अछूतों की तरह बरते जाने वाले इन रचनाकारों को अपने विशाल और भव्य भवन में बित्ता भर जगह देकर अपनी उदारता पंजीकृत कराते हुए गर्व से गर्दन टेढी कर ली। कबीर को स्वीकार किया गया तो रामनामी दुपट्टे में वैष्णवत्व की भीनी-भीनी सुगंध डालकर और कंठी, माला, तिलक और मोरपंख से अलंकृत कर के। उनकी अलिफ़ नामा शीर्षक रचना को प्रामाणिक मानते हुए भी कबीर-ग्रथावली में कहीं स्थान नहीं दिया गया।[3] रसखान की चर्चा की गयी तो इस छौंक-बघार के साथ कि अंतिम दिनों में वे वैष्णव धर्मावलम्बी हो गए थे, जबकि रसखान के नबीश्री हज़रत मुहम्मद तथा हज़रत अली की प्रशंसा में भी पद उपलब्ध हैं [4]। रहीम का गुणगान किया गया तो रामचरित मानस के प्रशंसक के रूप में। रोचक बात यह है कि इन मान्यताओं को किसी ठोस प्रामाणिकता के बिना स्वीकार भी कर लिया गया। मुसलमानों को धार्मिक दृष्टि से अमानवीय समझने के साथ ही स्वधर्म-वर्चस्व का भाव इतना गहरा था कि आचार्य शुक्ल जैसे गंभीर आलोचक ने भी जायसी का विवेचन करते हुए त्रिवेणी में लिख दिया –“कुतुबन ने मुसलमान होते हुए भी अपनी मनुष्यता का परिचय दिया। गोया मनुष्यता का मुसलमानों से कोई रिश्ता ही नहीं है।

हिन्दी भाषा के विकास में भी मुसलमानों की जो सशक्त भूमिका रही है, उसे बहुत हलकेपन से लिय गया। 18वीं शताब्दी के अन्त तक इलाक़ाई बोलियों से इतर भारत में जितनी भी मान्य साहित्यिक भाषाएं थीं उनकी पहचान किसी भी प्रान्त, इलाक़े या धर्म के आधार पर नहीं थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दवी, हिन्दी, देहलवी, भाखा, रेख्ता, उर्दू आदि ऐसी ही भाषाएं थी। इस दृष्टि से दकनी पहली भाषा कही जा सकती है जिसने अपनी पहचान इलाक़े के आधार पर बनाने का प्रयास किया। संभवतः इसी लिए उसका साहित्य दक्षिण की चौहद्दियां नहीं लांघ पाया। आज जिन भाषाओं को हम ब्रज या अवधी के नामों से जानते हैं, उनके रचनाकारों ने 18वीं शती के लगभग अन्त तक उनका ब्रज या अवधी होना कभी स्वीकार नहीं किया । जो रचनाकार फ़ारसी साहित्य और भाषा के संस्कारों से जुडे थे और अपनी रचनाएं नस्तालीक़ [वर्तमान उर्दू लिपि] में लिखते थे, वे अपनी भाषा को हिन्दवी/हिन्दी, और देहलवी कह्ते थे। जिन रचनाकारों पर संस्कृत के संस्कारों का प्रभाव था और जो अपनी रचनाएं नागरी या कैथी लिपि में लिखने के अभ्यस्त थे, वे अपनी भाषा को भाखा कह्ते थे। बाबा फ़रीद [1173-1265 ई0], हमीदुद्दीन नागौरी [1193-1274 ई0], बू अली क़लन्दर [मृत्यु 1323 ई0], अमीर खुसरो [1256-1325 ई0], यह्या मनयरी [मृत्यु 1380 ई0], शम्स बलखी [1325-1386 ई0], मुल्ला दाऊद [रचना काल 1380 ई0],शेख मंझन, मलिक मुहम्मद जायसी आदि इसी हिन्दवी के कवि थे। हिन्दवी में ब्रज या अवधी जैसी कोई विभाजक रेखा नहीं थी।

अमीर खुस्रो ने स्वयं अपनी भाषा को हिन्दवी कहा है। मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूनी ने चन्दायन की भाषा को हिन्दवी कहा [5]। नुसरती ने शेख मंझन के सम्बंध में लिखा है- ह्ज़ारां आफ़्रीं बर शेख मंझन / ज़शेरे-हिन्दवी बूदस्त पुर फ़न अर्थात शेख मंझन को हज़ारों बधाई कि वे हिन्दवी कव्य-रचना में सिद्धहस्त थे। मलिक मुहम्मद जायसी ने अरबी तुर्की हिन्दवी, भाषा जेती आहि। / जामें मारग प्रेम का, सभै सराहैं ताहि। लिखकर हिन्दवी में व्याप्त प्रेम तत्त्व का संकेत किया। बीजापुर के कवि बुल्बुल ने हरीरे-हिन्दवी पर कर तूं तस्वीर। / लिबासे-पारसी है पाये-ज़ंजीर। लिखकर फ़ारसी की तुलना में हिन्दवी का वर्चस्व घोषित किया। शेख शरफ़ुद्दीन अशरफ़ ने नवसिरहार [1503 ई0] में स्पष्ट लिखा बाचा कीना हिन्दवी मैंन । / क़िस्सा मक़तल शाह हुसैन्। / नज़्म लिखी सब मौज़ूं आन । यों मैं हिन्दवी कर आसान। क्लिष्ट भाषा की तुलना में आसान भाषा को तर्जीह देना संप्रेष्णीयता के महत्त्व को दर्शाता है।

अमीर खुसरो ने मसनवी नुह्सेपहर में भारत की बारह महत्त्वपूर्ण भाषाओं के साथ देहलवी की भी गणना की है [6]। निश्चित रूप से यह देहलवी हिन्दवी या भाखा से अलग एक स्वतंत्र भाषा थी। महाराष्ट के कवि अब्दुल ग़नी ने इब्राहीम आदिलशाह की प्रशंसा में इब्राहीमनामा लिखा जिसमें इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख किया कि मैं अरब और अजम [ईरान] की कृत्रिम भाषाएं नहीं जानता। मैं केवल हिन्दवी और देहलवी जानता हूं- ज़बां हिन्दवी मुझसों हौर देहलवी। न जानूं अरब हौर अजम मसनवी। स्पष्ट है कि हिन्दवी के साथ और देहलवी लिखना इस तथ्य को स्पष्ट संकेतित करता है कि देहलवी एक स्वतंत्र भाषा थी। यही भाषा, हिन्दवी/हिन्दी [जो नस्तालीक़ लिपि में लिखी जाती थी] के सहयोग से आगे चलकर उर्दू कहलायी [7]। महमूद शीरानी ने लिखा है कि शेख़ बहाउद्दीन बाजन [1388-1506ई0] ने अपनी भाषा का देहलवी होना स्वीकार किया है [8]।

मीर अब्दुल जलील [1662-1726 ई0] ने ऐसी चतुष्पदियां लिखकर जिनमें एक चरण अरबी का, एक फ़ारसी का, एक हिन्दवी का और एक तुर्की का होता था, हिन्दवी के सार्वभौमिक महत्त्व को दर्शाया था [9]। निज़ामुल्मुल्क आसफ़ जाह वज़ीर फ़र्रुखसियर बादशाह की प्रशंसा में मीर जलील ने लिखा था असीस दे के कही हिन्दवी मों यों संबत / रहे जगत में अचल बास ये वज़ीर सदा ।

हिन्दवी [नस्तालीक़ लिपि में लिखी जाने वाली भारतीय भाषा] को हिन्दी कहने का भी प्रचलन था जो आगे चलकर देहलवी/उर्दू के लिए भी जारी रहा। वसीयतुल्हादी, मनफ़िअतुल-ईमान, इर्शादनामा इत्यादि काव्य ग्रंथों के रचयिता शाह बुरहानुद्दीन जानम [1543-1590 ई0] ने लिखा था हिन्दी भाषा करूं बखान / जिह प्रताप का मुझ ग्यान । शेख अब्दुल्लाह अंसारी [रचनकाल 1663 ई0] ने इस्लामी शरीअत पर फ़िक़ए-हिन्दी शीर्षक पुस्तक लिखी जिसकी भषा को हिन्दी बताया केते मसले दीन के,अबदी कहैं अमीन्।/फ़िक़ा हिन्दी ज़बान पर, बूझो करो यक़ीन। झज्झर निवासी शेख महबूब आलम [17वीं शतब्दी ई0] ने मसाइले-हिन्दी में लिखा क़यामत के अहवाल में हिन्दी कही किताब। अथवा तलब बहुत उस यार की देखी साँची सूझ।/लिखी किताब इस वास्ते हिन्दी बोली बूझ।, मीरज़ा ग़ालिब अपनी उर्दू ग़ज़लों के लिए भी हिन्दी शब्द का प्रयोग करते थे । 30 जनवरी 1855 ई0 को सैय्यद बदरुद्दीन के नाम अपनी चिटठी में लिखते हैं आप हिन्दी और फ़ारसी की ग़ज़लें मांगते हैं, फ़ारसी ग़ज़ल तो शायद एक भी नहीं कही। हां हिन्दी ग़ज़लें क़िले के मुशायरों में दो-चार कही थीं।[10]।

स्पषट है कि ग़ालिब के समय तक आते-आते हिन्दी/हिन्दवी,देहलवी और उर्दू एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे। हिन्दवी, हिन्दी अथवा देहलवी कही जाने वाली भाषा का जो नस्तालीक़ लिपि में लिखी जाती थी, पालन-पोषण मुस्लिम साह्त्यकारों ने ही किया। 13वीं शताब्दी ई0 से ही समा [सूफ़ी गायन-वादन] की महफ़िलों में फ़ारसी शेरों की तुलना में हिन्दवी के दोहे अधिक लोकप्रियता प्राप्त कर चुके थे। हज़रत बख्तियार काकी [मृत्यु 1235 ई0] के समकालीन शेख अहमद नहरवानी हिन्दवी दोहों के प्रसिद्ध गायक थे। ख्वाजा गेसू दराज़ [मृत्यु 1422 ई0] से एक बार किसी ने समा की महफ़िलों में हिन्दवी की लोकप्रियता का कारण पूछा । ख्वाजा साहब ने उत्तर दिया हिन्दवी बडी कोमल एवं ललित भाषा है। इसमें खोलकर बात कही जा सकती है। इसका संगीत मन को अपनी ओर खींचता है। इसमें मनुष्य की दीनता, नम्रता, तथा दोषों की ओर सकेत होता है [11]।

हिन्दवी को भाखा कहने और इसे देवनागरी में लिखने वाले लेखकों की स्थिति कुछ भिन्न नहीं थी। संसकिरत है कूप जल, भाखा बह्ता नीर लिखकर कबीर ने संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा की तुलना में भाखा का वर्चस्व घोषित किया। का भाखा का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच कहकर तुलसी ने प्रेम के महत्व को रेखांकित किया। गुरु गोविन्द सिंह ने कृष्णावतार की रचना के लिए भाखा को अभिव्यक्ति का ज़रिया बनाया दसम कथा भागवत की, भाखा करी बनाय। किन्तु न तो हिन्दवी के पक्षधरों ने और न ही भाखा प्रेमियों ने अपनी भाषा को किसी क्षेत्र-विशेष से जोडा, न ही उसमें धर्म-विशेष की गंध देखने का प्रयास किया।

यहां एक बात और भी स्पष्ट कर दूं। प्रारंभ से उत्तर मध्यकाल तक हिन्दवी/हिन्दी या देहलवी के मुस्लिम साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं नस्तालीक़ लिपि में ही लिखीं। इस लिपि में एराब [स्वर-चिह्न] नहीं लगाये जाते। फलस्वरूप अध्ययन की जिज्ञासा से जब इन साहित्यकारों ने प्राचीन अपभ्रंश को नस्तालीक़ में लिप्यान्तरित किया तो तशदीद [द्वित्त्व-चिह्न] और एराब न होने के कारण अनेक शब्दों के रूप परिवर्तित हो गये और ध्वनियां भी अपेक्षाकृत कोमल हो गयीं। उदाहरण्स्वरूप हेमचंद्रकृत [1088-1172] हेमचंद्र शब्दानुशासन से अपभ्रंश के एक बहुचर्चित दोहे का पहला चरण लीजिए भल्ला हुआ जु मारिया भैंणी म्हारा कन्त। अब इसे नस्तालीक़ लिपि में लिखिए [12]। और इसी लिपि में पढिये । भल्ला शब्द भला, जु शब्द जो, भैंणी शब्द बहनी, म्हारा शब्द हमारा पढा जायेगा। अर्थात इस चरण को इस प्रकार पढेंगे भला हुआ जो मारया बहनी हमारा कन्त । यह अपभंश की तुलना में एक विकसित भाषा है और हिन्दवी से कहीं अधिक देहलवी [तथाकथित खडी बोली] के निकट है।

प्रारंभिक भरतीय मुस्लिम साहित्यकार वैचारिक दृष्टि से सूफ़ी थे और पारस्परिक प्रेम तथा सौहार्द में विश्वास रखते थे। सूफ़ियों और सिद्ध योगियों के मध्य वैचारिक आदान-प्रदान का सिल्सिला बहुत पहले से चला आ रहा था। बौद्धों के प्रति ब्रह्मणों का वह घृणा भाव जिसका उल्लेख मृच्छ कटिका के सातवें-आठवें अध्यायों में हुआ है, 9वीं-10वीं शताब्दी तक ठंडा पड चुका था। शंकर, कुमारिल और उदयन की बौद्ध धर्म विरोधी भूमिकाएं [13] भी इस समय तक लगभग अर्थहीन हो चुकी थीं। 7वीं शताब्दी की ब्राह्म्णों की यह मान्यता भी कि ब्राह्मणेतर सभी चिन्तन पद्धतियां ब्राह्मण विरोधी हैं, सिद्ध योगियों के वैचारिक सैलाब की लपेट में आ गयी थी। साधना पद्धतियों में वैषम्य के बावजूद सूफ़ियों और सिद्धों के वैचारिक फलक की आधार भूमि, जीव, ब्रह्म और जगत के पारस्परिक रिश्तों से निर्मित थी। यही स्थिति जैन रचनाकारों की भी थी। हुजवेरी के प्रसिद्ध ग्रथ कशफ़ुलमहजूब से पता चलता है कि 10वीं शताब्दी ई0 में लाहौर ब्रह्मणों, बौद्धों, और सिद्ध योगियों, का केंद्र था । मुलतान की सूफ़ी खानक़ाहों में सिद्ध योगियों का आना-जाना भी था। धार्मिक आस्थाएं इनकी चाहे जो भी रही हों, कथ्य और शिल्प की दृष्टि से इनकी रचनाओं में पर्याप्त वैचारिक साम्य दिखायी देता है। प्रारंभिक सूफ़ी कवियों ने मसनवियाँ अथवा कथा काव्य नहीं लिखे। उनकी हिन्दवी रचनाएं दोहों की शक्ल में ही उपलब्ध हैं । फिर भी अब्दुर्रहमान कृत 'संनेह रासउ' [सन्देश रासक] को, जिसकी रचना 1213 ई० के आस-पास हुई, प्रेमाख्यानक पर आधारित एक विरह काव्य कहा जाना चाहिए। प्रेम-विह्वल विरहिणी का सन्देश ही इसका मूल विषय है.[14] इस ग्रन्थ से यह भी पता चलता है कि प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं पर भी मुस्लिम रचनाकारों ने अधिकार प्राप्त कर लिया था। जैन मंदिरों के संग्रहालय से सन्देश रासक की पांडुलिपियों का प्राप्त होना यह संकेत करता है कि तत्कालीन जैन रचनाकारों की सूफ़ियों की रचनाओं में गहरी रूचि थी।

तेरहवीं शताब्दी ई० से पूर्व की किसी भी मुस्लिम रचनाकार की कोई छुट-पुट रचना भी उपलब्ध नहीं है. किन्तु इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए की मुसलमानों ने, जबकि दसवीं शताब्दी में ही लाहौर अनेक सूफी चिंतकों का केंद्र बन चुका था, अपभ्रंश या हिन्दवी में रचनाएँ नहीं कीं. सूफ़ियों के मल्फूजात और चिट्ठियों में जो दोहे उपलब्ध हैं, निश्चय ही उनमें से कुछ एक तेरहवीं शताब्दी से पूर्व के हैं. जैन और सूफी कवियों के अनेक दोहे कथ्य की दृष्टि से परस्पर मेल खाते हैं. प्रेम में संयोग वियोग की स्थितयां दोनों में ही पायी जाती हैं.

उदाहरण्स्वरूप जैन आचार्य मेरु तुंग द्वारा संपादित प्रबंध चिंतामणि [1303 ई0] से कवि मुंज का एक दोहा देखिए जिसे आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में उद्धृत किया है बाँह बिछुडवै जाहि तौँ , हौँ तै देइं कौ दोस । / हिया ठिए जइ नीसरहि, जानौँ मुंज सरोस । अब फ़रहंगे-आसफ़िया के प्रथम खंड से इसी युग के एक मुस्लिम रचनाकार का लगभग इसी आशय का एक दोहा प्रस्तुत है बाँह छुडाए जात है, निबल जानि के मोहि। / हिर्दय में से जाय तो, मरद बदूंगी तोहि। मुस्लिम रचनाकारों के यहाँ प्रेम का यही आदि बीज निरन्तर फलता फूलता रहा।

प्रारंभिक मुस्लिम साहित्यकारों ने जिनका आम जनता से सीधा सरोकार था, धर्माचार्यों के पौरोहित्य और शरीअत आधारित संकीर्ण जकड़नों से आम जनता को मुक्त करने का प्रयास किया, और प्रेम के माध्यम से उनके ईश्वर-भीरु हृदय में विश्वास जगाकर उन्हें सुषुप्तावस्था से निकाला। प्रेम ही एक ऐसा बीज तत्त्व था, जिसके माध्यम से जहाँ एक ओर मनुष्य और मनुष्य के बीच की खाईं पट सकती थी, वहीं दूसरी ओर परम सत्ता से नैकट्य की भी संभावनाएं बनती थीं। अब्दुर्रह्मान [12वीं-13वीं शताब्दी ई0] से लेकर मुल्ला असदुल्लाह वजही [मृत्यु 1659 ई0] और उनके समकालीनों तक सभी मुस्लिम साहित्यकार इसी दिशा में अपने रचना कर्म को गतिशील देखने के पक्षधर थे। इस आलेख में अधिक विस्तार की गुंजाइश नहीं है, इसलिए पहले केवल 1650 ई0 तक के कुछ ऐसे रचनाकारों के उदाहरण दे रहा हूं जिनकी रचनाओं से हमारा बहुत अधिक परिचय नहीं है। ध्यान रहे कि मुग़ल काल में हिन्दवी के प्रति सम्राटों का विशेष लगाव होने के कारण फ़ारसी के अनेक प्रतिष्ठित कवियों ने भी हिन्दवी/हिन्दी को समृद्ध करने का प्रयास किया। अबुलफ़ैज़ फ़ैज़ी [जन्म 1574 ई0] की हिन्दी रचनाएं इसका ज्वलंत प्रमाण हैं।

1200 ई0 से 1650 ई0 तक की रचनाएं : एक एक उदाहरण [*]

अब्दुर्रहमान [रचनाकाल 1213 ई0]

माणुस्सदुव्वविज्जाहरेहिं णहमग्गि सूर ससि बिंबे ।

आएहिं जो णमिज्जइ तं णयरे णमह कत्तारं ।

[हे नागरजनों ! उस कर्तार को नमस्कार करो जो मनुष्यों, देवताओं, विद्याधरों और आकाश मार्ग पर गतिशील सूर्य-चन्द्र-बिम्बों तथा अन्य द्वारा नमस्कृत होता है।]

बाबा फ़रीद [1173-1265ई0]

साईं सेवत गल गई, मास न रहिया देह।

तब लग साईं सेवसाँ, जब लग हौं सो गेह।

[हसन निज़ामीकृत फ़वाइदुलफ़ुवाद [बुलन्दशहर 1855 ई0] से पता चलता है कि सिद्ध और नाथ योगी बड़ी संख्या में बाबा की ख़ानक़ाह पर एकत्र होते थे और उनसे अनेक विषयों पर बाबा की बातचीत होती थी।]

शेख़ हमीदुद्दीन नागौरी [1193-1274 ई0]

औषदि भेजन धनि गई, ओउ भई बिरहीन ।

औषदि दोस न जानई, नारि न चेतै तीन॥

[शेख़ हमीदुद्दीन पहले कवि हैं जिन्होंने अपने समकालीन सुविख्यात फ़ारसी कवि निज़ामी गन्जवी [मृत्यु 1209 ई0] की फ़ारसी ग़ज़ल का हिन्दवी में काव्यानुवाद किया]

बू अली क़लन्दर [मृत्यु 1323 ई0]

सजन सकारे जायेंगे, नयन मरेंगे रोय।

बिधना ऐसि रैन कर, भोर कधूं नहि होय॥

शेख़ फ़तहुल्लाह [हमीदुद्दिन नगौरी के पौत्र और सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक़ के दामाद]

मेरा हियरा दहदहा, जी जानै डेह जाउं ।

सागर फूंक करैला खा,खालिक़ से नेह लगाउं॥

[डेह शेख़ साहब के गाँव का नाम था जहाँ वे अपना शेष जीवन व्यतीत करने के इच्छुक थे।]

अमीर ख़ुसरो [1253-1325 ई0]

ख़ुसरो रैन सुहाग की , जागी पी के संग ।

तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग ॥

यह्या मनयरी [मृत्यु 1380 ई0]

काला हंसा निरमला, बसै समुन्दर तीर।

पंख पसारै बिख हरै, निरमल करै सरीर॥

शम्स बलख़ी [1325-1386 ई0]

बाट भली पर साँकरी, नगर भला पर दूर।

नाँह भला पर पातला, नारी कर हिय चूर॥

शेख़ अहमद अब्दुलहक़ [मृत्यु 1434 ई0]

बाझ पियारे साइयाँ, और न देखूं चुक्ख्।

जिद्धर देखूं हे सखी, तिद्धर साईं मुक्ख॥

शाह मीरानजी [ख़ुशनामा नामक काव्य के रचयिता मृत्यु 1496 ई0]

केते ग़्यान भगत बैरागी केते मुरख गँवार।

एकै जन इक मानुस कीता,एक पुरुस इक नार॥

सैय्यद मुहम्मद जौनपुरी [1423-1504 ई0]

हियरा नित्त पखाल तौं, काँपड़ धोय मधोय।

ओझल होय न छूटसै, अस निंदरी मत सोय॥

[सैय्यद मुहम्मद जौनपुरी मेहदवी सिलसिले के प्रवर्तक थे। मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने मेहदवी होने का स्पष्ट उल्लेख किया है]

शेख़ बहाउद्दीन बाजन [1388-1506 ई0]

भँवरा लेवै फूल रस, रसिया लेवै बास।

माली सींचै आस कर, भँवरा खड़ा उदास॥

सैय्यद ख़ून्दमीर [मृत्यु 1523 ई0]

एक मलामत भूख दुख, आलमगीरी बार।

चलन तमाम रसूल के, जिनके ये अख़्त्यार॥

क़ाज़ी महमूद दरयाई [ 1469-1534 ई0]

मन में गरब तूं मत करै, तुझ से हैं कई लाख।

तेरा कहना कों सुनै, महमुद सेवों माख॥

शेख़ अब्दुलक़ुद्दूस गंगोही [1455-1538 ई0]

एक अकेला साइयाँ, दुइ-दुइ कहौ न कोय।

बास फूल में एक है, कह क्यों दूजा होय॥

शेख़ पियारा [15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विद्यमान]

मुझ ही ते अति नीयरा, सखि ए मेरा कन्त।

तन मन जोबन देख मैं, सब ही आप इकन्त्॥

शेख़ शाह मुहम्मद [रचनाकाल 1530 ई0]

मृग नैनी मृगराज कटि,मृग बाहन मुख जाहि।

मृग अंगी मृग मद तिलक, मृग रीझत सुरताहि॥

मीर अब्दुल वाहिद [मृत्यु 1608 ई0]

पापहि पाप दई जब दीन्हा । नमस्कार सब देवन कीन्हा ॥

पाप कै पाप बेल सभ गावै । पाप लेन बैकुंठौ जावै

वाहिद जी पापहि तें परबस। नासी पाप बिनासी सरबस ॥

शाह अली मुहम्मद जीव [मृत्यु 1565 ई0]

ढूंढन निकली पीउ कों, आपुस गयी सो खोय।

जीव जो देखूं एक हो, मुझ बिन और न कोय॥

शाह बुरहानुद्दीन जानम [मृत्यु 1582 ई0]

पंथ अकास का व्यंगम जानै, जल का मारग मीन।

साधू का अन्त साधू जानै, दूजे को नहिं चीन॥

शेख़ अबुलफ़ैज़ फ़ैज़ी [जन्म 1547 ई0]

कहूं-कहूं थोर-थोर पात गिरै रूखन तें/कहूं-कहूं पातिन में आयी पियराई है।

कहूं-कहूं सारी पीरी पातिन बिलोकति हैं/कहूं-कहूं झरन की झर सी लगाई है।

कहूं-कहूं ठाड़े द्रुम देखियत दिगंबर से/ कहूं-कहूं कोउ-कोउ डार हरियाई है॥

फ़ैज़ यह बस होत पेखि-पेखि प्रान हा-हा/ बेगि कहौ बीर यह कौन रितु आई है॥

[यहाँ बीरबल के लिए बीर शब्द का संबोधन उल्लेख्य है]

मुबारक [जन्म 1583ई0]

कनक बरन बाल नगन लसित भाल/मोतिन की माल उर सोहे भली भाँति है।

चन्द के चढ़ाइ चारु चन्दमुखी मोहिनी सी/प्रात ही अन्हाइ पगु धारे मुसकाति है।

चूनरी बिचित्र स्याम सजिके मुबारकजू/ ढाँकि नख सिख तें निपट सकुचाति है।

चन्द्र में लपेटि के समेटि के नखत मानो/दिन को प्रनाम किये रात चली जाति है।

सैय्यद ग़ुलाम मुहम्मद रसखान [जन्म 1590 ई0]

सिंधु समान जहान के बीच में सीप बिदीथ कै राजथली है।

साईं सेवाती को बूंद परो रस को रसखान की भाँति भली है॥

नूर कौ नीर परो तहँ जाइ जहाँ अब्दुल्ल्ह जी की गली है।

पारो बिचारो निहारो सभै मिलि मोती मुहम्मद अन्त अली है।

ख़ूब मुहम्मद चिश्ती [1539-1614 ई0]

पिंगल गुन सब कह रह्या, अब उरूज़ गति आख।

मिसरे ख़ूब उनीस के जुदी-जुदी बिधि भाख॥

ख़ान मुहम्मद [मृत्यु 1619 ई0]

चिन्ता आनो पंथ की, लोहू हुआ सो जीउ।

ना जानौं किस पथ में, मुझे चलावे पीउ॥

हाजी मुहम्मद नौशा [-1551-1653 ई0]

प्यारे तन मन दोउ जला दे बेसबरी की आग।

सबर सुबूरी नौशा वा करें मस्तक जिनके भाग॥

सैय्यद निज़मुद्दीन मधनायक [जन्म 15910]

कोउ कहै चन्द के मृगंक अंक देखियत/कोउ कहै छाया छित भूतल प्रकास की।

कोउ कहै अन्धकार पीयो है सो पेखियत/कोउ कहै कालिमा कलंक उन्यास की॥

कहै मधनायक सत हर लीन्हों करतार/ताही की संवारी भामा कान्ह के बिलास की।

तादिन ते छाती छेदि परी है छपाकर की/बार-बार देखियत नीलिमा अकास की॥

सर्वेक्षण एवं निष्कर्ष

उपर्युक्त जितने भी उदाहरण दिये गये हैं, अज्ञात या अल्प परिचित कवियों की रचनाओं के हैं। कबीर, मुल्ला दाऊद, कुतुबन, मंझन, मलिक मुहम्मद जायसी, रहीम ख़ाने-ख़ाना आदि की रचनाओं से हिन्दी के लगभग सभी अध्येता भली प्रकार परिचित हैं। यह और बात है कि इन कवियों का तटस्थ एवं न्याय-संगत मूल्यांकन होना अभी शेष है। मैंने जिन कवियों के उदाहरण दिये हैं उनसे साहित्येतिहास की अनेक टूटी हुई कड़ियाँ जुड़ती हैं । यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कबीर जैसे रचनाकारों के लिए पहले से पृष्ठभूमि तैय्यार हो चुकी थी। मुल्लाओं और पंडितों की वैचारिक जकड़न से समाज को मुक्त रखने का कार्य प्रारंभ से ही ये साहित्यकार कर रहे थे। ये साहित्यकार सही अर्थों में डिस्सेन्टर्स थे । रूढ़िवादी धार्मिक चिन्तन से इनकी घोर असहमति थी। इश्क़ की आग सभी में बराबर से दहक रही थी। शायद इसलिए भी कि यह आग छोटे-बड़े, ऊंच-नीच का विभाजन नहीं करती। यह आग सत्य, निष्ठा और प्रेम के मार्ग में सूली के ऊपर भी सेज बनाने का सुझाव देती है। पुर्जा-पुर्जा होइ रहै तऊ न छाड़ै खेत के माध्यम से प्रेम के मार्ग में शहीद का दर्जा निश्चित करती है। कबीर से पहले हिन्दी में शहीदकी कोई कल्पना भी नहीं थी। कलाल, भटठी,शराब और इसके लिए सिर तक न्योछावर कर देने की आमादगी पहली बार कबीर के ही माध्यम से हिन्दी साहित्य में प्रवेश करती है। उत्तरी भारत में अनन्य भक्ति का आदि बीज इन्ही मुस्लिम रचनाकारों ने रोपा और उसकी भरपूर सिंचाई की। प्रपत्ति एव अनुग्रह का जो घोल इन मुस्लिम रचनाकारों ने तैय्यार किया, आगे चलकर भक्तिकाल का सगुण साहित्य उस से शराबोर दिखाई दिया। एक बात और स्प्ष्ट हो जाती है कि कृष्ण और गोपियों की सौन्दर्य-मूलक क्रीड़ाओं के प्रति मुस्लिम साहित्यकारों की रुचि 16 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक विकसित हो चुकी थी। किन्तु इसका आधार कृष्ण भक्ति न होकर अध्यात्मपरक था। नबीश्री के प्रवचन अल्लाहु जमीलुन व युहिब्बुल जमाल [अल्लाह सौनदर्यशील है और सौन्दर्य को प्रिय रखता है] की प्रेरणा से ये मुस्लिम कवि कृष्ण और गोपियों के इश्क़ में परमसत्ता के सौन्दर्यमूलक गूढ़ रह्स्यों का आनन्द ले रहे थे। मीर अब्दुलवाहिद [मृत्यु 1608 ई0] ने इसी तथ्य को स्पष्ट करने के उद्देश्य से हक़ाइक़े-हिन्दी नामक ग्रंथ लिखा [15]।

प्रेमाख्यानक काव्यों में विभिन्न आलोचकों ने रुचि अवश्य ली है। किन्तु उनकी दृष्टि कथानक के भारतीय अभारतीय होने, हिन्दू या मुस्लिम संस्कारों की अभिव्यक्ति का जायज़ा लेने, और इन्हें शृंगारपरक सिद्ध करने तक ही सीमित रही है।इस तथ्य पर भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया कि चन्दायन [1379 ई0] और क़ुतुबनकृत 'मृगावती'[1503 ई0] के बीच लगभग 124 वर्षों क अन्तराल क्यों है। इस बीच क्या कोई प्रेमाख्यानक काव्य नहीं लिखा गया ? इश्क़ के विवेचन को स्थूल दृष्टि से देखना भी इन रचनाओं के मूल्यांकन में बाधक रहा है। वास्तविक इश्क़ भारतीय अभरतीय नहीं होता। उसकी अपनी संस्कृति होती है।मौलाना रूम ने इस रहस्य को बहूत पहले व्यख्यायित कर दिया था- ख़ुश्तर आँ बाशद कि सिर्रे दिलबराँ / गुफ़्ता आयद दर हदीसे-दीगराँ। अच्छा यह है कि प्रियतम का मर्म दूसरों की कथाओं के माध्यम से कहा जाय।

1650 ई0 से 1850 ई0 तक के मुस्लिम साहित्यकार

16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं शताब्दी के प्रथम दो दशकों तक अनेक प्रेमाख्यानक काव्य लिखे गये। शेख़ रिज़क़ुल्लाह राजनकृत प्रेम बन, दोस्त मुहम्मद्कृत 'प्रेम कहानी', उस्मानकृत 'चित्रावली', शेख़ नबीकृत ' ज्ञानदीप,' [1614ई0], मलिक यूसुफ़कृत 'प्रेम संग्राम',[1680 ई0], नूर मुहम्मदकृत अनुराग बाँसुरीतथा इन्द्रावती, सैय्यद हसनकृत 'तेजनामा;[1685ई0], क़ासिमशाहकृत 'हंसजवाहर'[1736ई0],सैय्यद पहाड़कृत 'रस रत्नाकर', शाह नजफ़ अलीकृत 'चिंगारी[1809-1845 ई0] इत्यादि अनेक ऐसी कृतियाँ है जिनके अध्ययन से मुस्लिम साहित्यकारों के योगदान को बख़ूबी परखा जा सकता है।

17वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में प्रेमाख्यानक काव्यों से इतार, मुस्लिम साहित्यकारों की रुचि मथुरा और वृन्दावन की इश्क़िया फ़िज़ा से जो आध्यात्मिक आत्मतोष की सामग्री प्राप्त कर रही थी, वह श्रृंगारकालीन रीतिबद्ध और रीतिमुक्त काव्यों के बढ़ते रुजहान के साथ, इस दिशा में अग्रसर दिखायी दी। राधा और कृष्ण अपनी दिव्य अलौकिक लीलाओं के आवरण से निकलकर रा्ष्ट्रीय धरातल पर स्वच्छन्द खड़े प्रतीत हुए। कविता को लौकिक प्रेम के अनुभवगत फलक पर रंगीनियाँ बिखेरने का एक बहाना सा मिल गया। जहाँ देव,मतिराम,चिन्तामणि, बिहारी घनानन्द आदि ने लक्षण ग्रंथों और मुक्त स्वच्छन्द रचनाओं से काव्य की समृद्धि में अपनी ज़बर्दस्त भूमिका पंजीकृत की, वहीं उसी के समानान्तर मुस्लिम साहित्यकारों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह और बात है कि उनके मूल्यांकन में हिन्दी आलोचकों ने वह दिल्चस्पी नहीं दिखायी जिसकी उनसे अपेक्षा थी। सैय्यद बरकत उल्लाह 'पेमी' [1659 0] की महत्व्पूर्ण काव्य-कृति 'पेमप्रकाश' [रचनाकाल 1698 0] की प्रकृति अपने युग की काव्य प्रवृत्तियों को रेखांकित करती है जहाँ भक्तिकालीन चिन्तन का अभी अवसान नहीं हुआ था और श्रृंगारकालीन सोच पनपने लगी थी। वे जप [तस्बीह] की घास, तपस्या [इबादत] के बाँस, और सत्य धर्म की थूनी से प्रेम नगर में एक ऐसी 'राम मड़ई' का निर्माण करते हैं जो ध्यान [मुराक़ेबा]और ज्ञान [इरफ़ान]के बधनों से बांधी गयी है और जिसमें दुख का ताप और पाप की आँधी का प्रवेश सभव नहीं है। [16] मीर अब्दुल जलील [जन्म 1650 ई] की रचनाएं विशेष रूप से उनके बरवै भाषा की सहजता और नायिका की मनोदशा के स्वभावगत सारल्य को रेखांकित करते हैं -'भले गइन पनघटवा पनिया लेन।/जल न भरी गगरिया भरि गये नैन। या 'कसकन कासों कहिए कसक न कोय।/कस-कस होत करेजवा कस कस होय।[17]

रीतिकालीन आचार्यों की परम्परा में हरदोई जनपद के बिलग्राम नामक एक छोटे से नगर में ही कम-से-कम चार ऐसे मुसलमान कवि हुए जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। सैय्यद रहमत उल्लाह [1650-1706 ई0] के 'पूर्ण्ररस' नामक ग्रथ का उल्लेख भर मिलता है किन्तु आचार्य चिन्तामणि को काव्यकुल कल्पतरु में अनन्वय अलंकार के लक्षण स्वरूप रचित दोहे में कवि रहमत के सुझाव पर जो संशोधन करना पड़ा[18] उससे पता चलता है कि काव्यशास्त्र में इनकी पैठ कितनी गहरी थी। सैय्यद निज़ामुद्दीन मधनायक [जन्म 1591 ई0] के कव्य-ग्रंथ 'मधनायक श्रृंगार' में यद्यपि रस और नायक-नायिका भेद का विधिवत निरूपण नहीं हुआ है फिर भी इन प्रसंगों के शास्त्रीय महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।[19].जहाँ तक सैय्यद ग़ुलाम नबी रसलीन [1699-1750ई0]के आचार्यत्त्व का प्रश्न है रीतिकाल के सभी विशेषज्ञों ने उसे स्वीकर किया है। रसप्रबोध में उनका रस विवेचन और नायक-नायिका भेद निरूपण कई दृष्टियों से मौलिक भी है और तर्कयुक्त भी। 'अमी हलाहल मद भरे, स्वेत श्याम रत्नार' वाला दोहा एक ल्म्बे समय तक बिहारी के नाम से चर्चित रहा, किन्तु जब यह तथ्य सामने आया कि इस दोहे के रचयिता सैय्यद ग़ुलाम नबी रसलीन हैं, हिन्दी के अध्येताओं को आश्चर्य भी हुआ और रसलीन के विषय में जानने की उत्सुकता भी बढ़ी । मुहम्मद आरिफ़ जान [1710-1773ई0] का उल्लेख हिन्दी के किसि भी साहित्येतिहास में नहीं है । किन्तु उनके 'रसमूरत','अंग शोभा',मदन मूरत और मंगल चरन ऐसे ग्रंथ हैं जो कवि जान के आचार्यत्त्व का स्पष्ट संकेत करते हैं।

सम्राट औरग्ज़ेब को कव्य और कला का विरोधी स्वीकार किया जाता है, जबकि वह स्वयं हिन्दी में 'आलमगीर' और 'शाह औरंगज़ेब' उपनामों से कविताएं रचता था।[20]। उसने हिन्दी कवियों को अपेक्षित प्रोत्साहन भी दिया । कवि वृन्द को उसकी ओर से प्रति दिन दस रूपये पुरस्कार स्वरूप मिलते थे [21]। वृन्द के अतिरिक्त ईश्वर, सामन्त, कृष्ण, कालिदास,मीरज़ा रौशन ज़मीर 'नेही',निज़ामुद्दीन मधनायक, मीर अब्दुल जलील,हिम्मत खां मीर ईसा 'मीरन' आदि अनेक हिन्दी कवियों को उसका आश्रय प्राप्त था। रघुनाथ तथा ईश्वरदत्त आदि संस्कृत कवि भी उसके आश्रय में थे। सम्राट ने अपने ज्येष्ठ पुत्र आज़म शाह को हिन्दी काव्य की शिक्षा देने का समुचित प्रबंध किया था। मीरज़ा ख़ाँ ने इसी उद्देश्य से 'तुहफ़तुलहिन्द' नामक ग्रंथ की रचना की थी। सम्राट की पुत्री ज़ैबुन्निसा भी हिन्दी की एक अच्छी कवयित्री थी।

अन्त में किसी निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले दो मुस्लिम कवियों का उल्लेख आवश्य करना चाहूंगा । पहले कवि हैं मीर ईसा मीरन [मृत्यु 1681 ई0] जिन्हें सम्राट औरंगज़ेब ने हिम्मत ख़ाँ की उपाधि से सम्मानित किया था और जो सम्राट के राज्य काल में उन्नति करते-करते इलाहाबाद के गवर्नर नियुक्त हुए। समयुगीन हिन्दी कवियों को उन्होंने जितना अधिक प्रोत्साहित किया उसका कोई दूसरा उदाहरण दुर्लभ है। गुणशील कवि और कलाकार प्रत्येक दिशा और क्षेत्र से इनकी सेवा में उपस्थित होते थे और योग्यतानुसार पुरस्कृत किये जाते थे।[22] हिन्दी कवि श्रीपति भटट पर उनकी विशेष कृपा थी। श्रीपति ने उन्ही की प्रेरणा से 'हिम्मत प्रकाश' नामक ग्रंथ की रचना की। कवि बलबीर और कृष्ण को तो मीर ईसा का आश्रय ही प्रप्त था [23]। मीर ईसा ;मीरन; के 'नख-शिख' नामक केवल एक ग्रंथ का उल्लेख मिलत है। उनकी रचनाओं में प्रभावोत्पादकता है जहाँ संपूर्ण चित्र पहले हलकी-हलकी लकीरों से उभरता है और फिर यह लकीरें जब एकत्र होती हैं तो सभी रेखाएं एकदम से गहरी हो उठती हैं।[24]।

दूसरे कवि हैं मीरज़ा रौशन ज़मीर 'नेही' [मृत्यु 1656 ई0]। पच्चीस वर्ष की अवस्था में ईरान से भारत आकर सम्राट औरंगज़ेब के शाही मंसबदारों में शामिल होना और शीघ्र ही हिन्दवी सीखकर उसपर अधिकार प्रप्त कर लेना साधारण बात नहीं थी। मीरज़ा ने फ़ारसी भाषा में एक रुबाई रचकर सम्राट औरंगज़ेब के पास भेजी जिसे पढ़कर बादशाह इतना मुग्ध हुआ कि उसने पुरस्कार स्वरूप मीरज़ा को सात हज़ार रूपए प्रदान किये [25]। मीरज़ा रौशन ज़मीर को संस्कृत भाषा पर भी अधिकार था। उन्होंने अहोबलकृत 'संगीत पारिजात' का फ़ारसी भाषा में अनुवाद करके अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन किया।[26]। मुहावरों और लोकोक्तियों से अलंकृत मीरज़ा रौशन ज़मीर नेही की कव्य भाषा सरल, सहज और प्रभावक है।[27]।सम्राट औरंगज़ेब के पुत्र मुअज़्ज़म के आश्रय में आलम ने रीतिमुक्त स्व्च्छन्द कविताओं की रचना की और पर्याप्त लोकप्रिय हुए। हिन्दी कविता की यह स्वच्छन्द धारा रीति कवियों से कुछ भिन्न अपनी पहचान बना रही थी।

1850 ई0 तक तनाव मुक्त रहते हुए हिन्दी के मुस्लिम साहित्यकार काव्य रचना में सक्रीय रूप से मग्न थे। हिन्दी आलोचकों ने किसी रचना में अल्लाह रसूल जैसे श्ब्दों को देख कर भले ही ऐसी कविताओं से परहेज़ किया हो, और वैष्णवेतर आस्थाओं को पाठयक्रम में रखना उन्हें अच्छा न लगा हो, पर इन संकीर्णताओं से ऊपर उठकर यदि देखा जाय तो अनेक ऐसे मुस्लिम कवि हैं जो हिन्दी साहित्य के इतिहास को समृद्ध करते हैं और उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।मैं यहाँ कुछ कवियों की रचनाओं से केवल एक-एक उदाहरण दे रहा हूं-

क़ाज़ी अब्दुलग़फ़्फ़र [रचनाकाल 1705 ई0]

भेजा पोथी प्रेम की नाँव धरा क़ुरअन्।

मानक माथ समाइके आपै माजै आन॥

मीर जाफ़र ज़टल्ली [मृत्यु 1713 ई0]

भूख गए भोजन मिलै, जाड़ा गए क़बाय।

जोबन गए तिरिया मिलै, तीनों देओ बहाय॥

बलहे शाह [मृत्यु 1757 ई0]

उसका मुख इक जोत है, घूंघट है संसार ।

घूंघट में वह छुप गया, मुख पर आँचल डार॥

मीरज़ा मुहम्मद रफ़ीअ सौदा [मृत्यु 1781 ई0]

ले-ले तेरा नाम अब, रोती हूं दिन रैन ।

ऐसा बैरी कौन था, जिसने छीना चैन ॥

[सौदा की गणना उर्दू के प्रसिद्ध कवियों में की जाती है।]

शाह आयत उल्लाह जौहरी मृत्यु [1796 ई0]

जिसका बाबा मर गया, छूरी खाय हुसैन ।

तिसका बेटा आबिदीं, रोवत है दिन रैन्॥

जुरअत [मृत्यु 1810 ई0]

नींद भूख औ सुख गया, दुख पर दुख हम पाय।

किस बिपता में पड़ गये, पड़ी आँख की हाय ॥

नज़ीर अकबराबादी [1735-1830 ई0]

देह सुमन तें ऊजरी, मुख तें चन्द लजाय।

भौहें धनुकी तान कें, कमलन तान चलाय॥

शाह नियाज़ बरेलवी [मृत्यु 1834 ई0]

दरस भिकारी जग में होके दर्शन भिच्छा पाऊं ।

तन मन जोबन उनपर वारूं तब मैं न्याज़ कहाऊं॥

बहादुर शाह ज़फ़र [1775-1862 ई0]

मोहे है यह सकत कहाँ जो तुमसे लगाऊं लाग।

आपही तुमने मोह लगाया, धन-धन मेरे भाग्॥

उपर्युक्त उदाहरणों में भाषा के बदलते रूप को सहज ही देखा जा सकता है। किन्तु पहले 1857 की महाक्रान्ति की विफलता ने हिन्दुओं मुसलमानों के मध्य की एकता के धागे को जगह-जगह से तोड़कर बिखेर दिया और फिर जो कुछ बचा-खुचा था वह देवनागरी आन्दोलन के प्रभाव से, जो आगे चलकर हिन्दी आन्दोलन के रूप में उर्दू के विरोध में सक्रीय दिखायी दिया, टूटता चला गय। हिन्दी के मुस्लिम साहित्यकारों का मोह भंग हो गया और हिन्दी के धर्म-नियत्रित नये रूप और तेवर को देख कर वे स्तब्ध से रह गये। लगभग सौ वर्ष का समय ऐसा निकल गया जिसमें हिन्दी के दुर्ग में प्रवेश करने का मुस्लिम साहित्यकारों ने साहस भी नहीं किया। भारत की स्वाधीनता के बाद जब आपसी तनाव के बादल लगभग छंट से गये,मुस्लिम साहित्यकारों ने बड़ी संख्या में हिन्दी लेखन में रुचि दिखायी।

अन्त में हम केवल इतना कह सकते हैं कि प्रारंभ से ही हिन्दी भाषा और उसके साहित्य को रूप और आकार तथा सार्थकता प्रदान करने में मुस्लिम साहित्यकारों का अविस्मरणीय योगदान रहा है। मेरा विश्वास है कि जब हिन्दुओं और मुसलमानों के आपसी रिशते और मज़बूत होंगे इस योगदान को और गहराई से याद किया जयेगा।

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संदर्भ :

1. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा कचहरियों में उर्दू अपना दबदबा जमाये हुए है। अपने सहोदर पुत्र मुसलमानों के सिवा हिन्दू जो उसके सौतेले पुत्र हैं उन्हें भी ऐसा फंसाय रखा है कि उसीके असंगत प्रेम में बंध ऐसे महानीच निठुर स्वभाव हो गये हैं कि अपनी निजी जननी सकल गुण आगरी नागरी की ओर नजर उठाय भी अब नहीं देखते। [हिंदी प्रदीप, अक्तूबर 1884, अंक 15], श्रीधर पाठक ने लिखा हिंदी हिन्दुओं की ज़बान, बेजान्। उर्दू से कटाए कान्। कमर टूटी हुई, लाठी पुरानी हाथ में, बे मदद, बे आका। [हिन्दोस्तान की चन्द भाषाओं की समालोचना शीर्षक लेख, हिन्दी प्रदीप, अक्तूबर 1884, अंक 15]

2. सुधा, वर्ष 3, खंड 1, संख्या 6, पृष्ठ 674

3. विस्तार के लिए देखिए शैलेश ज़ैदी, हिन्दी के मधय-युगीन मुस्लिम कवि, विश्वविद्यालय प्रकाशन केन्द्र, कबीर और उनका युग शीर्षक लेख ।

4. विस्तार के लिए देखिए शैलेश ज़ैदी, हिन्दी के मधय-युगीन मुस्लिम कवि, विश्वविद्यालय प्रकाशन केन्द्र, सैय्यद गुलाम मुहम्मद रसखान शीर्षक लेख ।

5. मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूनी, मुन्तखिबुत्तवारीख, भाग 1, [कल्कत्ता 1869], पृ0 250

6. अमीर ख़ुसरो, मसनवी नुह सिपह्र संपादक वहीद मिर्ज़ा कलकत्ता,1948ई0, पृ0 179 ।

7. 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में देवनागरी आन्दोलन ने जब हिन्दी आन्दोलन का नाम ग्रहण कर लिया, देहलवी और उर्दू जैसे शब्दों से बचने के लिये हिन्दी के विद्वानों ने खडी बोली का एक नया नाम गढा लिया और उसकी प्राचीनता खोजते हुए उससे वर्तमान हिन्दी का विकास तलाश करने में जुट गये। जबकि तथ्य यह है कि किसी रचनाकार ने अपनी भाषा को 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक, खडी बोली कभी नहीं कहा। भार्तेन्दु हरिश्चन्द्र ने इस सच्चाई को एक प्रकार से स्वीकार भी किया है। वे खडी बोली का अर्थ उर्दू मानते थे। अग्रवालों की व्युत्पत्ति शीर्षक पुस्तक में उन्होंने 1881 ई0 में लिखा भी था –“इनका [अग्रवालों का] मुख्य देश पश्चिमोत्तर प्रान्त है और बोली स्त्री और पुरुष सबकी खडी बोली अर्थात उर्दू है।[भार्तेन्दु समग्र, हिन्दी प्रचारक संस्थान,1987 ई0, पृ0 583]। शैलेश ज़ैदी

8. मक़ालाते-शीरानी, जिल्द 1, पृष्ठ 170

9. ज़ाअन्नि रूज़ी बिन्निशातिल औफ़ा / फ़ी खैरि क़ुदूम। [अरबी]

[नव वर्ष का दिवस बडे हर्ष के साथ आया / मंगल आगमन के साथ]

फूले द्रुम, बेल लहलहै, बन ऊल्हा / तरुवर रहे झूम। [हिन्दवी]

[शाखाएं पुष्पित हो उठीं,लताएं लहाहा गयीं,वन उल्लासयुक्त,/ वृक्ष झूम उठे]

नेकी कंदीज़ कलदी बुज़ी बुअदी / यश क़ुतलग़ बुअसूम्। [तुर्की]

[नव वर्ष के अवसर पर वन उपवन हरे भरे हो गये / मुबारक सिद्ध हो]

चूं शहपरे-ताऊस गुल अन्दर सेहरा / आवुर्द हुजूम्। [फ़ारसी]

[मोर की फैली हुई दुम की तरह जंग के पुष्प / एकत्र हो गये]

-मीर ग़ुलाम अली आज़ाद, सर्वे-आज़ाद, पृ0 284

10. दीवाने-ग़ालिब, संपादक इम्तियाज़ अली खां अरशी, पृष्ठ 16

11. जवामेउल्किलम [हस्तलिखित] , 1337-1338 ई0 , पृष्ठ 172-73

12. همارا كنت بهلا هواجو ماريا بهني

13 विस्तार के लिए देखिए - फ़र्क़ुहर, आब्स्क्योर रेलीजस कल्टस [1962], पृ0 33-34

14. विस्तृत अध्ययन के लिए देखिये - शैलेश जैदी, हिन्दी के मध्ययुगीन मुस्लिम कवि, अद्दहमाण [अब्दुर्रहमान] और उनका 'संनेह रासउ' [सन्देश रासक] शीर्षक लेख ।

[*] रचनाओं के मूल संदर्भ मेरी पुस्तकों 1: अलखबानी, भारत प्रकाशन मदिर, अलीगढ़ 1971, 2: बिलग्राम के मुसलमान हिनदी कवि, नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, 1969 और हिन्दी के मध्य्युगीन मुस्लिम कवि, विश्व्वविद्यालय प्रकाशन केन्द्र, अलीगढ़,2002 में देखे जा सकते हैं।

15 अब्दुल वाहिद, हक़ाइक़े-हिन्दी, [हिन्दी अनुवाद तथा संपादन : प्रो0 अतहर अब्बास रिज़वी], नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी,

16.हम तो राम मंडैया पाई।/दुख कै अगनि, पाप कै आँधी तहाँ न नेकु समाई॥/जप कै घास, बाँस भए तप कै बात बूझ सुहाई॥/सत्त धरम की थूनी बेंडी,साधु साधना छाई॥/ध्यान ज्ञान कै बंधन लागे, सुनो कान दै भाई॥/पेम नगर में ठाँव बनायो,गुरु परसाद उठायी॥/नेम नीति कौ जल भरि राख्यो,पेम धुनी सुलगाई॥/पेमी बेग भडारौ दीजे,कीजे अनद बधाई॥[शैलेश ज़ैदी,बिलग्राम के मुसलमान हिन्दी कवि, पृष्ठ 62]

17. वही, पृष्ठ[132]।

18.कृष्णबिहारी मिश्र, साहित्य समालोचक, भाग 2, पृष्ठ 124-125

19.विस्तार के लिए देखिए-शैलेश ज़ैदी, बिल्ग्राम के मुसलमान हिन्दी कवि, पृष्ठ 283 ।

20.सगीत राग कल्पद्रुम प्रथम खंड,पृष्ठ 134 ।

21.जनार्दन राव चेलेर, वृन्द और उनका साहित्य,पृष्ठ 49-50

22.शाह नवाज़ ख़ाँ, 'मआसिरुल उमरा', [18880],खंड 3, पृष्ठ 946

23.ह्स्त लिखित हिन्दी पुस्तकों का संक्षिप्त विवरण, प्रथम खंड, पृष्ठ 628

24.एक उदाहरण द्रष्टव्य है - 'पौढ़ी हुती पलिका पर हौं निसि ग्यान सौ ध्यान पिया मन लाए।/लागि गयीं पलकैं पल सों पल लागत ही पल में पिय आए।/ज्यों ही उठी उनके मिलिबे हौं सु जागि परी पिय पास न पाए।/'मीरन' और तो सोई के खोवत हौं सखि प्रीतम जागि गँवाए॥

25.शेर ख़ाँ लोदी, मिरातुलख़याल, 18310, पृष्ठ 229

26.यदे बैज़ा [हस्तलिखित], ज़ख़ीरए-अहसन 920/7 फ़ारसी,मौलाना आज़ाद लाइबरेरी,ए।एम्।यू।

27.विस्तार के लिए देखिए - शैलेश जैदी, हिन्दी के मध्ययुगीन मुस्लिम कवि, मीरज़ा रौशन ज़मीर 'नेही' शीर्षक लेख ।

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शनिवार, 1 अगस्त 2009

हमेँ ज़मीन पे रह्ते हुए ज़माना हुआ ।

हमेँ ज़मीन पे रह्ते हुए ज़माना हुआ ।
क़यामे-ख़ुल्दे-बरीं अब तो इक फ़साना हुआ॥

ये शह्र क्या था न आबादियाँ न घर न सड़क,
यहाँ वो आता गया जिस का आबो-दाना हुआ ॥

किवाड़ें घर की नहीं चौखटों के क़ब्ज़े में,
इन्हें ये ग़म है, वो इस घर से क्यों रवाना हुआ ॥

बक़ा के लमहे फ़ना में तलाश करता है,
अजीब शख़्स है मस्ते-ख़्रराब ख़ाना हुआ ॥

ख़याल आता है उस बज़्मे-मह्वशाँ का मुझे,
बहोत से लोग थे ये दिल ही क्यों निशाना हुआ ॥

न मिलना चाहता था वो तो साफ़ कह देता,
वो जा रहा है कहीं ये महज़ बहाना हुआ ॥

ज़माना करता है तशहीर कारनामों की,
के इस जहान में कल ज़िक्र कुछ हुआ न हुआ ॥
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शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

मुड़ के देखा था फ़क़त हो गया पत्थर नाहक़ ।

मुड़ के देखा था फ़क़त हो गया पत्थर नाहक़ ।
ओढ़ना चाहता था माज़ी की चादर नाहक़ ॥

मैं था साहिल पे खड़ा उसके ख़यालात लिये,
ख़ैरियत पूछने आया था समन्दर नाहक़ ॥

हक़-पसन्दी न मेरी कुछ भी मेरे काम आयी,
मिल गयी ख़ाक मेँ अज्दाद की इज़्ज़त नाहक़॥

उसकी तस्वीर तो दिल मेँ ही थी, देखी न गयी,
लोग करते रहे ता-उम्र इबादत नाहक़ ॥

अच्छा-ख़ासा इसी दुनिया के मुताबिक़ था मिज़ाज,
उस में क्यों घोल दिया रंगे-शराफ़त नाहक़ ॥

जिस को बेताबिए-दिल की भी कोई फ़िक्र न हो,
उसकी जानिब हुई माएल ये तबीअत नाहक़ ॥

इतना मसरूफ़ रहा वादों की पर्वा भी न की,
मिल के अहबाब से होती है निदामत नाहक़ ॥
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सोमवार, 27 जुलाई 2009

रह गयीं बिछी आँखें और तुम नहीं आये।

रह गयीं बिछी आँखें और तुम नहीं आये।

मुज़महिल हुईं यादें और तुम नहीं आये ॥

चान्द की हथेली पर रख के सर मुहब्बत से,

सो गयीं थकी किरनें और तुम नहीं आये ॥

ख़त तुम्हारे पढ़-पढ़ कर चांदनी भी रोई थी,

नम थीं रात की पलकें और तुम नहीं आये॥

धूप होके आँगन से छत पे जाके बैठी थी,

कोई भी न था घर में और तुम नहीं आये॥

टुकड़े-टुकड़े हो-हो कर चुभ रही थीं सीने में,

इन्तेज़ार की किरचें और तुम नहीं आये ॥

नीम पर लटकते हैं अब भी सावनी झूलए,

जा रही हैं बरसातें और तुम नहीं आये॥

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शनिवार, 25 जुलाई 2009

असासा ख़्वाबों का मह्फ़ूज़ कर नहीं पाया ।

असासा ख़्वाबों का मह्फ़ूज़ कर नहीं पाया ।
के दिल ने अपना कोई हमसफ़र नहीं पाया॥

हमारी आँखों के शायद चेराग़ रौशन थे ,
अँधेरा आया तो लेकिन ठहर नहीं पाया॥

तमाम ख़्वाहिशें यकबारगी सिमट सी गयीं,
मैं उसके कूचे से होकर गुज़र नहीं पाया॥

हमारे गाँव में अब भी है ठाकुरों का कुंवाँ,
घड़ा जहाँ से दलित कोई भर नहीं पाया॥

तवक़्क़ोआत में बारिश की खेत सूख गये,
घटाओं को भी बहोत मोतबर नही पाया॥

न ले सका मैं कोई काम मसलेहत से कभी,
के सादगी ने मेरी ये हुनर नहीं पाया ॥
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बुधवार, 22 जुलाई 2009

मैं बारिशों से भरे बादलों को देखता हूं

मैं बारिशों से भरे बादलों को देखता हूं ।
फिर अपने खेतों के तश्ना लबों को देखता हूं॥

तड़पते ख़ाक पे ताज़ा गुलों को देख्ता हूं ।
हया से सिमटी हुई दह्शतों को देखता हूं ॥

दिलों को बाँट दिये और ख़ुद रहीं ख़ामोश,
तअल्लुक़ात की उन सरहदों को देखता हूं ॥

न आयी हिस्से में जिनके ये रोशनी ये हवा,
चलो मैं चलके ज़रा उन घरों को देखता हूं ॥

जो कुछ न होके भी सब कुछ हैं दौरे-हाज़िर में,
ख़ुद अपनी आँखों से उन ताक़तों को देख्ता हूं॥

बहोत थे सहमे हुए लब के बोल तक न सके,
मैं थरथराती हुई काविशों को देखता हूं॥

न जाने कब से फ़िज़ाओं की सुर्ख़ हैं आँखें,
मैं उनमें पलते नये हादसों को देखता हूं॥
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हवाएं हैं गरीबाँ चाक हर जानिब उदासी है।

हवाएं हैं गरीबाँ चाक हर जानिब उदासी है।
मुहब्बत के लिए पागल ज़मीं मुद्दत से प्यासी है॥

शजर पर इन बहारों में नयी कोंपल नहीं फूटी,
पुराने पत्तों की अब ज़िन्दगी बाक़ी ज़रा सी है॥

अयाँ है चान्द के मायूस मुर्दा ज़र्द चेहरे से,
सितारों के जहाँ में भी कहीं कोई वबा सी है ॥

चलो इस शह्र से ये शह्र बेगाना सा लगता है,
सुकूं नापैद है लोगों में बेहद बदहवासी है॥

लबे दरिया भी आजाओ तो कुछ राहत नहीं मिलती,
के पानी में किसी मरज़े नेहाँ की इब्तेदा सी है॥

ख़ुदा को देखना है गर तो मेरे शह्र में आओ,
दिखाऊं सूरतें ऐसी के हर सूरत ख़ुदा सी है॥
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मंगलवार, 21 जुलाई 2009

मकान कितने बदलता रहा मैं घर न मिला।

मकान कितने बदलता रहा मैं घर न मिला।
तमाम उम्र जो दे साथ हम-सफ़र न मिला ॥

ग़ज़ल के फ़न पे क़लम नाक़िदों के चलते रहे,
मगर किसी का भी मेयार मोतबर न मिला ॥

शऊरो-फ़ह्म है तख़्लीक़-कार की दुनिया,
यहाँ फ़सानए-दिल कोई बे-असर न मिला ॥

ठहर के साए में जिसके ज़रा सा दम लेते ,
हमारी राह में ऐसा कोई शजर न मिला ॥

निकालीं सीपियाँ कितने ही ग़ोता-ख़ोरों ने,
जो आबदार हो ऐसा कोई गुहर न मिला ॥
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जिस्म के ज़िन्दाँ में उमरें क़ैद कर पाया है कौन ।

जिस्म के ज़िन्दाँ में उमरें क़ैद कर पाया है कौन ।
दख़्ल क़ुदरत के करिश्मों में भला देता है कौन॥

चान्द पर आबाद हो इन्साँ उसे भी है पसन्द,
उसकी मरज़ी गर न हो ऊंचाइयाँ छूता है कौन ॥

सब नताइज हैं हमारे नेको-बद आमाल के,
किसके हिस्से में है इज़्ज़त दर-बदर रुस्वा है कौन्॥

अक़्ल ने अच्छे-बुरे की दी है इन्साँ को तमीज़,
अपने घर से दुश्मनी पर फिर भी आमादा है कौन॥

इस बशर में हैं दरिन्दों की हज़ारों ख़सलतें,
देखना ये है के इनसे कब निकल पाया है कौन॥
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रविवार, 19 जुलाई 2009

दोस्तों से राब्ता रखना बहोत मुश्किल हुआ।

दोस्तों से राब्ता रखना बहोत मुश्किल हुआ।
कुछ ख़ुशी, कुछ हौसला रखना बहोत मुश्किल हुआ॥

वक़्त का शैतान हावी हो चुका है इस तरह,
दिल के गोशे में ख़ुदा रखना बहोत मुश्किल हुआ॥

किस तरफ़ जायेंगे क्या क्या सूरतें होंगी कहाँ,
ज़ेह्न में ये फ़ैसला रखना बहोत मुश्किल हुआ॥

हो चुके हैं फ़िक्र के लब ख़ुश्क भी, मजरूह भी,
उन लबों पर अब दुआ रखना बहोत मुश्किल हुआ॥

मान लेना चाहिये सारी ख़ताएं हैं मेरी,
आज ख़ुद को बे-ख़ता रखना बहोत मुश्किल हुआ॥

कब कोई तूफ़ाँ उठे, कब हो तबाही गामज़न,
मौसमे-गुल को जिला रखना बहोत मुश्किल हुआ॥
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शनिवार, 18 जुलाई 2009

दिल खिंच रहा है फिर उसी तस्वीर की तरफ़ ।

दिल खिंच रहा है फिर उसी तस्वीर की तरफ़ ।
हो आयें चलिए मीर तक़ी मीर की तरफ़ ॥

कहता है दिल के एक झलक उसकी देख लूं ,
उठता है हर क़दम रहे-शमशीर की तरफ़ ॥

मैं चख चुका हुं ख़ाना-तबाही का ज़ायेक़ा ,
जाऊंगा अब न लज़्ज़ते-तामीर की तरफ़ ॥

इक ख़्वाब है के आँखों में आता है बार-बार,
इक ख़ौफ़ है के जात है ताबीरा की तरफ़ ॥

हालाते-शह्र मुझ से जिसे छीन ले गये,
माएल है अब भी दिल उसी जागीर की तरफ़॥

ज़िद थी मुझे के उस से करूंगा न इल्तेजा,
क्यों देखता मैं कातिबे-तक़दीर की तरफ़्॥
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शनिवार, 4 जुलाई 2009

जुनूँ-खेजी में दीवानों से कुछ ऐसा भी होता है.

जुनूँ-खेजी में दीवानों से कुछ ऐसा भी होता है.
के जिसके फैज़ से क़ौमों का सर ऊंचा भी होता है.

सफ़ीने की मदद को खुद हवाएं चल के आती हैं,
सहूलत के लिए ठहरा हुआ दरिया भी होता है.

मेरी राहों में लुत्फे - नकहते - बादे-बहारी है,
मेरे सर पर महो-खुर्शीद का साया भी होता है.

बजाहिर वो मेरी जानिब से बे-परवा सा लगता है,
मगर एहसास उसको मेरे ज़खमों का भी होता है.

ये मज़्लूमी की चादर मैं जतन से ओढे रहता हूँ,
के लग्जिश से मेरा महबूब कुछ रुसवा भी होता है.

उसी का है करम इस हाल में भी सुर्ख-रू हूँ मैं,
बरतने में वो अक्सर हौसला अफजा भी होता है.

नज़र के सामने रहता है वो कितने हिजाबों में,
मगर ख़्वाबों में जब आता है बे-पर्दा भी होता है.
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सोमवार, 29 जून 2009

ले जाता है ऐ दिल मुझे नाहक़ तू कहाँ और.

ले जाता है ऐ दिल मुझे नाहक़ तू कहाँ और.
गोकुल के सिवा कोई नहीं जाये-अमां और.

जमुना का ये तट और ये मुरली के तराने,
जी चाता है उम्र गुज़र जाये यहाँ और.

ये इश्क के इज़हार की आज़ादी कहाँ है
इस खित्ते को शायद हैं मिले अर्ज़ो-समाँ और.

हर सम्त कदम्बों के दरख्तों के हैं साये,
मुमकिन ही नहीं होती हो खुश्बूए-जिनाँ और.

सच्चाई के अल्फाज़ हैं दोनों के लबों पर
राधा का बयाँ और है कान्हा का बयाँ और.

इस दिल में अगर श्याम मकीं हो नहीं सकते,
हम फिर से बना लेंगे नया एक मकाँ और.
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रविवार, 28 जून 2009

आमिना के लाल का सौन्दर्य मन को भा गया.

आमिना के लाल का सौन्दर्य मन को भा गया.
रूप का लावन्य मानस के क्षितिज पर छा गया.

उसकी लीलाएं अनोखी थीं सभी को था पता,
उसकी छवियों पर निछावर सारा जग होता गया.

हम तिमिर में थे, उजालों में कुछ आकर्षण न था,
रोशनी का अर्थ आकर वो हमें समझा गया.

उसके आने की मिली जब सूचना कहते हैं लोग,
आग फ़ारस की बुझी सारा महल थर्रा गया.

शत्रुओं को उसने दो पल में चमत्कृत कर दिया,
चाँद के स्पष्ट दो टुकड़े हुए देखा गया.


गोरे काले सब बराबर हैं ये जब उसने कहा,
शोषकों के दंभ का प्रासाद ही भहरा गया.

उसकी वाणी से परिष्कृत हो गए मन के कलश,
उसकी शिक्षा का हरित-सागर हमें नहला गया.
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श्याम से गर जुड़ा नहीं होता.

श्याम से गर जुड़ा नहीं होता.
दिल किसी काम का नहीं होता.

तुमको ऊधव किसी से प्रेम नहीं,
वर्ना ये सिलसिला नहीं होता.

उस से आँखें अगर नहीं मिलतीं,
रात दिन जागना नहीं होता.

कैसे माखन चुरा लिया उसने,
ग्वालनों को पता नहीं होता.

वो नहीं तोड़ता कभी गागर,
जब भी पानी भरा नहीं होता.

छोड़कर वो अगर नहीं जाता,
जीना यूँ बे-मज़ा नहीं होता.

पैदा गोकुल में जब न होना था,
जन्म हम ने लिया नहीं होता.
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बांसुरी की तान में जीवन की व्याख्याएँ मिलीं.

बांसुरी की तान में जीवन की व्याख्याएँ मिलीं.
आके जमुना तट पे कुछ मीठी निकटताएँ मिलीं.

मेरे अंतर में तो बस गोकुल की छवियाँ थीं मुखर,
जब जहां झाँका मुझे कान्हा की लीलाएँ मिलीं.

राधिका बरसाने में जबतक थीं सब सामान्य था,
जब मिलीं घनश्याम से नूतन मधुरिमाएँ मिलीं.

पांडवों ने सार्थी को चुन लिया, विजयी हुए,
कौरवो ने सैन्य-दल चाहा, विफलताएँ मिलीं.

स्वार्थवश जो युद्ध में कूदे कलंकित हो गए
न्याय पर स्थिर रहे जो उनको गरिमाएँ मिलीं.

लोग कहते हैं हुआ शैलेश ज़ैदी का निधन,
उसके घर कुछ भी न था बस चन्द कविताएँ मिलीं.
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शनिवार, 27 जून 2009

दरिया की गुहर-खेज़ियाँ कब देती हैं आवाज़.

दरिया की गुहर-खेज़ियाँ कब देती हैं आवाज़.
आँखों में ये जब हों तो अजब देती हैं आवाज़.

है तश्ना-लबी चाहे-ज़नखदाँ के सबब से,
प्यासी हैं बहोत धड़कनें जब देती हैं आवाज़.

बज़्मे-लबो-रुखसार में जज़बात की कलियाँ,
बेसाख्ता खिलने के सबब देती हैं आवाज़.

किसके थे मकाँ, इनमें लगाई गयी क्यों आग,
मजबूरियाँ हैं मुह्र-बलब, देती हैं आवाज़.

कुरते के बटन टूटे हैं टांकेगा उन्हें कौन,
तनहाइयां क्यों यादों को अब देती हैं आवाज़.

खलियानों में है ढेर अनाजों का तो क्या है,
कुछ झोंपडियाँ गौर-तलब देती हैं आवाज़.
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गुहर-खेज़ियाँ = मोतियों से भरा होना, तश्ना-लबी = प्यास, चाहे-ज़नखदाँ = ठोढी के कुंएं, बे-साख्ता = सहज रूप से, मुह्र-बलब = मौन,

उल्झे क्या तुझ से महज़ थोडी सी तकरार में हम.

उलझे क्या तुझ से महज़ थोडी सी तकरार में हम.
अजनबी बन के फिरे कूचओ-बाज़ार में हम.

आहनी तौक़ पिन्हाया गया गर्दन में हमें,
और रक्खे गए जिन्दाने-शररबार में हम.

हम थे फनकार ये हमने कभी दावा न किया,
होके महदूद रहे अपने ही घर बार में हम.

आबलापाई के अंदेशों से गाफ़िल न हुए,
शौक़ से बढ़ते रहे वादिये-पुरखार में हम.

भारी पत्थर के तले दब के भी टूटे न कभी,
और घबराए न घिर कर कभी मंजधार में हम.

चीख की तर्ह बियाबानों में गूंजे हर सिम्त,
मुस्कुराते नज़र आये दिले-ग़म-ख्वार में हम.
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शुक्रवार, 26 जून 2009

सच्चाइयां ज़रा भी बयानात में न थीं.

सच्चाइयां ज़रा भी बयानात में न थीं.
फिर भी वो सामईन के शुबहात में न थीं.

पाबंदियां शरीअते-इस्लाम की कहीं,
हिन्दोस्ताँ-मिज़ाज रुसूमात में न थीं.

गौतम के बुत तराश रहा था मैं ख्वाब में,
किरनें मताए-कुफ्र की जज़बात में न थीं.

मैं जितनी देर तुझसे रहा महवे-गुफ्तगू,
तेरे सितम की चोटें खयालात में न थीं.

उन बस्तियों में सिर्फ अँधेरे थे मौजज़न,
कुछ जिंदा आहटें भी मकानात में न थीं.

उस से तअल्लुकात थे हमवार बे-पनाह,
जो तलखियाँ हैं आज, शुरूआत में न थीं.

आखिर मुसीबतों को है क्या मुझसे दुश्मनी,
पहले तो इस तरह ये मेरी घात में न थीं.

मंजधार में भी दिल का सफ़ीना नहीं रुका,
मजबूरियाँ कभी मेरे हालत में न थीं.
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बयानात = वक्तव्यों, सामईन = श्रोताओं, शुबहात = संदेहों, पाबंदियां = प्रतिबन्ध, शरीअते-इस्लाम = इस्लामी धर्म-संहिता, हिन्दोस्ताँ-मिज़ाज = भारतीय स्वभाव वाले, रुसूमात = रीति-रिवाजों, मताए-कुफ्र = काफिर होने की दौलत, महवे-गुफ्तगू= बातचीत में व्यस्त, थे मौजज़न = लहरें मार रहे थे, सफ़ीना = कश्ती.

अलगनी पर टांग कर कपडे खड़ी थी दोपहर.

अलगनी पर टांग कर कपडे खड़ी थी दोपहर.
आग तन-मन में लगी थी भुन रही थी दोपहर.

हो चुकी है अब ये धरती और सूरज के करीब,
बस इसी चिंता में पागल सी हुयी थी दोपहर.

बर्फ ही पिघले हिमालय से तो कुछ संतोष हो,
होके बेकल मन-ही-मन में सोचती थी दोपहर.

आ गयी नीचे बहोत नदियों के पानी की सतह,
प्यास से बेचैन कर्मों की जली थी दोपहर.

लेप चन्दन का कहीं से आके कर जाती हवा,
हर दिशा में याचना करती फिरी थी दोपहर.
*******************

गुरुवार, 25 जून 2009

सुलाने के लिए तारों भरी रातें नहीं आतीं.

सुलाने के लिए तारों भरी रातें नहीं आतीं.
मुझे वातानुकूलित कक्ष में नींदें नहीं आतीं.

न जाने कब से सूखे हैं हमारे गाँव के पोखर,
नहाने अब वहां चांदी की पाज़ेबें नहीं आतीं.

कोई पौधा कभी बरगद की छाया में नहीं पनपा,
कि उस को धूप देने सूर्य की किरनें नहीं आतीं.

मैं यादों के सहारे धुंधले खाके तो बनाता हूँ,
उभर कर फिर भी वो बचपन की तस्वीरें नहीं आतीं.

हमारी चाहतों में ही कहीं कोई कमी होगी,
किसी निष्कर्ष पर चिंतन की बुनियादें नहीं आतीं.

ये संबंधों की दुनिया ठोस भी है देर-पा भी है,
मगर जब दोनों पक्षों से कभी शर्तें नहीं आतीं.
******************

भँवरे, तितली, मधुमक्खी सब अपनी धुन में मस्त रहे.

भँवरे, तितली, मधुमक्खी सब अपनी धुन में मस्त रहे.
हम उद्देश्य रहित थे, भटके एकाकी, संत्रस्त रहे.

पुरवाई की शीतलता से रहे अपरिचित सारी उम्र,
लू के तेज़ थपेडों में श्रम करने के अभ्यस्त रहे.

बादल में पानी थे, खेतों में फसलों की आशा थे,
फूलों की अंगड़ाई में खुशबू बनकर पेवस्त रहे.

सीता जी के आंसू पोंछे तो मन को संतोष मिला,
माँ के आशीषों में पंडित ब्रज नारायन चकबस्त रहे.

रमते जोगी थे, गृहस्थ जीवन की माया से थे मुक्त,
अलख जगाया, प्रेम रसायन पीकर मस्त-अलस्त रहे.

पत्थर का टुकडा थे फिर भी आँखें मूँद नहीं पाए,
हमें हटाने की इच्छा से आये जो भी ध्वस्त रहे.
**********************

बुधवार, 24 जून 2009

ज़ुल्मात का तिलिस्म जहां में कहाँ नहीं.

ज़ुल्मात का तिलिस्म जहां में कहाँ नहीं.
दश्ते-तहय्युरात में तारीकियाँ नहीं.

मैं खुद से हमकलाम रहूँ कितनी देर तक,
महफ़िल में कोई शख्स मेरा हमज़ुबां नहीं.

महदूद होके रह गया मैं अपनी ज़ात में,
क्या शिकवा ज़िन्दगी का अगर जाविदाँ नहीं.

समझाऊं कैसे सोज़िशे-दिल की मैं कैफ़ियत,
ये आग इस तरह की है जिसमें धुआँ नहीं.

बेहतर तअल्लुक़ात हुए हैं कुछ इन दिनों,
पहले की तर्ह मुझ पे वो ना-मेहरबां नहीं.

माना के खस्ताहाली में गुज़री है ज़िन्दगी,
लेकिन कभी किसी पे था बारे-गरां नहीं.

उफ़ क्या तपिश है धूप में शिद्दत बला की है,
ज़िन्दा हैं, गो सरों पे कोई सायबाँ नहीं.
******************

सोमवार, 22 जून 2009

इज़हारे-हक़ का रखता हो जो इन्तेहा का शौक़.

इज़हारे-हक़ का रखता हो जो इन्तेहा का शौक़.
दारो-रसन का हो न उसे क्यों बला का शौक़.

देखे कभी कोई मेरी ज़ंजीर-पा का शौक़.
इन्सां की बेहतरी के लिए है दुआ का शौक़.

खुद भूके रहके बच्चों को सब कुछ खिला दिया,
कुर्बानियों में पलता रहा मामता का शौक़.

कर लेते हैं वो मौत से पहले कुबूल मौत,
जिनके दिलों में होता है उसकी रिज़ा का शौक़.

ज़िक्रे-ख़फी से रूह की दुनिया बदल गयी,
रुखसत हुआ मिज़ाज से हिर्सो-हवा का शौक़.

नैजे की नोक पर भी रहा सर-बलंद मैं,
खंजर तले भी दब न सका कर्बला का शौक़.

दो-जिस्म खुशबुओं को मिलाकर है खुश बहोत,
हैरत से देखता हूँ मैं बादे-सबा का शौक़.
******************

इज़हारे-हक़ = सत्य की अभिव्यक्ति, इन्तेहा = चरम सीमा तक, दारो-रसन = हथकडी-बेडी और सूली, बला = अत्यधिक, ज़ंजीरे-पा = पाँव की ज़ंजीर, रिज़ा = स्वीकृति, ज़िक्रे-खफ़ी = मौन-साधना, हिर्सो-हवा = लोभ लालच, प्रातः की पुरवा हवा.

अब किसे बनवास दोगे [ राम काव्य : पुष्प / 4 ]

पुष्प - 4 : चिन्तन के अन्तरिक्ष

[एक ]
लोग कहते हैं कि विधाता चुनता है
अपनी इच्छानुरूप आदमी को
और लाद देता है उस पर
दुःख- सुख की गठरी,
जिसे चुपचाप ढोने की प्रक्रिया
बन जाती है आदमी की नियति.
और इस नियति पर
नहीं होता आदमी का कोई नियन्त्रण
लोग क्यों नहीं सोचते
कि आदमी के हर निर्णय के साथ
जुड़ा है एक इतिहास
और यह इतिहास करता है रेखांकित
आदमी का आदमी से जुड़ना,
जुड़कर अलग होना,
अलग होकर जुड़े रहना.
इतिहास का यह रेखांकन
बताता है बैर और मैत्री के सन्दर्भ,
सन्दर्भों में निहित मूल्य,
मूल्यों के निर्माण में सक्रिय भूमिकाएँ.
इतिहास कभी थोपता नहीं आदमी पर
होनी अनहोनी घटनाएँ.
बल्कि छोड़ देता है उसे स्वतन्त्र
कुछ चुनने और न चुनने के बीच.
आदमी की यही स्वतन्त्रता
बनाती है उसकी पहचान
और यह पहचान ही करती है रूपायित
आदमी की नियति का ढाँचा.

लक्ष्मण के माथे पर खिंची रेखाएँ,
बनाना चाहती थीं
इतिहास का कुछ और नक्शा.
टूट रहे थे उस नक्शे में
पिता और पुत्र के सम्बन्ध,
टूट रही थीं पुरानी मान्यताएँ ,
आ रही थी विद्रोह की गन्ध.
पर वह, जिसे कहते हैं लोग
मर्यादा पुरूषोत्तम,
जिसे मानता हूँ मैं
तमाम संस्कृतियों का उद्गम,
जिसे पाया है मैंने
स्वार्थमुक्त , सुन्दर और अनुपम.
वह भी बना रहा था एक नक्शा.
और यह नक्शा
बहुत अलग था लक्ष्मण के नक्शे से.
इसमें राजगद्दी की जगह था एक वन- खण्ड ,
विद्रोह की जगह था प्रेम और भाई चारा .
यह नक्शा आम आदमी के लिए था एक सहारा
लक्ष्मण ने ध्यान से देखा था इस नक्शे को
इसकी एक- एक लकीर को
ढीली पड़ गयीं लक्ष्मण के माथे की तनी रेखाएँ
ढीली पड़ गयीं भिंची हुई मुट्ठियाँ
और मुट्ठियों में बन्द भावी योजनाएँ

कुछ चुनने और न चुनने के बीच खड़े लक्ष्मण
खोजने लगे अपनी पहचान
राम के नक्शे के भीतर
महल के एक तारीक झरोखे में खड़ी उर्मिला
देख रही थी लक्ष्मण की आँखों में
इतिहास का बदलाव
बन्धुत्त्व के स्नेहानुबन्ध का गहराता सागर
और उस सागर का बहाव
फैल गयी थीं उसकी आँखों के सामने
ढेर सारी तस्वीर

[दो ]
लोग कहते हैं कि अपने सतीत्व के सबूत में
सीता को देनी पड़ी थी अग्नि परीक्षा
और यह परीक्षा ही उतार पायी थी
राम की तनी हुई भौंहों की प्रत्यंचा
लोग शायद नहीं जानते अग्नि परीक्षा का अर्थ
लोग शायद नहीं जानते
आग में तपकर कुन्दन हो जाने की कला
दहक रही थी लंका में राम के विरुद्ध
शत्रुता की जो आग
सीता तपी थीं उस आग के भीतर
और नहीं आ सकी थी
उनके व्यक्तित्व पर कोई आँच
सीता ने बता दिया था
कि आदमी के लिए जरूरी है
आग के बीच से होकर गुजरना
और इस गुजरने में
व्यक्तित्व की गरिमा को बरकरार रखना

फिर वह, जिसे गुजरना पड़ा हो
चौदह वर्षों की विरहाग्नि के बीच से होकर
और जो निकल आया हो
इस आग के भीतर से बेदाग
लोगों को चाहिए कि उससे पूछें
क्या होती है जीवन की अग्निपरीक्षा
क्या होता है अग्नि परीक्षा से गुजरना
और इस गुजरने के बीच
व्यक्तित्व की गरिमा को बरकरार रखना

राम और लक्ष्मण का
मात्र एक निर्णय
छोड़ गया उर्मिला के पास
तपस्या के लिए एक दहकता वन -प्रान्तर
और कंचन जैसा उर्मिला का व्यक्तित्व
सहज ही तब्दील हो गया कुन्दन में
एक लम्बी अग्नि परीक्षा में तप कर

[तीन ]

मैं देख रहा हूँ राजभवन की सियाह दीवारें
दीवारों से चिपके दशरथ की मृत्यु के भयावह चित्र
चित्रों की हथेली पर उगा हुआ एक जंगल
जंगल में दौड़ते भूखे पशु.
मैं देख रहा हूँ घने पेड़ों के बीच से झाँकती
नियति की लाल -लाल आँखें
आँखों में जमा हुआ रक्त
रक्त से फूटती मृत्यु की दुर्गन्ध
मैं देख रहा हूँ उर्मिला के मर्म की पर्तों में जलता
सम्पूर्ण राजभवन
भवन में फैलती आग की लपटें
लपटों के बीच चिटखता
दशरथ का पार्थीव शरीर
चल रहे हैं जिस पर
वरदानों के अग्नि-बाण
राजभवन के भीतर और बाहर
रह गई शेष केवल राख.
कीर्ति के वैभव का इतिहास
राजभवन से दूर
जी रहा है अरण्य-संस्कृति .

मैं देख रहा हूँ
कि सूने सपाट मैदान में बैठी उर्मिला
अंगुलियों से कुरेद रही है जलती हुई राख
धरती की आह बन गयी है एक शब्द
‘राख के ढेर में षोला है न चिंनगारी है '
किन्तु उर्मिला के भावी जीवन की राख
अभी सर्द नहीं हो पायी है
वह जानती है
धरती के संवेदनषील वक्ष में भर देना
अपने चिंतन की हरारत,
अपनी ओजस्विता का ताप.
क्योंकि उसमें अभी शोला भी है
और चिंगारी भी
क्योंकि उसकी माँग का सिन्दूर
राम और सीता का अंगरक्षक बनकर
जी रहा है एक गौरवपूर्ण जिन्दगी .

[चार ]
मैके में संजोई गई आनन्द की स्थितियाँ
ससुराल की त्रासदी में
मेंहदी की तरह पिस कर
हो रही हैं आतुर
विकीर्ण करने को एक नयी लालिमा
दायित्व के तेज और संकल्प की गरिमा ने
तोड़ दी हैं सुषुप्तावस्था की चौहद्दियाँ
उभर आया है नारी का समूचा व्यक्तित्व.
सखियों के मध्य घिरी उर्मिला
कौशल्या और सुमित्रा का ममत्व
और माण्डवी का स्नेह पाकर
लक्ष्मण प्रवास के दुखद घेरे से
निकल आई है बाहर .
राजभवन से जंगल की ओर जाने वाला मार्ग
करने लगा है व्याख्यायित
कर्म योग का एक-एक पहलू
फैल रही है आहिस्ता-आहिस्ता
गुलाबों की खुषबू .

[पाँच ]
आकाश सिमठ कर आ गया है
उर्मिला की मुठ्ठी में ,
खुल गए हैं चेतना के सारे गवाक्ष.
गुनगुनाता है चिन्तन के अन्तरिक्ष में
एक पक्षी .
गोद को हरी-भरी देखना कौन नहीं चाहता
कौन नहीं चाहता बनाना
वात्सल्य की एक तस्वीर
शिशु के लिए बनाती है जब कोई गोद
छोटा सा एक दायरा
तो सामने आ जाता है ममत्व का खाका
और जब यह दायरा
हो जाता है कुछ बड़ा
और समेट लेता है अपने भीतर सम्पूर्ण धरती
तो गहरी हो जाती है विश्वबंधुत्व की रेखाएँ
आदमी को दायरों में बाँटकर देखना
कर देता है धरती को बहुत छोटा
और धरती जब हो जाती है
आदमी के लिए बहुत छोटी
तो पड़ जाती है आदमी और आदमी के बीच दरारें.

दूसरों का दुख होता है
अपने दुख से कहीं अधिक गहरा
पर उस गहराई को आँकने के लिए
जरूरी है आदमी में वह संवेदनशीलता
जो उठाती है आदमी और धरती को बहुत ऊँचा
और धरती और आदमी के संयोग से
जिन्दगी को मिल जाती है एक परिभाषा. '

[छः ]
मैं देखता हूँ चेतना के गवाक्षों में
उर्मिला के चिन्तन का समूचा अन्तरिक्ष
सुनता हूँ अन्तरिक्ष में बजती
जलतरंग की धुनें,
धुनों में हो जाता हूँ गिरफतार
पहन लेता हूँ आवाजों की हथकड़ियाँ
राजवधू बनकर जीवन काट लेना
कहीं अधिक सरल है
जन हिताय जीने से
विष उंडेल देने से बनती नहीं आदमी की पहचान
आदमी की पहचान बनती है विष पीने से.
देश के नक्शे की लकीरें
बांधती हैं सीमाओं में आदमी को
और देश की धरती सिखाती है आज़ादी
आदमी देता है नक्शे की लकीरों को रूप और आकार
आदमी को रूप और आकार देती है धरती.

मैं देखता हूँ उर्मिला को पूरी तरह आश्वस्त
विरह की धधकती ज्वालाएं
नहीं कर पातीं उसे पीड़ित और संत्रस्त.
आदमी जानता है जब धरती के यथार्थ से आँखें मिलाना
तो सिमट जाता है उसकी चेतना में समूचा युग
उर्मिला ने देखा है अपने समूचे युग को
अपनी चेतना के गवाक्षों के भीतर
उसने पहचाना है
धरती के यथार्थ का एक-एक अक्षर.
[ सात ]
दलितों की बस्ती में
नाचती हैं जहाँ सूर्य की किरणें
थिरकती हैं जीवन की रश्मियाँ
कमसिन, जवान और नंगे अंधेरे जहाँ
हँसते हैं प्रकाशयुक्त सहज हँसी
देखता हूँ मैं
कि तैरती है वहाँ की हवा में उर्मिला
सुगंध पुंज बनकर
देखता हूँ मैं कि एक हरी क्रांति
फूटती है धरती से
भर जाती है झोंपडियों के भीतर.
राजभवन आ गया है झुक कर
कच्चे मकानों और फूस के घरों के बराबर.
शबरी के साथ राम करते हैं भोजन.
उर्मिला के माध्यम से अयोध्या में
झुक गया है नीआम्बर,
धरती के चरणों पर.
खोजती हैं सूर्य की किरणें
अपनी उम्र का एक हिस्सा
उर्मिला की सांसों में,
धुंध रहित शामों में,
धुली हुई सुब्हों में,
चमकीली दुपहरियों में.
इतिहास दब गया है वर्त्तमान के नीचे
और हावी हो गई है
देश के मानसून पर कविता
और यह कविता रुदन नहीं है
साधना है
जो खोलती है चिंतन के अन्तरिक्ष.
**************

रविवार, 21 जून 2009

इबारतों में तसलसुल कहीं नहीं होता.

इबारतों में तसलसुल कहीं नहीं होता.
शऊरो-फ़िक्र को खुद पर यकीं नहीं होता.

असर-पज़ीर न होगा वो ज़लज़ले की तरह,
जो इन्क़लाब के ज़ेरे-ज़मीं नहीं होता.

हमारी वज्ह से तख्लीक़े-कायनात हुई,
न होते हम तो कोई ज़ेबो-जीं नहीं होता.

अजब तमाशा है, कहते हैं ला-मकाँ उसको,
वो कौन दिल है जहां वो मकीं नहीं होता.

रुमूज़े-इश्क़ को महफूज़ रखना लाज़िम है,
जमाले-हुस्न वगरना क़रीं नहीं होता.

वही तो है जो नज़र में समाया रहता है,
सिवाय उसके कोई दिल-नशीं नहीं होता.

तरक़्क़ियाँ न कभी आयीं उसके हिस्से में,
सियासतों में जो बारीक-बीं नहीं होता.

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इबारत = अनुलेख, तसलसुल =तारतम्य, शुऊरो-फ़िक्र = विवेक एवं विचार, असर-पज़ीर = प्रभावित, ज़लज़ला = भूकंप, ज़ेरे-ज़मीं = भूमिगत, तख्लीक़े-कायनात = संसार की सृष्टि, ज़ेबो-जीं = सज्जा, लामकां = वह जो आवास से मुक्त हो, मकीं = आवासित, रुमूज़े-इश्क़ = प्रेम के रहस्य, महफूज़ = सुरक्षित, लाज़िम = अनिवार्य, जमाले-हुस्न = रूप-सौन्दर्य, वगरना = अन्यथा, क़रीं = निकट, दिलनशीं = हृदयस्थ, बारीक-बीं = सूक्ष्म-दर्शी.

शुक्रवार, 19 जून 2009

ग़मों से होगा हमारे वो बाख़बर तय है.

ग़मों से होगा हमारे वो बाख़बर तय है.
कभी तो आँख हुई होगी उसकी तर तय है.

बदी को नेकियों से उन्सियत नहीं होती,
जहां में वज्हे-तसादुम हैं खैरो-शर तय है.

कोई अभी कोई ताखीर से करेगा सफ़र,
मगर हरेक के हिस्से में ये सफ़र तय है.

किसी भी शख्स को कमज़ोर क्यों समझते हो,
कहीं है ज़र तो होगा कहीं ज़बर तय है.

वो इल्म क्या के नहीं ज़ौ-फिशानियाँ जिस में,
गुहर की आब पे ही क़ीमते-गुहर तय है.

ये वि शजर है जो मम्नूअ है बशर के लिए,
टिकेगी आके यहीं नीयते-बशर तय है.

वो गुमशुदा भी नहीं और गुमशुदा भी है,
मिज़ाज उसका है दुनिया से बाला-तर तय है.

जो नक़्दे-शेर की लज्ज़त से आशना ही न हो,
अदीब कैसा भी हो है वो कम-नज़र तय है.

मराक़बे में किये जो मकाल्मे हम ने,
शऊरे-नफ़्स में हैं नक्शे-मोतबर तय है.
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बदी = बुराई, उन्सियत = लगाव, वज्हे-तसादुम = टकराव का कारण, ताखीर = विलंब, ज़ौ-फिशानियाँ = दीप्ति / चमक-दमक, गुहर = मोती, आब = कान्ति, मम्नूअ = निषिद्ध, गुम-शुदा = खोया हुआ, बालातर = बहुत ऊंचा, नक़्दे-शेर = शेर की परख, कम-नज़र =सकीर्ण दृष्टि वाला, मराक़बे में = समाधिस्थ स्थिति में, मकाल्मे = सवाद, शऊरे-नफ़्स =आत्मा की जाग्रतावस्था, नक्शे-मोतबर = विश्वसनीय चिह्न.

हर रास्ता जो हक़ का है दुश्वार-तलब है.

हर रास्ता जो हक़ का है दुश्वार-तलब है.
आज़ादिए-अफ़कार सरे-दार तलब है.

क़ीमत में अगर सर भी वो मांगे तो नहीं ग़म,
वो साग़रे-उल्फ़त मुझे सौ बार तलब है.

जो तेरी रिज़ा के लिए घर-बार लुटा दे,
ऐसा ही मेरे रब मुझे किरदार तलब है.

देखो के वो करता है तहे-तेग़ भी सज्दा,
जानो के उसे नफ़्स का ईसार तलब है.

फ़ैयाज़िये-खालिक़ पे फ़रिश्ते भी हैं शशदर,
एज़ाज़ को मुझ जैसा ख़तावार तलब है.

इदराक के करता हो चरागों को जो रौशन,
आँखों को वही मंज़रे-खूँबार तलब है.
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हक़ = सत्य, दुश्वार-तलब = कठिनाईयों से पूर्ण, आज़दिये-अफ़कार = विचारों की स्वतंत्रता, सरे दार = सूली के ऊपर, तलब = अपेक्षित, साग़रे-उल्फ़त = प्रेम का प्याला, रिज़ा = स्वीकृति / पसंदीदगी, किरदार = चरित्र, तहे-तेग = तलवार के नीचे, ईसार = दूसरों के हित के लिए किया गया त्याग, फ़ैयाज़िये-खालिक = परमात्मा की कृपाशीलता, शशदर = आर्श्चय-चकित, एज़ाज़ = सम्मान, इदराक = बौद्धिकता, मंज़रे-खूँबार = रक्त बरसाता दृश्य,

बुधवार, 17 जून 2009

ज़रूरीयात हैं महदूद, ख्वाहिशें हैं बहोत.

ज़रूरीयात हैं महदूद, ख्वाहिशें हैं बहोत.
दिलो-दिमाग की आपस में क्यों ज़िदें हैं बहोत.

ये घाटियाँ जो हैं बर्फ़ीली वादियों से घिरी,
बदलते मौसमों की इन में आहटें हैं बहोत.

हमारे कारवां जिन रास्तों से गुज़रेंगे,
लुटेरे सुनते हैं उन रहगुज़ारों में हैं बहोत.

ये रिश्तेदारियां कैसी हैं खानदानों की,
के खून एक है फिर भी अदावतें हैं बहोत.

पड़ोसियों में बजाहिर तो बात होती है,
मगर है लोगों का कहना के चाश्मकें हैं बहोत.

न सिर्फ़ मस्लकों में लोग हो गए तक़सीम,
छुपी दिलों में सभी के कुदूरतें हैं बहोत.

चुनी है अपने लिए हक़ की राह तुमने अगर,
रहे ख़याल यहाँ आज़्माइशें हैं बहोत.
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ज़रूरीयात = आवश्यकताएं, महदूद = सीमित, रहगुज़ारों = रास्तों, अदावतें = शत्रुताएं, मस्लकों = सम्प्रदायों, तकसीम = विभाजित, कुदूरतें = मलिनताएँ, आज़माइशें = परीक्षाएं.

मंगलवार, 16 जून 2009

दिलों में ज़ख्म था, लब मुस्कुराते रहते थे.

दिलों में ज़ख्म था, लब मुस्कुराते रहते थे.
हम अपना घर इसी सूरत सजाते रहते थे.

हरेक गाम पे ये ज़िन्दगी थी ज़ेरो-ज़बर,
तगैयुरात हमें आज़माते रहते थे.

वो चाहते थे भरम हो किसी की आहट का,
हवा के झोंके थे, परदे हिलाते रहते थे.

तअल्लुकात न थे, रस्मो-राह फिर भी थी,
तसव्वुरात में हम आते-जाते रहते थे.

ये बात सच है के हम खस्ता-हाल थे, लेकिन,
गिरे-पड़ों को हमेशा उठाते रहते थे.

न देख पाये कभी भी किसी की तश्ना-लबी,
मयस्सर आब था जितना पिलाते रहते थे.

ये जानते हुए इम्काने-रौशनी कम है,
हवा की ज़द में भी शमएँ जलाते रहते थे.
**********************

सब कुछ रवां-दवाँ है बज़ाहिर सुकून है।

सब कुछ रवां-दवाँ है बज़ाहिर सुकून है।

बस ज़िन्दगी गराँ है बज़ाहिर सुकून है.

काग़ज़ की कश्तियों में हैं साँसों के क़ाफ़्ले,

दरिया हरीफ़े-जाँ है बज़ाहिर सुकून है.

चस्पाँ दिलों के दर पे है दहशत का इश्तेहार,

हर शख्स बे-ज़ुबाँ है बज़ाहिर सुकून है.

ज़ेरे-लिबासे-तक़वा सियः-कारियाँ हैं आम,

ईमान खूँ-चकाँ है बज़ाहिर सुकून है.

अंदेशए - शरारते - बे-जा फ़िज़ा में है,

मंज़र शरर - फ़िशां है बज़ाहिर सुकून है।

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रवां-दवाँ = गतिशील, गराँ = महँगी, हरीफ़े-जाँ = जान का दुश्मन, चस्पाँ =चिपका हुआ, इश्तेहार =विज्ञापन, ज़ेरे-लिबासे-तक़वा =सात्विकता के वस्त्रों के नीचे, सियः कारियाँ = काले धंधे, खूँ-चकाँ = खून से भरा हुआ, अंदेशए-शरारते-बेजा = बेतुके उपद्रव की आशंका, शरर-फ़िशां = चिंगारियों से भरा हुआ।

सोमवार, 15 जून 2009

अबतक साथ निभाया है तो चन्द दिनों की ज़हमत और.
मंज़िल साफ़ नज़र आती है, थोडी सी बस हिम्मत और.

साग़रो-सहबा की सरगोशी से बिल्कुल बे-पर्वा थे,
ख्वाब सजा लेते थे बैठे-बैठे थी वो ताक़त और.

पेड़ों का झुरमुट था, झील का नीला-नीला पानी था,
आँखों की कश्ती में सैर सपाटों की थी लज्ज़त और.

कितने ही औसाफे-हमीदा देख रहे थे हम में लोग,
किसको पता था फूल खिलाएगी तदबीरे-मशीयत और.

अपनी ज़ात से ऊपर उठकर उसके वुजूद में गुम था मैं,
इस एहसास में नगमा-रेज़ थी सुहबत और शराफत और.

कासए-सर में भर के शराबे-इश्क़ पियो तो बात बने,
मुह्र-बलब रह जाए शरीअत, देख के रंगे तरीक़त और.
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साग़रो-सहबा =प्याला और मदिरा, सरगोशी = कानाफूसी, औसाफे-हमीदा = सत्व-गुण, तदबीरे-मशीयत = दैव-शक्ति के प्रबंध, ज़ात = व्यक्तित्व, वुजूद = अस्तित्व, कास'ए सर = सर का प्याला, मुह्र-बलब = मौन, शरीअत =इस्लामी धर्म-संहिता, तरीक़त = ब्रह्म-ज्ञान,

सभी आबद्ध उत्तर-आधुनिक अनुशासनों से हैं.

सभी आबद्ध उत्तर-आधुनिक अनुशासनों से हैं.
ये सच्चाई है सब की सोच के आयाम बदले हैं.

चढाते थे कभी श्रद्धा से गंगाजल जो सूरज को,
उन्हीं हाथों ने उसकी ऊर्जा के मार्ग खोजे हैं.

स्वयं मैं अक्षरों को पढ़ना चाहूँ पढ़ नहीं सकता,
मेरी जीवन कथा के पृष्ठ सब पानी में डूबे हैं.

कलाओं में कोई लालित्य कैसे ढूंढ पायेगा,
फलक की भंगिमाओं के सभी तेवर अनोखे हैं.

अहिंसा शब्द सुनने में बहोत अच्छा सा लगता है,
मगर व्यवहार में हिंसा के हर सू बोलबाले हैं.

ये शैक्षिक योग्यताएं सांसदों को कब अपेक्षित हैं,
वो शिक्ष और है जिस से चुनावों में वो जीते हैं.

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रविवार, 14 जून 2009

अभिशप्त अकिंचन अमर ज्योति : डायरी के पन्ने 6



रात के साढे ग्यारह बज रहे थे और आँखों में हलकी-हलकी सी नींद झांकने लगी थी. मेज़ से एक ग़ज़ल-संग्रह उठाकर बिस्तर पर लेट गया. कुछ पन्ने उल्टे थे कि एक शेर पर दृष्टि अटक गयी - कोई पूछे मेरा परिचय तो यही कह देना / एक अभिशप्त अकिंचन के सिवा कुछ भी नहीं. शायार का अकिंचन और अभिशप्त होना और फिर भी अश'आर से अंतस में सहज ही प्रवेश कर जाने वाली एक दूधिया अमर ज्योति के एहसास से गुज़रना आर्श्चय जनक था. अकिंचन होना अभिशप्त होना है या अभिशप्त होने में अकिंचन होने का आभास है ! कुछ भी हो, परिस्थितियाँ यदि किसी को अभिशप्त और अकिंचन बना दें तो उसके अंतर-चक्षु स्वतः ही खुल जाते हैं, अपनी पूरी ज्योति के साथ. और इस ज्योति में अमरत्व के स्वरों की धड़कनें पढ़ी जा सकती हैं.
शायर सदियों और लम्हों को माद्दीयत के फ़ीते से नहीं नापता. विध्वंस और रचनात्मकता से क्रमशः इनमें संकुचन और विस्तार आ जाता है. यह प्रक्रिया खुली आँखों से देखने से कहीं अधिक एहसास के राडार पर महसूस की जा सकती है. बात सामान्य सी है किन्तु उसका प्रभाव सामान्य नहीं है - सदियाँ उजाड़ने में तो दो पल नहीं लगे / लम्हे संवारने में ज़माना गुज़र गया. यह विध्वंसात्मक प्रक्रिया जो सदयों को पल-दो-पल में उजाड़ कर रख देती है मंदिरों और मस्जिदों में शरण लेती है और सूली तथा कारावास के रास्ते खोल देती है.रोचक बात ये है कि अपने इस कृतित्व को यह खिरदमंदी का नाम देती है. बात भी ठीक है -जुनूँ का नाम खिरद पड़ गया खिरद का जुनूँ / जो चाहे आपका हुस्ने-करिश्मा-साज़ करे. यहाँ भी शायर की यही समस्या है - इधर मंदिर उधर मस्जिद, इधर ज़िन्दाँ उधर सूली / खिरद-मंदों की बस्ती में जुनूँ वाले किधर जाएँ. इन परिस्थितियों में अहले-जुनूँ की धार्मिक आस्थाएं यदि एक प्रश्न-चिह्न बनकर खड़ी हो जाएँ तो आर्श्चय क्या है - यूँ तो इस देश में भगवान बहोत हैं साहब / फिर भी सब लोग परीशान बहोत हैं साहब. परिस्थितियों का अंतर-मंथन करना एक जोखिम भरा कार्य है. किन्तु यह अकिंचन और अभिशप्त शायर, जिसकी आँखों में कल का सपना है, खतरों से कतराता नहीं, उनका सामना करता है. और एक सीधा सवाल दाग़ देता है - चीमटा, छापा-तिलक, तिरशूल, गांजे की चिलम / रहनुमा अब मुल्क के इस भेस में आयेंगे क्या ? या फिर - थी खबर नोकीले करवाए हैं सब हिरनों ने सींग / भेड़िया मंदिर में जा पहोंचा, भजन गाने लगा.
ग़ज़ल की शायरी बहुत आसान नहीं है.मिसरे बराबर कर लेना ही ग़ज़ल के शिल्प की परिधियों को समझने के लिए पर्याप्त नहीं. ग़ज़ल का फलक माशूक से बात-चीत की इब्तिदाई सरहदें बहुत पहले पार कर चुका है. आज उसका वैचारिक फलक उन सभी संस्कारों को अपने भीतर समेटे हुए है जो इस उत्तर आधुनिक युग की मांग को पूरा करते हैं. किन्तु ग़ज़ल का धीमे स्वरों में बजने वाला साज़ अपने प्रभाव में बादलों का गर्जन और दामिनी की चमक समेट लेने में पूरी तरह सक्षम है. हाँ शब्दों का मामूली सा कर्कश लहजा इसके शरीर पर ही नहीं इसकी आत्मा पर भी खरोचें बना देता है. मुझे यह देख कर अच्छा लगा कि है आँखों में कल का सपना है का रचनाकार इस तथ्य से परिचित भी है और इसके प्रति जागरूक भी.
अभी कल यानी चौदह जून की बात है, दिन के ग्यारह बजे थे मैं अपनी बेटी को स्टेशन छोड़ने के लिए निकलने वाला था. अचानक मोबाइल की घंटी बजी. हेलो, मैं अमर ज्योति बोल रहा हूँ. मुझे शैलेश जी से बात करनी है.
जी मैं शैलेश हूँ.
फिर मेरे और अपने ब्लॉग के सन्दर्भ. अलीगढ़ में ही आवास होने की चर्चा. किसी समय घर आने की पहल. ग़ज़ल संग्रह के छपने की सूचना.
शाम के साढे पांच बजे थे. दरवाज़े पर बेल हुयी. पहले एक भद्र महिला का कोमल स्वर -क्या 55 नंबर का मकान यही है ? जी हाँ. क्या प्रोफेसर शैलेश जैदी ... जी मैं ही हूँ, अन्दर तशरीफ़ लायें. और फिर साथ में एक सज्जन का सहारे से आगे बढ़ना. आदाब मैं अमर ज्योति हूँ.
इस तरह मेरी पहली और अभी तक की आख़िरी मुलाक़ात डॉ. अमर ज्योति नदीम और उनकी पत्नी से हुयी. आँखों में कल का सपना है, ग़ज़ल संग्रह जिसका विमोचन होना अभी शेष है, साथ लाये थे. सब कुछ बहोत अच्छा लगा. ढेर सारी बातें हुयीं. माहौल कुछ गज़लमय सा हो गया, और फिर खुदा हाफिज़ की औपचारिकता.
अभीतक मैंने जितने भी हिंदी के ग़ज़ल-संग्रह पढ़े हैं, दो-एक अपवादों को छोड़ दिया जाय, तो शायद ही कोई रचनाकार ऐसा हो जिसकी हर ग़ज़ल में दो-एक शेर मन को छू जाते हों. डॉ. अमर ज्योति नदीम भी ऐसे ही एक अपवाद हैं. मतले तो विशेष रूप से उनके बहुत सशक्त हैं. कुछ-एक उदाहरण देकर अपनी बात की पुष्टि करना चाहूँगा -नहीं कोई भी तेरे आस-पास क्यों आखिर / सड़क पे तनहा खडा है उदास क्यों आखिर, कभी हिंदुत्व पर संकट, कभी इस्लाम खतरे में / ये लगता है के जैसे हों सभी अक़्वाम खतरे में, पसीने के, धुँए के जंगलों में रास्ता खोजो / गये वो दिन के जुल्फों-गेसुओं में रास्ता खोजो, कह गया था मगर नहीं आया / वो कभी लौट कर नहीं आया, यही आँख थी के जनम-जनम से जो भीगने को तरस गयी / इसी खुश्क आँख की रेत से ये घटा कहाँ से बरस गयी, दरो-दरीचओ-दीवारो-सायबान था वो / जहां ये उम्र कटी, घर नहीं, मकान था वो, मुद्दतों पहले जहां छोड़ के बचपन आये / बारहा याद वो दालान वो आँगन आये इत्यादि.
अमर ज्योति नदीम की विशेषता ये है कि उनके कथ्य की पूँजी बहुत सीमित नहीं है. रिक्शे वाले से लेकर किसान और गोबर बीनती लड़कियों तक, पंक्ति में लगे हुए मज़दूरों के जमघट से लेकर बेरोजगारों की चहलक़दमी तक उनकी दृष्टि सभी की खैरियत पूछना चाहती है. कुछ अशआर देखिये -जेठ मॉस की दोपहरी में जब कर्फ्यू सा लग जाता है / अमलतास की छाया में सुस्ता जाते हैं रिक्शे वाले, कैसा पागल रिक्शे वाला / रिक्शे पर ही सो जाता है, ये कौन कट गया पटरी पे रेल की आकर / सुना है क़र्ज़ में डूबा कोई किसान था वो, गोबर भी बीनें तो सूखा क्या मिलता है / आँखें ही जलती हैं चूल्हा सुलगाने से, चले गाँव से बस में बैठे और शहर तक आये जी / चौराहे पर खड़े हैं शायद काम कोई मिल जाए जी, महकते गेसुओं के पेचोखम गिनने से क्या होगा / सड़क पर घुमते बेरोजगारों को गिना जाए,
ज़िन्दगी की चहारदीवारियों के इर्द-गिर्द जो कंटीला यथार्थ पसरा पड़ा है डॉ. अमर ज्योति नदीम कि नज़रें उससे अपना दमन नहीं बचातीं, बल्कि कुछ रुक कर, ठहर कर उसे अपने दामन में भर लेने का प्रयास करती हैं. शायर की यही अभिशप्त अकिंचन पीडा उसके दर्द में ज्योति का संचार करती है और यह ज्योति अमरत्व के पायदान पर खड़ी, आँखों में कल का सपना संजोती दिखाई देती है. ऐसे ही कुछ शेर उद्धृत कर के अपनी बात समाप्त करता हूँ-
पत्थर इतने आये लहू-लुहान हुयी / ज़ख्मी कोयल क्या कूके अमराई में, दिल के दरवाज़े पे दस्तक बारहा होती रही / हमसे मिलने को मगर आया वहां कोई नहीं, कोई सुनता नहीं किसी की पुकार / लोग भगवान हो गये यारो, कमरे में आसमान के तारे समा गये / अच्छा हुआ के टूट के शीशा बिखर गया, उसे पडोसी बहोत नापसंद करते थे / वो रात में भी उजालों के गीत गाता था, वो खो गया तो मेरी बात कौन समझेगा / उसे तलाश करो मेरा हमज़बान था वो, सुना तो था के इसी राह से वो गुज़रे थे / तलाश करते रहे नक्शे-पा कहीं न मिला, बडकी हुयी सयानी उसकी शादी की क्या सोच रहे हो / दादी पूछेंगी और उनसे कतरायेंगे मेरे पापा, उधर फतवा कि खेले सानिया शलवार में टेनिस / ज़मीनों के लिए हैं इस तरफ श्रीराम खतरे में.
मुझे यकीन है कि डॉ. अमर ज्योति नदीम भविष्य में और भी अच्छी ग़ज़लें कहेंगे. मेरी शुभ-कामनाएं उनके साथ हैं.
शायर : डॉ. अमर ज्योति नदीम, ग़ज़ल-संग्रह : आँखों में कल का सपना है, प्रकाशक : अयन प्रकाशन, महरौली, नयी दिल्ली. मूल्य : एक सौ बीस रूपये.
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सोमवार, 27 अप्रैल 2009

ये ग़लत है के वहां हाशिया-आराई न थी.

ये ग़लत है के वहां हाशिया-आराई न थी.
देखती जो उसे आँखों में वो बीनाई न थी.

शुक्र है उसने बयानों में तवाज़ुन बरता,
कुछ भी कह देता वो उसकी कोई रुसवाई न थी.

ऐसी फिकरों में बलंदी नज़र आती कैसे,
जिनकी बुनियाद में मुतलक कोई गहराई न थी.

वो महज़ मेरे तसौव्वुर का करिश्मा निकला,
दर हकीकत कोई पैकर कोई अंगडाई न थी.

किस तरह सामने से हो गया मंज़र ओझल,
आँख हमने तो किसी पल कभी झपकाई न थी.

मेरे आँगन में ही वो पेड़ खडा था लेकिन,
फल गिरे उसके जहां वो मेरी अंगनाई न थी.
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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

दरिया की ये आहिस्ता-ख़रामी कोई देखे.

दरिया की ये आहिस्ता-ख़रामी कोई देखे.
संजीदगिये-ज़ह्न की खूबी कोई देखे.

शतरंज के मुहरों के फ़साने हुए नापैद,
तस्वीर बिसातों की है उलटी कोई देखे.

आवाज़ए-हक़ गूंजने से आज है क़ासिर,
हर क़ल्ब सदाओं से है खाली कोई देखे.

वो आग के दरिया से निकल आया सलामत.
साहिल पे हुई ग़र्क़ वो कश्ती कोई देखे.

क्या बात है, क्यों शोला-फ़िशां हो गया कुहसार,
लावा है रवां आग है बहती कोई देखे.

हर लह्ज़ा हुआ करती है हर फ़िक्र की तरदीद,
हैरानो-परीशान है जो भी कोई देखे.
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बुधवार, 22 अप्रैल 2009

वो आसमानों से रखता है हमसरी का जुनूं.

वो आसमानों से रखता है हमसरी का जुनूं.
ज़मीन-दोज़ न कर दे उसे उसी का जुनूं.

जदीदियत का धुंआ भर रहा था आँखों में,
ठहर सका न वहां फिक्रो--आगही का जुनूं.

सवाले-सूदो-ज़ियाँ उसके सामने कब था,
नुमायाँ करता रहा उसको सादगी का जुनूं.

नसीहतों से है अंदेशा संगबारी का,
शबाब पर है ज़माने में गुमरही का जुनूं.

नतीजा सिर्फ ये था उसकी खुद-कलामी का,
के रास आया उसे शरहे-बेखुदी का जुनूं.

मुहर्रेकात हैं तख्लीक़े-नौ के आवारा,
समेटता है इन्हें दिल की बेकली का जुनूं.

ज़मीं की क़ूवते-बर्दाश्त को न अब परखो,
तबाह-कुन है बहोत उसकी बरहमी का जुनूं.
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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

ज्वालामुखी से आग का पानी उबल पड़ा.

ज्वालामुखी से आग का पानी उबल पड़ा.
सागर को सूंघता हुआ शोला निकल पड़ा.

आकाश की लगाम समंदर के पास थी,
बारिश की चाह में कोई बादल मचल पड़ा.

पर्वत के गर्भ में किसी झरने का शोर था,
इच्छा हुई जगत की तो बाहर उछल पड़ा.

थोडी सी जान शेष है अब भी पठार में,
छूकर शरीर देखिये कबसे है शल पड़ा.

धरती का वक्ष फट गया कुछ ऐसी प्यास थी,
मालिश फुहारें करती रहीं पर न कल पड़ा.

पेड़ों में कितनी आग थी चिंतित न था कोई,
हलकी रगड़ हुई तो ये जंगल ही जल पड़ा.
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रविवार, 19 अप्रैल 2009

मन के नीरव कुञ्ज में वंशी की मीठी तान पर.

मन के नीरव कुञ्ज में वंशी की मीठी तान पर.
गोपियों के नृत्य की अनुपम छटा है शान पर. .

इन कदम्बों के ये कुसुमित पुष्प गहरे हैं बहोत,
कुछ चकित होते नहीं ये प्यार के अनुदान पर.

देख कर चंचल नयन की भाव भीनी भावना,
हो गयीं राधा समर्पित कृष्न की मुस्कान पर.

अब नहीं आता कभी मन में किसी का भी विचार,
दृष्टि केन्द्रित हो चुकी है अब उसी के ध्यान पर.

हम गली-कूचों में गोकुल के उसे देखा किये,
हमने पायी उसकी महिमा आज भी पर्वान पर.

दी थी जमुना की रुपहली रेत ने चेतावनी,
देखो पग रखना संभल कर प्रेम के सोपान पर.
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शनिवार, 18 अप्रैल 2009

प्रयास मन कभी ऐसे अनर्थ का न करे.

प्रयास मन कभी ऐसे अनर्थ का न करे.
के सुन के बांसुरी, गोकुल की कल्पना न करे.

मैं उसके प्यार को मन में उतार बैठा हूँ,
दवा ये ऐसी नहीं है जो फ़ायदा न करे.

रहेगी कैसे वो जीवित कभी विचारों में,
दिलो-दिमाग़ को आकृष्ट जो कला न करे.

हुआ हूँ उससे अलग, पर ये हो नहीं सकता,
के उसके पक्ष में ये मन कभी दुआ न करे.

पसंद आये न कोई तो साथ क्यों रहिये,
जो साथ रहना है तो दिल कभी बँटा न करे.

न जाने कबसे है नारी विमर्श चर्चा में,
घरों में फिर भी किसी के असर ज़रा न करे.

जमें न पाँव कभी जिसके अंगदों की तरह,
वो लंकाधीशों में जाने का हौसला न करे.
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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

धर्म की दीमक हुआ करती है वैसे भी सशक्त.

धर्म की दीमक हुआ करती है वैसे भी सशक्त.
लोकतांत्रिक कुर्सियों पर दृष्टि है इसकी सशक्त.

स्वात-घाटी से कोई अनुबंध हो सकता न था,
होते सत्ता में अगर थोडा भी ज़रदारी सशक्त.

पाके जन-आधार विकसित जब हुई संकीर्णता,
नींव कट्टर-पंथ की होती गयी खुद ही सशक्त.

उस अयोध्या में परस्पर प्रेम से रहते थे सब,
धर्म के भूकंप ने आकर घृणा कर दी सशक्त.

साम्प्रदायिक भाषणों में और कुछ हो या न हो,
राजनेताओं की इनसे हो गयी कुर्सी सशक्त.

करके नर-संहार लोकप्रीयता ऐसी मिली,
सब चकित से रह गए, होते गए मोदी सशक्त.

भूमिकाएं अब चुनावों की बहोत रोचक सी हैं,
सब दलों ने चुन लिए हैं अपने कुछ साथी सशक्त.

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रविवार, 29 मार्च 2009

मैं शिव नहीं हूँ, के गंगा जटा से निकलेगी.

मैं शिव नहीं हूँ, के गंगा जटा से निकलेगी.
मनुष्य हूँ, ये मेरी साधना से निकलेगी.

नहा के आया हूँ मंदाकिनी के तट से अभी,
कला संवर के मेरी हर सदा से निकलेगी.

वो द्रौपदी थी जिसे पांडव थे हार चुके,
न कोई महिला कभी यूँ सभा से निकलेगी.

कटा हुआ वो अंगूठा हूँ एकलव्य का मैं,
कि जिसकी आह गुरू दक्षिणा से निकलेगी.

कहा था सपनों में 'ल्यूनार्दो' ने मुझसे कभी,
ये 'कैथारीना' ही 'मोनालिज़ा' से निकलेगी.

करेंगे यज्ञ युधिष्ठिर कि मुक्त पाप से हों,
दुआ शगुन की, दलित आत्मा से निकलेगी.

मिथक के बिम्ब नहीं हैं कहीं त्रिवेणी में,
बस एक श्रद्धा की छाया फ़िज़ा से निकलेगी.
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शनिवार, 28 मार्च 2009

हम इतने तजस्सुस से न देखें तो करें क्या.

हम इतने तजस्सुस से न देखें तो करें क्या.
जानें तो सही, लोगों की हैं आरज़ुएं क्या.
छुपती है कहाँ चेहरे पे आई हुई सुर्खी,
एहसास है, कहती हैं ये कानों की लवें क्या.
वो कहते हैं अच्छा नहीं लोगों से उलझना,
होता हो कहीं ज़ुल्म, तो खामोश रहें क्या.
क्यों खैरियतें पूछते हैं आप मुसलसल,
देना भी अगर चाहें, जवाब आपको दें क्या.
देहलीज़े-सियासत में क़दम रखना है मुश्किल,
किसको है खबर कब यहाँ तूफ़ान उठें क्या.
हर लम्हा तो रहती है उसे फ़िक्र हमारी,
आँखों में किसी शख्स की अब और चुभें क्या.
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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

ये आँखें जब कभी इतिहास के मलबे से निकलेंगी.

ये आँखें जब कभी इतिहास के मलबे से निकलेंगी.
हमें विशवास है अलगाव के फंदे से निकलेंगी.

किसी मस्जिद में तुलसीदास का बिस्तर लगा होगा,
अज़ानें भी किसी मंदिर के दरवाज़े से निकलेंगी.

बजाहिर जो दिखाई दे वही सच हो नहीं सकता,
गुबारों की तहें क़ालीन के नीचे से निकलेंगी.

परिस्थितियों से लड़ते लेखकों के दिन भी लौटेंगे,
विदेशों की तरह जब पुस्तकें रुतबे से निकलेंगी.

हमारे संस्कारों की जड़ें मज़बूत हैं अब भी,
ज़मीनें तोड़ कर दुनिया के हर गोशे से निकलेंगी.

छुपी हैं आज प्रतिभाएं जो पिछडेपन के परदे में,
समय अनुकूल होने पर ये खुद परदे से निकलेंगी.

स्वयं अपने ही घर वाले सुनेंगे किस तरह उनको,
वो आहें भीगने पर रात जो चुपके से निकलेंगी.

गुरुवार, 26 मार्च 2009

रचनाओं में झलकता नहीं आत्मा का रंग.

रचनाओं में झलकता नहीं आत्मा का रंग.
भौतिक प्रदर्शनों ने है छीना कला का रंग.
उद्योग के विकास के हैं रास्ते खुले,
हर स्वस्थ-प्रक्रिया में है संभावना का रंग.
उत्साह ने प्रशस्त किये पथ, तो चल पड़ा,
सीमाओं में बंधा न किसी भी युवा का रंग.
अब झांकते हैं विश्व के वातायनों से हम,
अब किस में बाप-दादा की है संपदा का रंग.
दुख है तो संसदीय शिथिलताओं पर हमें,
क्या लौट पायेगा कभी निश्चिन्तता का रंग.
संसद के ये चुनाव अशिक्षित समाज को,
देते नहीं विचारों की स्वाधीनता का रंग.
कर्जे ने तोड़ दी है कमर हर किसान की,
सरकार है खुदा, तो उड़ा है खुदा का रंग.
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रिक्त हैं आँखों से सपने, नींद भी है लापता.

रिक्त हैं आँखों से सपने, नींद भी है लापता.
शून्य में साँसें टंगी हैं, ज़िन्दगी है लापता.
कैसी नीरवता है, ध्वनियाँ तक नहीं होतीं कहीं,
पाश में हैं सब तिमिर के, रोशनी है लापता.
गाँव के सन्नाटे पथ में रात बस भीगी ही थी,
सब ठगे से हैं, वधू की पालकी है लापता.
जी चुके जितना था जीना,लक्ष्य अब कोई नहीं,
किस दिशा में जाएँ, क्या सोचें, ख़ुशी है लापता.
हम न सुन पाए उजालों की कभी शहनाईयां,
राग जिसमें थे हजारों, वो नदी है लापता.
हम पुराने लोग सीखें कैसे ये जीने के ढब,
टीम-टाम इतने बहोत हैं, सादगी है लापता।
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