Thursday, May 6, 2010

सफ़र का सारा मंज़र सामने था

सफ़र का सारा मंज़र सामने था।
कहीं बच्चे कहीं घर सामने था्।

हमें जो ले गया मक़्तल की जानिब,
थका-माँदा वो लश्कर सामने था॥

मिली थी नोके-नैज़ा पर बलन्दी,
मैं हक़ पर था मेरा सर सामने था।

फ़ना के साहिलों से क्या मैं कहता,
बक़ा क जब समंदर सामने था॥

तलातुम मौजे-दरिया में न होता,
कोई प्यासा बराबर सामने था॥

हँसी आती थी नादानी पे उसकी,
मज़ा ये है सितमगर सामने था॥
********

3 comments:

आनन्‍द पाण्‍डेय said...

great gazal sir

Shekhar Kumawat said...

bhut khub



shabdar

इस्मत ज़ैदी said...

मिली थी नोके-नैज़ा पर बलन्दी,
मैं हक़ पर था मेरा सर सामने था

बहुत ख़ूब!
बिल्कुल सही कहा आपने ,हक़ गोई की वजह से ख़्वाह सर नोक ए नैज़ा पर ही हो लेकिन होता बलंदी पर है ,

http://www.ismatzaidi.blogspot.com/
कभी यहां तशरीफ़ लाएं ताकि मैं आप के मश्वरों से मुस्तफ़ीद हो सकूं
शुक्रिया