Tuesday, June 22, 2010

क़त्ल की साज़िशों से क्या हासिल्

क़त्ल की साज़िशों से क्या हासिल्।
तुमको इन काविशों से क्या हासिल्॥

इश्क़ पाबन्द हो नहीं सकता,
इश्क़ पर बन्दिशों से क्या हासिल्॥

मुझको ख़ामोश कर न पाओगे,
ज़ुल्म की वरज़िशों से क्या हासिल्॥

कौन सुनता है अब अदालत में,
दर्द की नालिशों से क्या हासिल्॥

हो नहीं सकतीं जो कभी पूरी,
ऐसी फ़रमाइशों से क्या हासिल्॥

मुझ तक आये तो कोई बात बने,
जाम की गरदिशों से क्या हासिल्॥

फ़ासले किस लिए बढाते हो,
बे वजह रंजिशों से क्या हासिल्॥
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3 comments:

निर्मला कपिला said...

दूसरा और आखिरी शेर तो क्या खूब कहा। इसका ये मतलव नही कि बाकी अच्छे नही लगे मगर ये दोनो दिल को छू गये।काविशों का अर्थ समझ नही आया मगर शेर के भाव समझ आ गये। आभार।

इस्मत ज़ैदी said...

मुझको ख़ामोश कर न पाओगे,
ज़ुल्म की वरज़िशों से क्या हासिल्॥

फ़ासले किस लिए बढाते हो,
बे वजह रंजिशों से क्या हासिल्॥

सच है रंजिशें घर तोड़ देती हैं,मुल्क को टुकड़ों में बांट देती हैं
इंसान से वो करवा देती हैं जो इंसानियत के ही ख़िलाफ़ होता है
किसी समस्या का हल क़त्ल ओ ग़ारत नहीं ये बात लोगों को कब समझ में आएगी

MUFLIS said...

मुझको ख़ामोश कर न पाओगे ,
ज़ुल्म की वरज़िशों से क्या हासिल

आज की ग़ज़ल के तेवर को शान से बयान करता हुआ ये शेर
apni मिसाल खुद आप हो गया है

और
हो नहीं सकतीं जो कभी पूरी ,
ऐसी फ़रमाइशों से क्या हासिल
मन में कहीं गहरे झाँक कर कह पाने वाली बात
इस मासूम शेर में बहुत जँच रही है
मुबारकबाद .