Monday, April 12, 2010

उल्झनें मन में अगर हैं तो समस्याएं हैं।

उल्झनें मन में अगर हैं तो समस्याएं हैं।
अन्यथा जीने में सौ तर्ह की सुविधाएं हैं॥

आस्थाओं में भी शायद कहीं स्थैर्य नहीं,
कभी विश्वास है मन में कभी दुविधाएं हैं॥

मार्ग दर्शक उन्हें स्वीकार करें हम कैसे,
ज़िन्दगी में जो कभी दाएं कभी बाएं हैं॥

जन्म लेती हैं वो चिन्ताओं के भीतर से कहीं,
हम समझते हैं जिन्हें राह की बाधाएं हैं॥

एक उद्देश्य है जिसके लिए गतिशील हैं हम,
मन में कुछ स्वप्न हैं,संकल्प है, आशाएं हैं॥
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4 comments:

Randhir Singh Suman said...

nice

कबीर कुटी - कमलेश कुमार दीवान said...

achcha kaha hai .

संजय भास्‍कर said...

इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....

RAJWANT RAJ said...

margdrshk unhe hm swikar kre hm kaise jinggi me jo kbhi .........
bhut ghri bat khi hai aapne . sath hi kud pe bhrosa krne ka sndesh bhi hai
jo achchha lga .