ग़ज़ल / ज़ैदी जाफ़र रज़ा / पेश कितनी भी दलीलें करो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग़ज़ल / ज़ैदी जाफ़र रज़ा / पेश कितनी भी दलीलें करो लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 9 नवंबर 2008

पेश कितनी भी दलीलें करो, मानेगा नहीं.

पेश कितनी भी दलीलें करो, मानेगा नहीं.
दूसरे भी हैं सही, ये कभी समझेगा नहीं.
*******
ऐब देखेगा वो तुम में, ये है फ़ितरत उसकी,
ख़ुद कभी अपने गरीबान में झांकेगा नहीं.
*******
लुत्फ़ ये है कि समझता है वो आलिम ख़ुद को,
यानी, कम-इल्मी के इक़रार से गुज़रेगा नहीं.
*******
नाग का ज़ह्र भी है उसमें, है खसलत भी वही,
जिसके पड़ जायेगा पीछे, उसे बख्शेगा नहीं.
*******
वो समझता है कि सब कुछ है उसी के दम से,
अपनी खुश-फ़हमियों के खोल से निकलेगा नहीं.
*******
जानलेवा हुआ करता है ये मज़हब का नशा,
जिसको चढ़ जायेगा, आसानी से उतरेगा नहीं.
*********************