Tuesday, April 27, 2010

कल थीं रसमय भूल गयी हैं

कल थीं रसमय भूल गयी हैं ।
कविताएं लय भूल गयी हैं॥
अहंकार-गर्भित सत्ताएं,
विजय परजय भूल गयी हैं॥
समय खिसकता सा जाता है,
कन्याएं वय भूल गयी हैं॥
लगता है अपनी ही साँसें,
अपना परिचय भूल गयी हैं॥
संघर्षों में रत पीड़ाएं,
मन का संशय भूल गयी हैं॥
हाथ की रेखाएं भी शायद,
अपना निर्णय भूल गयी हैं॥
चिन्ताएं बौलाई हुई हैं,
मंज़िल निश्चय भूल गयी हैं॥
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2 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी कविता।

हिंदीब्लॉगजगत said...

ब्लौगर मित्र, आपको यह जानकार प्रसन्नता होगी कि आपके इस उत्तम ब्लौग को हिंदीब्लॉगजगत में स्थान दिया गया है. ब्लॉगजगत ऐसा उपयोगी मंच है जहाँ हिंदी के सबसे अच्छे ब्लौगों और ब्लौगरों को ही प्रवेश दिया गया है, यह आप स्वयं ही देखकर जान जायेंगे.
आप इसी प्रकार रचनाधर्मिता को बनाये रखें. धन्यवाद.