Friday, October 31, 2008

दूर इंसानों से दरया था रवां सब से अलग

दूर इंसानों से दरया था रवां सब से अलग.
वक़्त ने रहने दिया उसको कहाँ सब से अलग.
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अब किसी के सामने दिल खोलते डरते है लोग,
कर दिया हालात ने सबको यहाँ सब से अलग.
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नफ़रतों की भीड़ में, उल्फ़त की बातें हैं फ़ुज़ूल,
आओ चलकर बैठते हैं हम वहाँ सब से अलग.
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अब हमारे शह्र में भी है इलाक़ाई चुभन,

अब हमारे शह्र की भी है जुबां सब से अलग.
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मस्लकों, सूबों, ज़बानों से है कुछ ऐसा लगाव,
एक लावारिस सा है हिन्दोस्ताँ सब से अलग.
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ख़ुद मेरे अन्दर किसी लमहा हुआ ये हादसा,
रूह को देखा तड़पते, जिस्मो-जाँ सब से अलग.
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2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

जमा होते रहे लोग ऐसे ही हो कर अलग
उठने लगेगा गुबार धरती पर सबसे अलग

हर्ष प्रसाद said...

बंधुवर, यदि आप में संस्कृत, अरबी या Hebrew में लिखे गए इन यातयाम (outdated) साहित्य में इतनी आस्था है, तो क्यों नहीं उसके ज़रिये आगे आकर मुल्क में शान्ति स्थापित करने का प्रयत्न करते. तीनों ज़बानें और उनमें लिखे तथ्य आज के लिए निरर्थक हैं. आज उनकी उपयोगिता तो जाने दीजिये, उनके अस्तित्व में आने के वक़्त ही उन पर प्रश्न उठ गए थे, अगर आपको बुद्ध, अबू बकर वगैरह के बारे में मालूम हो.