ग़ज़ल / अहमद मुश्ताक़ /तेरे दीवाने हर रंग रहे लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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सोमवार, 20 अक्तूबर 2008

तेरे दीवाने हर रंग रहे, तेरे ध्यान की जोत जगाये हुए./ अहमद मुश्ताक़

तेरे दीवाने हर रंग रहे, तेरे ध्यान की जोत जगाये हुए।
कभी निथरे-सुथरे कपडों में, कभी अंग भभूत रमाये हुए।
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उस राह से छुप-छुप कर गुज़री, रुत सब्ज़ सुनहरे फूलों की,
जिस राह पे तुम कभी निकले थे, घबराए हुए, शरमाये हुए।
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अब तक है वही आलम दिल का, वही रंगे-शफ़क़, वही तेज़ हवा,
वही सारा मंज़र जादू का, मेरे नैन-से-नैन मिलाये हुए।
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चेहरे पे चमक, आंखों में हया, लब गर्म, खुनक छब, नर्म नवा,
जिन्हें इतने सुकून में देखा था, वही आज मिले घबराए हुए।
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हमने 'मुश्ताक' युंही खोला, यादों की किताबे-मुक़द्दस को,
कुछ कागज़ निकले खस्ता से, कुछ फूल मिले मुरझाये हुए।
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