Saturday, February 14, 2009

भीगे हुए बालों को सुखाते हुए देखो.

भीगे हुए बालों को सुखाते हुए देखो.
उस चाँद को सूरज में नहाते हुए देखो.
जब डाले हरे पेड़ पे लहरा के दुपट्टा,
शाखाओं को बल खा के लजाते हुए देखो.
रक्षा में गुलाबों की उठा रक्खे हैं भाले,
इन टहनियों को स्वांग रचाते हुए देखो.
बच्चों को दुपहरी में घने नीम के नीचे,
निमकौलियों के ढेर लगाते हुए देखो.
उड़ती हुई आई है बगीचे में जो तितली,
फूलों से उसे बात बनाते हुए देखो.
जब रात हो गहरी उसे वीणा के सुरों पर,
मस्ती में भजन सूर के गाते हुए देखो.
मिल जाए वो बाज़ार में गर साथ किसी के,
घबरा के उसे आँख चुराते हुए देखो.
एकांत के अमृत को, विचारों के चषक में,
भर-भर के, मुझे पीते-पिलाते हुए देखो.
ये काया तो मिटटी की है, क्यों गर्व है इसपर,
इसको कभी मिटटी में समाते हुए देखो.
*******************

6 comments:

bijnior district said...

'शानदार रचना

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत उम्दा गज़ल है।बधाई स्वीकारें।

Reetesh Gupta said...

बहुत सुंदर ...बधाई

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन ग़ज़ल......... बधाई..

ghughutibasuti said...

सुन्दर !
घुघूती बासूती

गौतम राजऋषि said...

"रक्षा में गुलाबों की उठा रक्खे हैं भाले/इन टहनियों को स्वांग रचाते हुए देखो" -बहुत भाया

और आपके उत्साहवर्ध्क शब्दों ने टानिक का काम किया है।