Saturday, January 30, 2010

वो हब्से-दवामी है कहीं आज भी मौजूद

वो हब्से-दवामी है कहीं आज भी मौजूद ।
एहसासे-ग़ुलामी है कहीं आज भी मौजूद्॥

मसदूद हैं सब रास्ते इन्साँ की बक़ा के,
अफ़कार में ख़ामी है कहीं आज भी मौजूद्॥

अमवाजे-समन्दर में नहीं कोई तलातुम,
पर ख़ौफ़े-सुनामी है कहीं आज भी मौजूद ॥

इक दौड़ सी है इशरते-दुनिया की तलब में,
हर कूफ़िओ-शामी है कहीं आज भी मौजूद ॥

अहबाब को शिकवा है के अशआर में जाफ़र,
कुछ तुर्श कलामी है कहीं आज भी मौजूद ॥
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1 comment:

कमलेश वर्मा said...

sir aap ko wah-wah nhi karwani to na karao pr aap ki rchna me kintu prntoo karna kisi ko bhi shobha nhi dega . aap itne prtisthit vishv vidyaly ke prachary hain ...ab bhi aap ko apni rchnaon me shodh ki jaroorat hai kya?????