Tuesday, June 16, 2009

सब कुछ रवां-दवाँ है बज़ाहिर सुकून है।

सब कुछ रवां-दवाँ है बज़ाहिर सुकून है।

बस ज़िन्दगी गराँ है बज़ाहिर सुकून है.

काग़ज़ की कश्तियों में हैं साँसों के क़ाफ़्ले,

दरिया हरीफ़े-जाँ है बज़ाहिर सुकून है.

चस्पाँ दिलों के दर पे है दहशत का इश्तेहार,

हर शख्स बे-ज़ुबाँ है बज़ाहिर सुकून है.

ज़ेरे-लिबासे-तक़वा सियः-कारियाँ हैं आम,

ईमान खूँ-चकाँ है बज़ाहिर सुकून है.

अंदेशए - शरारते - बे-जा फ़िज़ा में है,

मंज़र शरर - फ़िशां है बज़ाहिर सुकून है।

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रवां-दवाँ = गतिशील, गराँ = महँगी, हरीफ़े-जाँ = जान का दुश्मन, चस्पाँ =चिपका हुआ, इश्तेहार =विज्ञापन, ज़ेरे-लिबासे-तक़वा =सात्विकता के वस्त्रों के नीचे, सियः कारियाँ = काले धंधे, खूँ-चकाँ = खून से भरा हुआ, अंदेशए-शरारते-बेजा = बेतुके उपद्रव की आशंका, शरर-फ़िशां = चिंगारियों से भरा हुआ।

1 comment:

विनय said...

बहुत अच्छी रचना है, उर्दू अल्फ़ाज़ का ज्ञानवर्धन भी हुआ, शुक्रिया