Friday, March 20, 2009

मैं हताशाओं के घेरे में नहीं था.

मैं हताशाओं के घेरे में नहीं था.
रोशनी में था, अँधेरे में नहीं था.
पर्वतों सा एक भी नैराश्य मन की,
संहिताओं के सवेरे में नहीं था.
चक्षुओं में था सुरक्षित वो तमाशा,
सांप में विष था, सँपेरे में नहीं था.
नोकरी की खोज में निकला था प्रातः,
रात बीती और डेरे में नहीं था.
मैं हुआ अस्तित्व में उसके समाहित,
प्राण का पंछी बसेरे में नहीं था.
एक पल का भी वियोजन हो न पाया,
वो मगर 'मैं' और 'मेरे' में नहीं था.
मैं स्वतः लुटता रहा निःशब्द होकर,
कौन सा गुण उस लुटेरे में नहीं था.
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2 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

'मैं स्वतः लुटता रहा…'
बेहतरीन! बधाई।

गौतम राजरिशी said...

"एक पल का भी वियोजन हो न पाया/वो मगर 'मैं' और 'मेरे' में नहीं था" गज़ब का शेर शैलेश जी और आखिरी शेर ने तो उफ़्फ़्फ़...