Wednesday, April 14, 2010

फ़िज़ा में आइनों के अक्स जब दम तोड़ देते हैं

फ़िज़ा में आइनों के अक्स जब दम तोड़ देते हैं।
रुपहले ख़्वाब सब थक हार कर हम तोड़ देते हैं॥

लिए मजबूरियाँ हम दर-ब-दर फिरते हैं बस्ती में,
कभी ज़ख़्मों की सौग़ातें कभी ग़म तोड़ देते हैं॥

लबालब मय न हो तो लुत्फ़ पीने का नहीं आता,
वो साग़र जिसमें हो मेक़दार कुछ कम तोड़ देते हैं॥

रुलाया है बहोत उसने तुझे अफ़सुरदा लमहों में,
तअल्लुक़ उस से अब ऐ चश्मे पुरनम तोड़ देते हैं॥

जुनूं में होश अपनी ज़िन्दगी का कुछ नहीं होता,
बनाते हैं जिसे हम ख़ुद वो आलम तोड़ देते हैं॥
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2 comments:

Randhir Singh Suman said...

nice

ठाकुर पदम सिंह said...

इतनी अच्छी गज़ल पर एक कमेन्ट ?
बहुत नाइंसाफी है ....
बहुत अच्छा लिखते हैं आप ... बधाई