Wednesday, May 12, 2010

कहता मुक्तक और ग़ज़ल्

कहता मुक्तक और ग़ज़ल्।
दर्शाता युग की हलचल्।
पढ न सकोगे मुझको तुम,
अक्षर-अक्षर मेरे तरल॥
चिन्तन मेरा अमृत-कुण्ड,
वाणी मेरी गंगाजल ॥
बाहर से हूं वज्र समान,
भीतर से बेहद कोमल्॥
नीलकंठ का है संकल्प,
गरल समाहित वक्षस्थल्॥
कभी हूं बिंदिया माथे की,
कभी हूं आँखों का काजल ॥
सुन्दरता का अवगुंठन,
ममता का रसमय आँचल्॥
नादरहित,निःस्वर, निष्काम,
मैं सूने घर की साँकल्॥
मुझमें देखो अपना रूप,
मैं दर्पण जैसा निश्छल्॥
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3 comments:

शारदा अरोरा said...

माँ की झिड़की भी तो सुधार के लिए होती है , ग़ज़ल न होते हुए भी लयबद्धता है ।

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत सुन्दर रचना है ... पढके विमुग्ध हो गया !

सुमन'मीत' said...

चुनिन्दा शब्दों में लिखी गई सुन्दर रचना