Friday, July 2, 2010

दर्द या दर्द का कोई पहलू नहीँ

दर्द या दर्द का कोई पहलू नहीँ।
देवताओं की आँखों में आँसू नहीं॥

लोग मिलते हैं अब भी बड़े जोश से,
पर ख़ुलूसो-मुहब्बत की ख़ुश्बू नहीं॥

जैसी मरज़ी हो पर्वाज़ करता रहे,
तायरे नफ़्स पर कोई क़ाबू नहीं॥

ये नयी नस्ल करती है ख़ुद फ़ैस्ले,
अब बुज़ुरगों में शायद वो जादू नहीं॥

दिल है ऐसा कोई जो धड़कता न हो,
कोई ऐसी जगह है जहाँ तू नहीं॥
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9 comments:

निर्मला कपिला said...

हर एक शेर लाजवाब । धन्यवाद।

डॉ० डंडा लखनवी said...

वाह........वाह.......

इस्मत ज़ैदी said...

जैसी मरज़ी हो पर्वाज़ करता रहे,
तायरे नफ़्स पर कोई क़ाबू नहीं॥
चारों तरफ़ फैली बे रहरवी की वजह ही यही है कि नफ़्स पर क़ाबू नहीं रह गया है हम में

ये नयी नस्ल करती है ख़ुद फ़ैस्ले,
अब बुज़ुरगों में शायद वो जादू नहीं॥
ये फ़र्क़ तो २ नस्लों के बीच हमेशा रहा लेकिन फिर बात जेहाद ए नफ़्स की ही आ जाती है


दिल है ऐसा कोई जो धड़कता न हो,
कोई ऐसी जगह है जहाँ तू नहीं॥
बेहतरीन ग़ज़ल !
बहुत ख़ूब !
आसान अल्फ़ाज़ में अंदरूनी जद्दो जहद की बड़ी ख़ूबी के साथ अदायगी की गई है

वन्दना अवस्थी दुबे said...

लोग मिलते हैं अब भी बड़े जोश से,
पर ख़ुलूसो-मुहब्बत की ख़ुश्बू नहीं॥
क्या बात है!! बहुत बड़ा सच है ये.
ये नयी नस्ल करती है ख़ुद फ़ैस्ले,
अब बुज़ुरगों में शायद वो जादू नहीं॥
शब्द नहीं हैं मेरे पास. दरअसल ऐसी रचनाएं केवल पढने और गुनने के लिये होती हैं, उन्हें आह-वाह की ज़रूरत ही नहीं.

बेचैन आत्मा said...

ये नयी नस्ल करती है ख़ुद फ़ैस्ले,
अब बुज़ुरगों में शायद वो जादू नहीं॥
...lazvaab aur hamesha yaad ho jane vaala yah sher..! doosre misre men 'jadoo' itna satiik baith raha hai ki kya kahen ...'jadoo' shabd se mohit hoon.

pkrocksall said...

bahut hi badhiyan hai..
kripya meri bhi kavita padhi jaay..
aap logon ki tarah uchchc koti ki to nahi..fir bhi maine kosis ki hai apni taraf se..
http://pkrocksall.blogspot.com/

निर्मला कपिला said...

अपको ईद की बहुत बहुत मुबारक।

Dr. Amar Jyoti said...

एक लम्बे अरसे के बाद आना हुआ आपके ब्लॉग पर.
आते ही पता चल गया की किस नेमत से वंचित रहा
इतने दिन.
'.........................
देवताओं की आँखों में आंसू नहीं'
'.............................................
पर ख़ुलूसो-मुहब्बत की ख़ुशबू नहीं'
मन को छू गए. और
'ये नयी नस्ल करती है ख़ुद फ़ैस्ले,
अब बुज़ुरगों में शायद वो जादू नहीं॥'
ये तो हासिले ग़ज़ल शेर है.
हार्दिक बधाई.

Udan Tashtari said...

साल भर होने वाला है..जरा कुछ नया लाईये. ब्लॉग रुका अच्छा नहीं लगता...नियमित पोस्ट लगायें, शुभकामनाएँ.