Friday, March 12, 2010

कभी कमी कोई आयी न इन ख़ज़ानों में

कभी कमी कोई आयी न इन ख़ज़ानों में।
के दौलतें हैं बहोत इश्क़ के फ़सानों में ॥
मैं ख़िरमनों की तबाही का ज़िक्र क्या करता,
ये बात ग़र्म बहोत थी कल आसमानों में॥
हवाएं करतीं मदद किस तरह सफ़ीनों की,
जगह जगह पे थे सूराख़ बादबानों में॥
हरेक की क़ीमतें चस्पाँ हैं उसके चेहरे पर,
सजे हैं जिन्स की सूरत से हम दुकानों में॥
मैं हक़-पसन्द था ये कम ख़ता न थी मेरी,
सज़ा ये थी के रहूं जाके क़ैदख़ानों में॥
मेरे ख़मीर में है एहतेजाज की मिटटी,
वुजूद मेरा मिलेगा सभी ज़मानों में॥
वो उनसियत, वो मुहब्बत, वो आपसी रिश्ते,
न जाने क्यों हुए नापैद ख़न्दानों में॥
कभी कभी मुझे एहसास ऐसा होता है,
के जैसे रक्खा हूं मैं तोप के दहानों में॥
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1 comment:

Randhir Singh Suman said...

मैं ख़िरमनों की तबाही का ज़िक्र क्या करता,
ये बात ग़र्म बहोत थी कल आसमानों में.nice