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शुक्रवार, 30 मई 2008

ज़ैदी जाफ़र रज़ा की दो ग़ज़लें

[ 1 ]
न जाने कब से हैं सहरा कई बसाए हुए
हुई हैं मुद्दतें, आंखों को मुस्कुराए हुए
ये माहताब न होता, तो आसमानों पर
सितारे आते नज़र और टिमटिमाए हुए
समंदरों की भी नश्वो-नुमा हुई होगी
ज़माना राज़ ये सीने में है छुपाए हुए
हर एक दिल में खलिश क्यों है एक मुब्हम सी
नक़ाब चेहरे से है वक्त क्यों हटाए हुए
इस इंतज़ार में आयेंगे फिर नए पत्ते
शजर को अरसा हुआ पत्तियां गिराए हुए
हवा के झोंकों में हलकी सी एक खुश्बू है
तुम आज लगता है इस शहर में हो आए हुए
गुलाब-रंग कोई चेहरा अब कहीं भी नहीं
ज़मीं पे अब्र के टुकड़े हैं सिर्फ़ छाए हुए
लगे हैं ज़ख्म कई दिल पे संगबारी में
के लोग सर पे हैं तूफ़ान सा उठाए हुए
किताबें पढ़के नहीं होती अब कोई तहरीक
जुमूद अपने क़दम इनमें है जमाए हुए
परिंदे जाके बलंदी पे, लौट आते हैं
के इन के दिल हैं नशेमन से लौ लगाए हुए
अजीब थे वो मुसाफ़िर, चले गए चुपचाप
दिलों में अब भी कहीं हैं मगर समाए हुए
[ 2 ]
शिकस्त-खुर्दा न था मैं, गो फ़त्हयाब न था
के मेरी राह में, मायूसियों का बाब न था
कभी मैं वक्त का हमसाया, बन नहीं पाया
के वक्त, साथ कभी, मेरे हम-रकाब न था
समंदरों को, मेरे ज़र्फ़ का था अंदाजा
जभी तो, उनके लिए मैं, फ़क़त हुबाब न था
ज़बां पे कुफ्ल लगा कर, न बैठता था कोई
वो दौर ऐसा था, सच बोलना अज़ाब न था
गुज़र गया वो भिगो कर सभी का दामने-दिल
कोई भी ऐसा नहीं था जो आब - आब न था
मैं हर परिंदे को शाहीन किस तरह कहता
हकीक़तें थीं मेरे सामने, सराब न था
तवक्कोआत का फैलाव इतना ज़्यादा था
के घर लुटा के भी अपना, वो बारयाब न था
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