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सोमवार, 4 अगस्त 2008

सूफ़ी तत्त्व-चिंतन और कबीर / प्रोफ़ेसर शैलेश ज़ैदी [क्रमशः 2]

कबीर द्वैत-अद्वैत से परे परम सत्ता को एकान्तिक और संख्यातीत मानते हैं. यह आस्था इब्ने अरबी की ही नहीं अनेक अन्य सूफियों की भी है. परम अस्तित्व केवल उस एकान्तिक सत्ता का है. प्रश्न अस्तित्व, सत्ता या वुजूद के एकत्व (वहदत) को समझने का है. जीव और जगत तत्त्व उससे भिन्न नहीं हैं. वह भेद रहित है. बीजक की यह पंक्ति इस दृष्टि से विचारणीय है - 'जब हम रहल, रहल नहिं कोई / हमरे मांह रहल सब कोई.'
यहाँ कबीर ने सूफियों के इजमाल (संकुचन) और तफ़सील (विस्तारण) के सिद्धांत की पुष्टि करते हुए जगत की भेद-रहित स्थिति और उसके उसी स्थिति से प्रकट होने का संकेत किया है. सूफियों के अनुसार नबीश्री हज़रत दाउद की जिज्ञासा पर परमात्मा ने उन्हें बताया "कुंत कन्ज़न मख्फ़ीअन फ़'अज़ैत इन्न आरिफ़ फ़ख़लक़्तुल खलक़ लिआरिफ़" अर्थात् मैं एक छुपी हुई निधि था, मेरी इच्छा हुई कि मैं पहचाना जाऊं,अतः मैं ने जगत की रचना की जिससे कि मैं पहचाना जा सकूँ. इस कथन की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया गया है कि परम सत्ता समस्त गुणों से युक्त है और जगत उस सत्ता के गुणों का ही प्रतिरूप है. यह छुपी हुई निधि अर्थात् जगत उस परम सत्ता में उसी प्रकार निहित थी जिस प्रकार बीज में वृक्ष.(शेख अब्दुल कुद्दूस गंगोही, रुश्द्नामा, हस्त लिखित).कबीर का अभिप्रेत भी यही जान पड़ता है. अभिनव गुप्त ने बटघानिका के दृष्टांत से यद्यपि यही बात कही है "न्याग्रोध बीजस्थ शक्ति रूपों महाद्रुम / तथा ह्रदय बीजस्थ जगदेच्चराचरम" किंतु कबीर की विचारधारा इससे थोड़ा हटकर है. कबीर ने अन्य स्थलों पर भी "आपणा माझे आप छिपाया" तथा " सूक बिरख यह जगत उपाया" के माध्यम से अपनी अवधारण स्पष्ट की है.
जिस समय केवल बीज होता है, प्रकट रूप में न शाखाएँ होती हैं, न पत्ते, न फूल और न फल. किंतु बीज के भीतर ये सभी विद्यमान होते हैं. "हमरे मांह रहल सब कोई" कहकर कबीर परम सत्ता के भीतर विद्यमान किंतु अदृश्य जगत की इसी स्थिति का संकेत करते हैं. और फिर यह उदघोष "खालिक खलक़, खलक़ मैं खालिक, , सब घट रह्यो समाई" इस तथ्य को और भी गहरा देता है कि समस्त जीवात्माओं से भरे इस जगत को परम सत्ता से अलग नहीं किया जा सकता. शंकर का अद्वैत इस अवधारणा के साथ मेल नहीं खाता. कबीर परम सत्ता की अद्वितीयता और आत्मा परमात्मा की अभिन्नता को स्पष्ट शब्दों में स्वीकार करते हैं - "हम सब माहिं, सकल हम माहीं / हम थैं और दूसरा नाहीं." सूफी कवि उसमान ने इसी विचार को चित्रावली में इन शब्दों में व्यक्त किया है-"सब वह भीतर वह सब माहिं / सबै आपु दूसर कोई नाहिं."
जगत की रचना से पूर्व भी परमात्मा की अनादि, अनंत एकान्तिक सत्ता अपनी अदभुत अद्वितीयता के साथ विद्यमान थी. प्रख्यात एकत्ववादी सूफी तत्ववेत्ता एवं कवि अबू सईद अबिल्खैर (मृ0 1049 ई0) एक स्थल पर लिखते हैं -
आं वक़्ते कि ईं अन्जुमो-अफ़लाक न बूद.
ईं आबो-हवा व आतिशो-ख़ाक न बूद.
असरारे-यगानगी सबक़ मी गुफ़्तम,
ईं क़ालिबो-ईं- नवा व इदराक न बूद..

(रुबाइयाते-अबूसईद अबिल्खैर, लाहौर पृ0७०).
अर्थात्- “प्रभु का कथन है कि जिस समय यह सितारे और आकाश न थे और ये पानी, हवा, आग, और धरती तत्व न थे, मैं उस समय भी अपनी अद्वितीयता के रहस्यों का पाठ कर रहा था. किंतु जीवात्मा की इस काया और इसमें विद्यमान ध्वनि और बुद्धि के न होने के कारण उन रहस्यों को समझने वाला कोई नहीं था."
अबू स'ईद अबिल्खैर के उपर्युक्त कथन की तुलना कबीर की इन पंक्तियों के साथ कीजिए -
समद नाहीं, सिषर नाहीं, धरती नाहीं गगना,
रवि ससि दोउ एकै नाहीं, बहत नाहीं पवना,
नाद नाहीं, ब्यंद नाहीं, काल नाहीं काया,
जब तैं जलब्यंद न होते, तब तूं ही राम राया.
(पदावली,219)
अबू स'ईद अबिलखैर का दृढ़ विश्वास था कि परम सत्ता पिंड में स्थित है और इस मनुष्य को चाहिए कि मक्के में स्थित काबे का हज करने के बजाय पिंड में स्थित काबे का हज करे जहाँ प्रभु का निवास है आर.सी. जेहनेर, (हिंदू एण्ड मुस्लिम मिस्टिसिज़्म, पृ0 177). कबीर भी "सत्तर काबे इक दिल भीतर" की घोषणा करते हैं. कबीर के सूफी चिंतन को समझने के लिए आवश्यक जान पड़ता है कि प्रसिद्ध सूफी अब्दुल्लाह अंसारी (1005-1089) की एक मुनाजात पर विचार कर लिया जाय. पूरी मुनाजात यहाँ रूपांतरित करना उपयुक्त नहीं है, इसलिए सार रूप में मुनाजात के कुछ अंश प्रस्तुत हैं-
“जान लो कि नबी ने पानी और मिट्टी से / एक बाह्य काबा निर्मित किया./ और प्राण और ह्रदय में एक आतंरिक काबा भी / बाह्य काबा पवित्र इब्राहीम ने /और आतंरिक काबा अल्लाह ने स्वयं बनाया./भरपूर प्रयास करो /कि आतंरिक काबे की उपासना कर सको /ह्रदय पर विजय प्राप्त करो /ताकि कुछ बन सको / एक व्यक्ति वह है जिसने सत्तर वर्ष पढ़ा /और कोई प्रकाश न कर सका /एक वह है जिसने कभी कुछ पढा ही नहीं / बस एक शब्द उसके कानों में पड़ गया /जिसे उसने आत्मसात कर लिया /और वह तृप्त हो गया /इस मार्ग में कोई तर्क नहीं है,/बस खोजो, ताकि सत्य को पा सको.”
(द पर्शियन मिस्टिक्स, पृ0 35)
कबीर के "कांकर पाथर जोड़ के, मस्जिद लियो बनाय" तथा "पोथी पढि पढि जग मुवा, भया न पंडित कोय / ढाई आखर प्रेम का, पढे सो पंडित होय." का गूढार्थ उपर्युक्त मुनाजात के प्रकाश में बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है. " पूजा करूँ न निमाज गुजारूं, / इक निराकार ह्रदय नमस्कारुं" कहने वाले कबीर यह देख कर दुखी हैं कि "मन मसीत किनहूं न जाना". वे आकाश के बीच बहने वाली सरिता अर्थात हौज़े-कौसर में स्नान कर चुके हैं - "आसमान म्याने लहंग दरिया, तहां गुसल करदा बूद." इस लिए मुस्लिम मुल्लाओं को मधुर कंठ में अजान देने और नमाज़ के लिए मुसल्ले (जानमाज़) पर जम कर बैठने के बजाय चित्त के भीतर नमाज़ पढ़ने का उपदेश देते हैं. ऐसे मुल्ला के नाम की गूँज सर्वत्र फैल जायेगी.
मुलनां बंग देइ सुर जानीं, आप मूसला बैठा तानीं.
आपुन में जे करै निमाजा, सो मुलना सर्बत्तर गाजा
वस्तुतः यह "कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर" की अवधारणा को व्यावहारिक रूप देने की स्थिति है. यहाँ "काबा फिर कासी भया" के मर्म को अनुभव के धरातल पर महसूस करने किया जा सकता है. यहाँ "हज काबे को जाइथा, आगे मिला खुदाई / मीरां मुझसे यों कहा, तुझे किन्हीं फरमाई" की मंजिल मुखर हो उठी है. 'आपुन में जे करै निमाजा' के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए फ़ारसी कवि मलिक मसऊद का निम्न लिखित शेर द्रष्टव्य है -
नमाज़ि-मस्ति-खराबात नौइ-दीगर दान
दरिन नमाज़ न बाशद रवा रुकूओ-सुजूद

अर्थात्- उसके मदिरालय से इश्क की शराब पीकर जो मस्त हैं उनकी नमाज़ कुछ और ही प्रकार की है. उस नमाज़ में रुकू और सजदे की अपेक्षा नहीं रहती.स्पष्ट है कि यह नमाज़ आम मुसलामानों की तरह मुसल्ले पर बैठ कर नहीं पढी जाती. साधक इसे ध्यानावस्था में ही पढ़ता है.
अबू स'ईद अबिलखैर, अब्दुल्लाह अंसारी, बायजीद बिस्तामी, सरमद इत्यादि सूफियों की एक बड़ी संख्या है जो पवित्र काबे को चित्त के भीतर ही स्वीकार करते हैं. उनकी दृष्टि में 'काबा' साधक और साध्य का मिलन स्थल है और हज साधना मार्ग का प्रतीक. इस स्थिति को स्वीकार किए बिना यदि साधक काबे के स्थूल रूप के पीछे दौड़ता है तो उसका गुरु भी उससे प्रसन्न नहीं होता - "हज काबे ह्वै ह्वै गया, केती बार कबीर / मीरां मुझ में क्या खता, मुखां न बोलै पीर" किंतु कबीर को गुरु-कृपा से अपनी मूर्खता का शीघ्र ही आभास हो गया -"ज्यूँ नैनन में पूतली, त्यूं खालिक घट माहिं / मूरखि लोग न जाणहीं, बाहर ढूँढण जाहिं", अब कबीर को हज के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रह गई.
ख्वाजा फरीदुद्दीन अत्तार ने अपने एक शेर में कहा है-"हरचे दीदी ज़ाति-पाके-ऊ बुवद / ईं चुनीं दीदन तरा नेकू बुवद" अर्थात्- तू जो कुछ देखता है सब उसी की परम सत्ता है. तेरा इस प्रकार देखना तेरे लिए शुभ सिद्ध हुआ. श्रीप्रद कुरआन में कहा गया है- "फ़ऐनुमा तवल्लू फ़सम्म वजहुल्लाह"(24/35) अर्थात् तुम जिधर भी मुंह करोगे उधर अल्लाह का चेहरा होगा. मिर्जा गालिब से जब धर्मोपदेशक (वाइज़) ने मस्जिद में बैठकर शराब पीने से मना किया तो उनका कवि सहज भाव से कह उठा -"वाइज़ शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर / या वो जगह बता कि जहाँ पर खुदा न हो."कबीर के समक्ष भी ऐसी समस्या आई होगी जिसपर कबीर की असहमतिमूलक चेतना कसमसा उठी और कबीर ने बड़े तीखे ढंग से चोट की -"जहाँ मसीत देहुरा नाहीं, तहं काकी ठकुराई." कबीर का साधना-जन्य ज्ञान उनपर कुछ और ही सत्य उदघाटित कर चुका था- "जहाँ जहाँ जाई, तहां तहां रामा." फरीदुद्दीन अत्तार के उपर्युक्त शेर की सहज गूँज कबीर में सर्वत्र देखी जा सकती है.
कबीर भी अपने पूर्ववर्ती सूफियों की भाँति श्रीप्रद कुरआन की इस आयत में आस्था रखते हैं -"अल्लाहु नूरुस्समावति वल अर्ज़" अर्थात परम सत्ता पृथ्वी और आकाश की ज्योति है. उस ज्योतिस्वरूप परमात्मा ने अपने सौन्दर्य (जमाल) का दर्शन करने की इच्छा से स्वयं को जो सूक्ष्म था, अपना दर्पण बनाया अर्थात स्थूल रूप में व्यक्त किया और अपने सौन्दर्य का अपने आप में दर्शन किया. कबीर के अनुसार परम सत्ता -"आपन रूप को आपहि जानै, आपन रहै अकेला" यहाँ अकेला शब्द संख्यावाचक न होकर अस्तित्व या सत्ता के एकत्व का द्योतक है जो पूर्ण, अद्वितीय एवं भेद रहित है. भेद की पूँछ पकड़ कर भवसागर नहीं पार किया जा सकता-" पूँछ ज पकडी भेद की,उतरा चाहै पार." इसके लिए एकान्तिक सत्ता (वुजूदे-मुतलक) से परिचय होना आवश्यक है जो पूर्ण मानव (इन्सान-कामिल), वली, सद्गुरु और सिद्ध पुरूष है. इस परिचय के बाद सम्पूर्ण दुःख समाप्त हो जाता है. -"पूरे से परिचय भया, सब दुःख मेल्या दूरि" यह "जो जाँचौ तो केवल राम" और "केवल राम रहै ल्यौ लाइ." की स्थिति है, पूर्णतः भेद रहित है. यहाँ "मैं तैं, तैं मैं,ए द्वै नाहीं" का अनुभूतिजन्य ज्ञान अनिवार्य है. इसके बाद "हरि मैं तन है, तन मैं हरि है" की वास्तविकता का सहज बोध हो जाता है. अबू स'ईद अबिल खैर की प्रसिद्ध रुबाई द्रष्टव्य है-
मन तू शुदम तू मन शुदी, मन तन शुदम तू जां शुदी
ताकस न गोयद बाद अज़ीं, मन दीगरम तू दीगरी

(रुबाइयाते-अबू स'ईद अबिल खैर,लाहौर, पृ0 17)
अर्थात्- मैं तू हो गया, तू मैं हो गया, मैं शरीर हो गया, तू प्राण हो गया, ताकि फिर कोई यह न कह सके कि मैं कोई और हूँ और तू कोई और.
मालिक मुहम्मद जायसी के काव्य का विवेचन करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है -'इस अद्वैतवाद के मार्ग में बाधक होता है अंहकार. यह अंहकार यदि छूट जाय तो इस ज्ञान का उदय हो जाय कि सब मैं ही हूँ. मुझ से अलग कुछ नहीं है.'(जायसी ग्रंथावली, भूमिका,पृ0 146). कबीर का व्यक्तित्व इस ज्ञान के उदय से पूरी तरह जगमगा उठा था. जभी तो कबीर निःसंकोच भाव से कहते है -"मैं मैं मेरी जिन करैं, मेरी मूल बिनास" और अंततः "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं / सब अंधियारा मिटि गया, दीपक देख्या माहिं" इतना ही नहीं, "तूं तूं करता तूं भया, मुझ में रही न हूँ" कबीर में ज्ञान का यह उदय उन्हें मंसूर हल्लाज, बायजीद बिस्तामी और समद की पंक्ति में खड़ा कर देता है. तत्वज्ञान की यह एकत्ववादी परम्परा वैष्णव कवियों की रचनाओं में नहीं दिखायी देती. राममय होना और स्वयं राम हो जाना, दो अलग-अलग स्थितियां हैं. कबीर का रामत्व परम सत्ता की अनंतता का गुण है. इसलिए कबीर स्पष्ट शब्दों में उदघोष करते हैं - "राम मरैं तब हमहूँ मरिहैं". किंतु कबीर को संसारी जनों की नश्वरता का पूरी तरह आभास है. कबीर का रामत्व सांसारिकता से पूरी तरह मुक्त है. "हम न मरैं, मरिहै संसारा" में इसी तथ्य का संकेत है.
सूफ़ी कवियों ने श्रीप्रद कुरआन के आधार पर परम तत्व की अद्वितीयता और सौन्दर्यशीलता का अदभुत विवेचन किया है. उनके अनुसार परम तत्व की ज्योति से समस्त संसार प्रकाशित है. सम्पूर्ण सृष्टि की दीप्ति और सौन्दर्य उसी से उदभासित है. हाफिज़ शीराजी की दृष्टि में "हर दो आलम यक फ़रोगे-रूए-उस्त" (दीवाने-हाफिज़, लाहौर, पृ0 459).अर्थात् - दोनों लोक उसके मुख के तेज से आलोकित हैं. कबीर ने इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया है- "कबीर तेज अनंत का, मानो ऊगी सूरज सेणि" कबीर की दृष्टि में उसका तेजयुक्त सौन्दर्य वाणी द्बारा व्यक्त नहीं किया जा सकता. वह तो एकमात्र दर्शन का विषय है- "कहिबे को सोभा नहीं, देख्या ही परवान." वह परम सत्ता तेज पुंज पारस घणी है. जहाँ मलिक मुहम्मद जायसी सृष्टि की लालिमा में प्रियतम के आलोक का परम साक्षात्कार करते हैं (पदमावत, पृ0 98), वहीं कबीर भी "लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल / लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल." के आनंदप्रद अनुभव से गुज़रे बिना नहीं रहते.
सूफ़ी कवियों ने नबीश्री की हदीस "परम सत्ता ने अपने नूर से सर्वप्रथम मेरे नूर की सृष्टि की" के आधार पर नबीश्री हज़रत मुहम्मद (स.) की ज्योति को सम्पूर्ण सृष्टि की रचना का कारण स्वीकार किया है. ख्वाजा फरीदुद्दीन अत्तार ने इस प्रसंग में कहा है-
हक़ चूँ दीद आं नूरे-मुतलक दर हुज़ूर
आफरीद अज़ नूरे-ऊ सद बहरे नूर
. (मन्तिक़ुत्तयर, लखनऊ,पृ0 16)
अर्थात्-परम सत्य प्रभु ने अपना प्रकाश जब हज़रत मुहम्मद में देखा तब उनके प्रकाश से सृष्टि रुपी प्रकाश के सागर को पैदा किया.
"प्रथम जोति बिधि ताकर साजी / औ तेहि प्रीति सिहटि उपराजी" (पदमावत,पृ0 ४), के माध्यम से जायसी ने इसी आस्था का उदघाटन किया है. "एक ज्योति संसारा" के पक्षधर कबीर की आस्था मलिक मुहम्मद जायसी सहित अन्य सूफ़ी कवियों से भिन्न नहीं है. कबीर की यह पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -
अल्ला एक नूर उपाया, ताकी कैसी निंदा
ता नूर थैं सब जग कीया, कौन भला कौ मंदा
.(पदावली, 51)
यहांपर यद्यपि कबीर ने हज़रत मुहम्मद (स.) का नामोल्लेख नहीं किया है, किंतु उनका अभिप्रेत वही है जो अन्य सूफियों का है. आगे की पंक्तियों में यह बात और स्पष्ट हो जाती है. इब्ने अरबी की परम्परा के सूफियों ने नबीश्री को इन्साने-कामिल अर्थात् पूर्ण मानव स्वीकार किया है. यह पूर्ण मानव परम सत्ता की प्रतिमूर्ति है. सद गुरु के ज्ञानोपदेश से जब इस पूर्ण मानव का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है. तो सभी प्राणियों में परम सत्ता का वास दृष्टिगत होता है -"ता अला की गति नहीं जानी गुरु गुड दिया मीठा. / कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहब दीठा."यहाँ पूरा पाया का प्रयोग द्रष्टव्य है.
मैं समझता हूँ कि उपर्युक्त विवेचन के आधार पर एक बात स्पष्ट हो जाती है कि कबीर काव्य का अध्ययन सूफ़ी तत्व चिंतन की पृष्ठभूमि में किए बिना सम्पूर्ण अध्ययन अधूरा रह जाता है.
****************** समाप्त

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

सूफी तत्त्व-चिंतन और कबीर / प्रोफेसर शैलेश ज़ैदी [क्रमशः 1]

कबीर की रचनाओं में सूफी चिंतन की झलक का संकेत अनेक विद्वानों ने किया है. रवेरेंड जी. एच. वेस्टकाट ने अनेक तर्कों के आधार पर कबीर का सूफी होना ही घोषित नहीं किया, उनके परंपरागत मुसलमान होने के पक्ष में भी अनेक प्रमाण दिए हैं ( कबीर ऐंड द कबीर पंथ, [कानपुर,1974], पृ0 29-32). डॉ. तारा चन्द ने कबीर की आस्था में शीआ मुस्लिम आस्था और उनके चिंतन में गहरे सूफी प्रभाव की चर्चा की है.(इन्फ्लुएंस आफ इस्लाम आन इंडियन कल्चर, पृ0 152-53).श्री वी. राघवन के निकट कबीर की आध्यातमिकता गहरे सूफी प्रभाव को व्यक्त करती है. (सोर्सेज़ आफ इंडियन ट्रेडिशन, न्यूयार्क 1958, पृ0 360). अली सरदार जाफरी (कबीर बानी, पृ0 9-10) और डॉ. गोपीचंद नारंग (कबीर की छे सौवीं जयंती पर साहित्य अकादमी की संगोष्ठी में पढ़ा गया लेख) के विचार भी उक्त विद्वानों से भिन्न नहीं हैं. डॉ. विष्णुकांत शास्त्री और डॉ. वासुदेव सिंह ने कबीर पर सूफी मत के प्रभाव का खंडन करते हुए अनेक बचकाने तर्क दिए हैं जिनसे उनके अध्ययन की सीमित परिधियों का संकेत मिलता है.
कबीर के मुवह्हिद (एकत्त्ववादी) होने का तथ्य जहाँ संदेह और विवाद के घेरे से बाहर है, वहीं यह भी जानना ज़रूरी है कि जलालुद्दीन रूमी, फरीदुद्दीन अत्तार, बायजीद बिस्तामी, महमूद शाबिस्तरी,अबू सईद अबिल्खैर, जुनैद, मंसूर हल्लाज, मसऊद बक इत्यादि अनेक सूफी चिन्तक और कवि मुवह्हिद (एकत्त्ववादी) थे. दरवेशों की आस्थाएं और चिंतन पद्धतियाँ भी परंपरागत शरीअत-सम्मत इस्लाम के अनुकूल नहीं थीं. मुस्लिम शरीअताचार्यों ने अपने प्रभाव और दबाव से भले ही सूफियों और दरवेशों को तरह-तरह की यातनाएं दिलवाई हों, और मंसूर हल्लाज, शिहाबुद्दीन सुहर्वर्दी एवं सरमद को भले ही प्राणों से हाथ धोना पड़ा हो, किंतु 'बे-खतर कूद पड़ा आतिशे-नमरूद में इश्क़' की परम्परा निरंतर जारी रहीऔर इनमें से किसी के मुस्लिम सूफी अथवा दरवेश होने पर कोई प्रश्न-चिह्न नहीं लगाया गया.
कबीर के समय तक एकत्त्ववाद (वह्दतुल्वुजूद) का दर्शन सूफियों के मध्य पर्याप्त लोकप्रिय हो चुका था. चिश्तिया सम्प्रदाय के अधिकतर सूफी इसी सिद्धांत में आस्था रखते थे. कबीर पर यद्यपि सहजिया सम्प्रदाय की गुह्य साधना का भी प्रभाव था, फिर भी एकत्त्ववाद में उनकी गहरी आस्था थी. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को द्वैताद्वैत-विलक्षण-समतत्ववाद का समर्थक माना है. (कबीर, पृ0 46). वह्दतुल वुजूद का दर्शन इससे बहुत भिन्न होते हुए भी इसके बहुत निकट है. इस लिए कबीर सम्बन्धी डॉ. द्विवेदी की यह अवधारण सर्वथा निराधार नहीं कही जा सकती. किंतु द्वैताद्वैत विलक्षण समतत्ववाद के दर्शन से कबीर का कितना परिचय था यह बता पाना पर्याप्त कठिन है. इस दर्शन से उनके विचारों का मेल वह्दतुल्वुजूद के दर्शन के प्रति उनकी आस्था का परिणाम प्रतीत होता है.
इब्ने-अरबी (1165-1240) ने वह्दतुल्वुजूद के दर्शन को उस पूर्वकालिक आस्था के आधार पर विकसित किया था जो परम सत्ता के मूलभूत एकत्व पर विशवास रखती थी और उस से इतर किसी भी सत्ता को अमान्य ठहराती थी. इब्ने अरबी के मतानुसार एकान्तिक सत्ता एकान्तिक जगत से अभिन्न है और समस्त विद्यमान जगत का मूल स्रोत है. वह उसके अतिरिक्त किसी अन्य के लिए ग्राह्य नहीं है. उसे उसके अतिरिक्त कोई नहीं जानता. वह अपने एकत्त्व से ही आच्छादित है. उसकी सत्ता ही उसका आवरण है. उसे उसके अतिरिक्त कोई नहीं देख सकता, चाहे वह देखने वाला नबी, वली या फ़रिश्ता ही क्यों न हो (डी.एम्. मथेसन, ऐन इंट्रोडकशन टू सूफी डाक्टराइन [लाहौर,1963], पृ0 23-24). इब्ने अरबी की दृष्टि में अल्लाह वुजूदे-मुतलक़ (एकान्तिक सत्ता) है जिसने स्वयं को समस्त विद्यमान रूपों में व्यक्त किया है. उसकी उच्चतम अभिव्यक्ति पूर्ण मानव (इन्साने-कामिल) अथवा मर्यादा पुरुषोत्तम या सिद्ध पुरूष है.
यहाँ यह बता देना भी आवश्यक है कि जीली ने पूर्ण मानव को परम सत्ता की प्रतिमूर्ति बताया है. उसकी दृष्टि में पूर्ण मानव एक ऐसा दर्पण है जिसमें परम सत्ता के समग्र गुण झलकते हैं. वह परमात्मा और जीवों के बीच की कड़ी है. (आउटलाइन आफ इस्लामिक कल्चर पृ0 406). जीली का यह भी मानना है कि सभी मनुष्यों में पूर्णता की यह शक्ति थोडी-बहुत पायी जाती है. किंतु वास्तव में पूर्ण मानव कोई बिरला होता है. पूर्णता का स्तर प्रत्येक व्यक्ति द्बारा दैवी आलोक ग्रहण करने की सामर्थ्य पर निर्भर करता है (आर.ए. निकाल्सन, स्टडीज़ इन इस्लामिक मिस्टिसिज्म, पृ0 80)
इब्ने अरबी की दृष्टि में आध्यात्मिक संयोग अथवा सम्मिलन परम सत्ता के साथ एक हो जाना या उस सत्ता में विलयन नहीं है अपितु पहले से विद्यमान एकत्व को पहचानना और महसूस करना है. इसके लिए चित्त का परिष्कृत रखना अनिवार्य है. इल्म अथवा शास्त्र-ज्ञान का सम्बन्ध बुद्धि से है, जबकि 'मारिफा' अथवा आत्म ज्ञान का सम्बन्ध चित्त से है. चित्त की स्थिति दर्पण की है. इस दर्पण में ही उसे देखा जा सकता है. यह जगत प्रत्येक क्षण नवीनता की और अग्रसर है और उसकी सम्पूर्ण गतिशीलता एकान्तिक सत्ता तक पहुँचने का प्रयास है. 'फ़ना' बाह्य रूप का विनाश है और 'बक़ा' परम सत्ता में स्थायित्व. उसकी उपासना, प्रेम या इश्क में ही सम्भव है जो उस एकान्तिक सत्ता का उच्चतम रूप है.(एम्.एम्. शरीफ संपादित ‘अ हिस्ट्री आफ मुस्लिम फ़िलासफी’ [1966] पृ0 413).
सच पूछिए तो इब्ने अरबी ने अपनी आस्था बहुत स्पष्ट शब्दों में व्यक्त कर दी है -
“मेरा ह्रदय मूर्तियों का देवालय और हाजियों का काबा है
यहाँ तौरैत की पट्टिका और कुरआन है
मैं इश्क के धर्म का अनुयायी हूँ
अब ऊंट चाहे किसी करवट बैठे
मेरा धर्म और मेरी आस्था यही है.”

(अ हिस्ट्री ऑफ़ मुस्लिम फिलासफी,पृ0 144)
कबीर और इब्ने अरबी के विचारों का साम्य देखने योग्य है. कबीर के यहाँ भी 'प्यंजर प्रेम प्रकासया, अंतरि भया उजास' की स्थिति है. कारण यह है कि वे भी इश्क ही को धर्म स्वीकार करते हैं. और परम सत्ता के इश्क का बादल बरस कर उनकी अंतरात्मा तक को भिगो चुका है -'कबीर बादल प्रेम का हम पर बरस्या आई / अंतरि भीगी आत्मा, हरी भई बनराई'. कबीर के लिए भी इंसाने कामिल अर्थात पूर्ण मानव परम सत्ता और सद् गुरु को प्रतीकायित करता है. जभी तो वे 'पूरे से परिचय भया,' तथा 'कहै कबीर मैं पूरा पाया' की घोषणा करते हैं. यहाँ 'पूरा' शब्द विचारणीय है.
कबीर के निकट मन मथुरा, ह्रदय द्वारका और काया काशी है तथा मन ही गोरख और मन ही गोविन्द है. वे मन को काबा और काया को कर्बला देखने के भी पक्षधर हैं. 'जो मन राखै जतन करि, तो आपै करता सोई' कि स्थिति इब्ने अरबी के इंसाने कामिल कि स्थिति से भिन्न नहीं है. यह पूर्ण मानव या इंसाने-कामिल बे-हद अर्थात असीम है. इसलिए जो इस ‘बेहद’ के साथ जुड़ कर स्वयं 'बे-हद’ हो गए हैं, कबीर उन्हीं के समक्ष अन्तर खोलने की बात करते हैं -"जो लागे बेहद्द सों, तिन सूं अन्तर खोलि'. और यह ‘बेहद्द’ स्वभाव, कर्म और चरित्र से संत है, वली है, परम सत्ता का अभिन्न मित्र है, उसका राज़दाँ है. कबीर इसी आधार पर संत और राम में अभेदत्व की स्थिति मानते हैं -"संत राम हैं एकौ."
इब्ने अरबी ने 'मारिफ़ा' अर्थात आत्म ज्ञान या परम सत्ता की प्रेमानुभूति का सम्बन्ध चित्त से माना है और चित्त की स्थिति उनकी दृष्टि में दर्पण की है. कबीर भी "हिरदै भीतर आरसी" की बात करते हैं और "जो दरसन देखा चहै, तौ दर्पन मंजत रहै" का उपदेश देते हैं. उर्फी ने एक स्थल पर इखा है -
निशाने-जाँ हमी जू, ता निशाँ अज़ बेनिशाँ याबी
मकाने-दिल तलब कुन,ता मकां दर लामकां बीनी [क़सायादे-उर्फी, पृ0 77]

अर्थात - तू अपने प्राणों के चिह्नों (निशाने-जाँ) की खोज कर ताकि उन चिह्नों से चिह्न-मुक्त परम सत्ता को प्राप्त कर सके. तेरा ह्रदय ही वह आवास-स्थल या मकान है जिसे तू यदि स्वच्छ और निर्मल रख सके तो उसमें तू आवासमुक्त (लामकां) परम सत्ता का दर्शन कर सकता है.
ध्यान पूर्वक देखा जाय तो कबीर दो सत्ताओं के एकमेक होने की बात नहीं करते. परम सत्ता उनकी दृष्टि में एकान्तिक या मुतलक है. चित्त की मलिनता (दर्पन लागै काई) और मन की दुविधा के कारण मनुष्य अपने चित्त के भीतर उस एकान्तिक सत्ता का दर्शन कर पाने में असमर्थ है. जीव इस एकान्तिक सत्ता या वुजूदे-मुतलक से उसी प्रकार एकत्व रखता है जिस प्रकार तिल के भीतर विद्यमान तेल और चकमक में आग. बात सुषुप्तावस्था से जाग्रतावस्था में आने की है. सुषुप्तावस्था द्वैत के भाव को जन्म देती है और जाग्रतावस्था परम सत्ता के एकत्व का बोध कराती है - "जो सोऊँ तो दोई जणा, जो जागूं तौ एक." तिल और चकमक रूप को प्रतीकायित करते हैं और तेल तथा आग अर्थ को. यह संसार उसी एकान्तिक सत्ता का व्यक्त रूप है. इस व्यक्त रूप के अर्थ पर यदि दृष्टि डाली जाय, तो सम्पूर्ण विद्यमान जगत एकान्तिक सत्ता से इतर कुछ नहीं है. प्रख्यात सूफी कवि फरीदुद्दीन अत्तर (1142-1220 ई0) इस तथ्य को इस प्रकार व्यक्त करते हैं –
आसमांहां वो ज़मींहा वो फ़लक / जुमला रा यक्दानो-बेगुज़रत ज़ि शक.
सूरतो-मानी बहम तौ ज़ात दां / जुमला अशया मुसहफ़ो- आयात दां [रुशद-नामा , हस्त-लिखित]
अर्थात, संदेह की सीमा से निकल कर आकाश, धरती और देवलोक को अभिन्न समझने का प्रयास कर. सम्पूर्ण पदार्थों को पवित्र आसमानी किताब और उसकी आयतें समझ.
स्पष्ट है कि वह्दतुल्वुजूद के दर्शन में जगत मिथ्या न होकर परम सत्ता का ही व्यक्त रूप है. कबीर भी जगत को मिथ्या नहीं मानते. उनकी दृष्टि में यह संसार काजल की कोठरी जैसा है -'काजल केरी कोठडी, तैसा यह संसार,' और यह काजल की कोठरी मिथ्या नहीं है. बात तो जब है कि उसमें रहते हुए साधक उसके प्रभावों से अछूता निकल आए. -'बलिहारी ता दास की, पी सर निकसण हार.' स्रष्टा ने इस संसार को वणिक के हाट की भाँती पसार रखा है -'जैसे बनिया हाट पसारा, सब जग का सो सिरजन हारा' और कबीर इस हाट में खड़े कर दिए गए हैं. किंतु कबीर इस तथ्य से परिचित हैं कि वही परमात्मा ग्राहक भी है और वही बेचने वाला भी."आनि कबीरा हाट उतारा, सोई ग्राहक सोई बेचन हारा." ***************क्रमशः

रविवार, 6 जुलाई 2008

कबीर एकत्ववादी ( मुवह्हिद ) थे / प्रो. शैलेश ज़ैदी


कबीर ( 1425-1505 ई0 ) के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आलोचकों ने विभिन्न कोणों से विचार किया है और अपनी सीमा के अनुरूप अनेक ऐसी मान्यताएं स्थापित की हैं जिनके प्रकाश की चकाचौंध में कबीर के मूल स्वरुप की तलाश पर्याप्त दुष्कर हो गई है. नाभादास के भक्तमाल (1600 ई0), अनंतदास की 'कबीर साहब की परचई और दरिया साहब के ज्ञानदीपक की सामग्री के आधार पर कबीर का जो स्वरुप विकसित किया गया वह 'खजीनतुलअसफिया', अख्बारुलअख्यार तथा आईने-अकबरी में चर्चित कबीर से सर्वथा भिन्न है.
भक्तमाल के लेखक ने कबीर का परिचयात्मक विवरण देते हुए लिखा है कि उन्होंने "जातिव्यवस्था (वर्णाश्रम की मर्यादा) तथा छओं दर्शनों को मान्यता नहीं दी. उनका मानना था कि बिना भक्ति के धर्म भी अधर्म हो जायेगा और बिना भजन के योग, यज्य, दान, व्रत सब निरर्थक हैं. उन्होंने निष्पक्ष भाव से हिन्दुओं, तुर्कों सभी के हित के लिए रमैनी, सबद तथा साखी की रचना की. उन्होंने जो कुछ कहा निर्भीकता पूर्वक कहा, किसी को प्रसन्न करने के लिए नहीं." (भक्तमाल, छप्पय संख्या 516). स्पष्ट है कि भक्तमाल के लेखक नाभादास की दृष्टि में कबीर हिन्दुओं और मुसलामानों के समान रूप से हितैषी थे और भारतीय चिंतन को निष्पक्ष भाव से एक स्वस्थ आधार देना चाहते थे.
आईने-अकबरी में अबुल्फ़ज़्ल ने दो स्थलों पर उडीसा का इतिहास लिखते हुए जहाँ कबीर की चर्चा एक मुवह्हिद (एकत्ववादी) के रूप में की है, वहीं इस तथ्य का भी संकेत किया है कि कबीर ने जब सत्य को जान लिया तो वह सब कुछ जो सडा-गला था उसे पूरी तरह ठुकरा दिया (आईने-अकबरी, ब्लाकमैन,1,पृ0393 ).यह अभिमत कबीर के कथन "कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जानी" की पुष्टि करता है.
अखबारूल-अख़यार के लेखक शेख अब्दुल हक़ ने भी जो अपने समय के प्रख्यात धर्माचार्य थे, शेख रिज़कुल्लाह मुश्ताकी (1491-1581) के सन्दर्भ से कबीर को मुवह्हिद (एकत्ववादी) घोषित किया है. शेख मुश्ताकी ब्रजभाषा में राजन उपनाम से कविताएं लिखते थे और 'पैमाना' तथा 'ज्योति-निरंजन' नामक उनके दो काव्य-ग्रन्थ पर्याप्त लोकप्रिय थे. सन्दर्भ से संकेत मिलता है कि सोलहवीं शताब्दी के मुस्लिम समाज में कबीर के धर्म और उनकी विचारधारा को लेकर अनेक प्रकार की जिज्ञासाएं विद्यमान थीं. शेख रिज़कुल्लाह मुश्ताकी ने अपने पिता शेख सादुल्लाह (मृ0 1522 ई0) से, जो कबीर के समकालीन थे, प्रश्न किया कि "प्रतिष्ठित हिन्दी कवि कबीर, जिनके पद प्रत्येक व्यक्ति की ज़बान पर हैं,मुसलमान थे अथवा काफिर ? उत्तर में उनके पिता ने कहा कि वे मुवह्हिद (एकत्ववादी) थे. शेख मुश्ताकी ने पुनः प्रश्न किया कि एक मुवह्हिद (एकत्ववादी) क्या एक मुसलमान अथवा एक काफिर से भिन्न होता है ? शेख सादुल्लाह ने उत्तर दिया- यह समझना तुम्हारे लिए कठिन है. तुम धीरे-धीरे इसे स्वतः समझ जाओगे." शेख अब्दुल हक़ की यह भी अवधारणा थी कि कबीर की रचनाएं सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में दिल्ली और आगरा के सूफियों की गोष्ठियों में सम्मान पूर्वक उद्धृत की जाती थीं. ( अख्बारुल-अख़यार, दिली 1914, पृ0 300 )
शेख अब्दुल हक़ के उपर्युक्त विवरण से तीन महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आते है.
1. कबीर एकत्त्ववादी (मुवह्हिद) थे.
2. एकत्ववादी काफिर नहीं होता. किंतु उसे समझने के लिए परिपक्व ज्ञान अपेक्षित है.
3. कबीर की रचनाएं दिल्ली और आगरे की सूफी गोष्ठियों में सम्मानपूर्वक उद्धृत की जाती थीं.
पंद्रहवीं शताब्दी में सूफियों की मुख्य रूप से दो विचारधाराएं विशेष चर्चा में थीं. एक, वह्दतुश्शहूद अथवा साक्ष्यवादी विचारधारा और दूसरी वहदतुल्वुजूद अथवा एकत्ववादी विचारधारा.पहली विचारधारा के सूफी जो शहूदी कहलाते थे शरीअत-सम्मत इस्लामी चिंतन के पक्षधर थे. दूसरी विचारधारा के सूफी जो वुजूदी कहलाते थे धार्मिक बाह्याचारों और कर्मकांडों के प्रति आस्थावान नहीं थे और शरीअत के पाबन्द मुसलामानों के समाज में काफिर समझे जाते थे.बू अली कलंदर, मसऊद बक, शेख अब्दुल कुद्दूस अलखदास, इत्यादि कबीर के समकालीन सूफी जिनकी हिन्दवी रचनाएं भी उपलब्ध हैं दूसरी अर्थात एकत्वावादी विचारधारा के थे. मुल्ला दाऊद और मलिक मुहम्मद जायसी आदि शहूदी अर्थात साक्ष्यवादी आस्था के रचनाकार थे.
मुवह्हिद अथवा एकत्ववादी होना भले ही इस्लामी धर्माचार्यों की दृष्टि में शरीअत-सम्मत न रहा हो, किंतु ऐसे सूफियों को आसानी से काफिर कहने का साहस भी इस्लामी धर्माचार्यों में नहीं था. शरीअत सम्मत अर्थों में तो प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा ग़ालिब भी मुसलमान नहीं थे और उन्होंने अपना मुवह्हिद (एकत्ववादी) होना स्पष्ट शब्दों में स्वीकार भी किया था -
हम मुवह्हिद हैं, हमारा कीश है तरके-रुसूम
मिल्लतें जब मिट गयीं, अजज़ाए-ईमाँ हो गयीं (दीवाने-ग़ालिब, दिल्ली 1997, पृ0 107)
यहाँ तरके-रुसूम से अभिप्राय धार्मिक बाह्याचारों और आडम्बरों के परित्याग से है और कीश का अर्थ प्रवृत्ति अथवा व्यवहार है. विभिन्न मिल्लतों या सम्प्रदायों में बँटे लोग यदि अपने अपने धार्मिक बाह्याचारों का परित्याग करदें, तो गालिब की दृष्टि में मिल्लतें स्वतः मिट जायेंगी और सभी सम्प्रदाय एक ही ईश्वरी आस्था (ईमान) का अंश प्रतीत होंगे. एकत्ववाद में विशवास रखने वाला मनुष्य और मनुष्य के बीच कोई भेद नहीं करता. कबीर इसीलिए इस विभाजन रेखा पर सर्वत्र प्रहार करते हैं. यह विभाजक रेखा बाह्याचारों की है, बाह्याडम्बरों की है जो ईश्वर द्बारा निर्मित न होकर धर्माचार्यों के स्वकेंद्रित चिंतन से जन्मे हैं. अकबरी दरबार के प्रख्यात फ़ारसी कवि उर्फी की स्पष्ट अवधारणा थी -
"उर्फी अच्छे और बुरे सभी लोगों के साथ मिल-जुल कर रहो कि जब इस संसार से विदा लो तो मुसलमान तुम्हें आबे-ज़मज़म से नहलाएं और हिन्दू तुम्हारी चिता सजाएं" (क़साएदे-उर्फी, मुंशी नवल किशोर प्रेस 1923. पृ0 97) प्रतीत होता है कि यह शेर लिखते समय उर्फी के समक्ष कबीर का सम्पूर्ण व्यक्तित्व जीवंत हो उठा था.
कबीर के आलोचकों ने या तो एक सिरे से कबीर के एकत्ववादी (मुवह्हिद) होने के प्रामाणिक सन्दर्भ को चिंतन के योग्य ही नहीं ठहराया या जान बूझकर आईने-अकबरी और अख्बारुल-अख़यार से आँखें मूँद कर रामानंदी कबीर की प्रतिमा गढ़ते रहे. इन आलोचकों के निकट सम्प्रदायगत आस्थाओं वाली जनश्रुतियों पर आधारित रचनाएं प्रामाणिक बन गयीं और प्रामाणिक ग्रंथों के उद्धरण आस्थानुकूल न होने के कारण अर्थहीन बन गए.
हरिऔध से लेकर आचार्य रामचंद्र शुक्ल तक और आचार्य शुक्ल से लेकर डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ही नहीं पं.विष्णुकांत शास्त्री तक, सभी ने कबीर के भीतर उफनते समुद्री तूफ़ान को साहिल पर खड़े होकर देखना और मूल्यांकित करना चाहा. और इन महानुभावों कि ओट में खड़े इनके प्रति आस्थावान आलोचक जय-जयकार की मुद्रा में इनके निष्कर्षों को कालजयी घोषित करते रहे. काश इन महानुभावों ने पानी में उतरने का प्रयास किया होता और लहरें गिनने के बजाय लहरों के थपेडों की हलकी चोट भी महसूस की होती तो इन्हें क्रांतिकारी समाजचेता कबीर को मात्र रहस्यवादी, निर्गुण निराकार का उपासक, संसार से विमुखता का उपदेश देने वाला आदि बनाकर ठंडे बसते में लपेटने के प्रयास का अवसर न मिलता.
आश्चर्य उस समय और भी होता है जब पं. विष्णुकांत शास्त्री विभिन्न सन्दर्भों का उपयोग करते हुए मुवह्हिद (एकत्ववादी) को सूफी नहीं मानते. अज्ञान को ज्ञान का आधार बनाकर निर्णय लेने का यह तरीका अदभुत है. काश पं. विष्णुकांत शास्त्री ने 'मुवह्हिद' के सम्बन्ध में कुछ पढ़ा होता. आवश्यक प्रतीत होता है कि यहाँ मुवह्हिद की थोडी सी जानकारी दे दी जाय. इस जानकारी के अभाव में कबीर के सम्बन्ध में किसी निध्कर्ष तक पहुँचाना तर्क-सांगत प्रतीत नहीं होता. बाबा फरीद (मृ0 1265 ई0) के सुपुत्र ख्वाजा याकूब ने मुवह्हिद की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि "मुवह्हिद (एकत्ववादी) वास्तव में वह है जिसका मुख्य उद्देश्य सदाचार है. वह जो भी करता है उसका लक्ष्य परमात्मा की कृपा प्राप्त करना होता है. पानी उसे डुबोने में असमर्थ है और आग उसे जलाने में असफल. वह सत्ता के एकत्व में पूरी तरह डूबा होने के कारण अपने 'स्व' का पूर्ण विनाश कर देता है. एक सूफी जो इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, प्रत्येक प्रकार की चिंता से मुक्त हो जाता है. यदि वह अपनी खोज करता है तो ईश्वर को पाता है और यदि ईश्वर को खोजता है तो स्वयं को पाता है. जब प्रेमी प्रियतम में पूरी तरह खो जाता है, तो प्रेमी और प्रियतम के गुण अभिन्न हो जाते हैं." (अब्दुल्लाह ख्वेशगी, मेराजुल-विलायत (हस्त-लिखित) पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर, पत्र संख्या 15 अलिफ़). एकत्ववादी सूफी का उपर्युक्त परिचय कबीर के सम्पूर्ण जीवन की एक प्रकार से झांकी प्रस्तुत कर देता है.
प्रसिद्ध सूफी चिन्तक जुनैद ( मृ0 910 ई0 ) के मतानुसार "मुवह्हिद (एकत्ववादी) सांसारिक अस्तित्व से ऊपर उठकर और सामान्य मानवीय अस्तित्व से मुक्त होकर परमसत्ता के साथ एकमेक हो जाता है. इसी अवस्था में वह सच्ची तौहीद (एकत्व) को प्राप्त करता है. जबतक वह अपनी वैयक्तिकता को समाप्त नहीं करता वह मुवह्हिद के परमपद को प्राप्त करने में असमर्थ होता है. (ए. एच. अब्दुल्कादर, द लाइफ पर्स्नालिटी एंड राइटिंग आफ अल-जुनैद, लन्दन 1962, पृ0 79 ).कबीर ने "जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं" में इसी तथ्य को व्यक्त किया है.
कबीर का 'अवधूत' अथवा 'अवधू' या 'जोगी' वस्तुतः इसी मुवह्हिद के समानार्थक है जिसे सूफियों की सामान्य शब्दावली में 'आरिफ़' कहा गया है. जुनैद ने आरिफ़ और मुवह्हिद में कोई भेद नहीं माना है. उनके मतानुसार "आरिफ़' उस समय तक आरिफ़ नहीं होता जबतक वह धरती के स्वभाव का न हो जाय जिसपर पवित्र अपवित्र सभी चलते हैं. वह बादल की भांति प्रत्येक वस्तु पर छा जाता है और वर्षा की भांति पसंद-नापसंद का ध्यान किए बिना प्रत्येक स्थल को समान रूप से तर कर देता है."(वही,पृ0 102 ) कबीर ने इसी दृष्टि से अवधू जोगी को जग से न्यारा बताया है -" अवधू जोगी जग थैं न्यारा" मुवह्हिद, आरिफ़ अथवा अवधूत उस सहजानुभूति को प्राप्त कर लेता है जहाँ सरहपाद के शब्दों में "णउ पर णउ अप्पा" अर्थात अपने और पराये का भेद मिट जाता है. कबीर का यह अवधू अविनाशी से चित्त चिहुटा देने की बात करता है, अपने घर में कामधेनु को बाँध कर सांसारिक उपकरणों के सभी कच्चे बर्तन फोड़ देता है, नींद को कभी पास फटकने नहीं देता और सदैव जागता रहता है. उसे न काल खा सकता है, न कल्प प्रभावित कर सकता है न ही जरावस्था उसे क्षीण कर सकती है. वह परम पद में लीन रहता है, घर में रहकर ब्रह्म में माता रहता है,मृत्यु से न दूर रहता है न निकट न ही मर सकता है. यह सभी गुण कबीर के एकत्व वादी होने की पुष्टि करते हैं.
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प्रो. शैलेश जैदी की पुस्तक हिन्दी के मध्ययुगीन मुस्लिम कवि से साभार

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

कबीर-काव्य की वैष्णववादी समालोचना : लेखक - प्रो. शैलेश जैदी

कबीर की निरंतर बढ़ती ख्याति और लोकप्रियता तथा दाशरथि राम की भगवत्ता को खुल्लम-खुल्ला नकारने की प्रवृत्ति ने गोस्वामी तुलसीदास को सबसे अधिक ठेस पहुँचाई। जिस संत के चिंतन के मूल में विप्रपद -प्रेम न हो और जो दाशरथि राम की परब्रह्मता में आस्था न रखता हो ( रामचरित मानस , अरण्यकांड ३४/१ तथा उत्तरकाण्ड ३८/३-४ ), तुलसी उसे संत मानने के पक्ष में नहीं थे। हिन्दी कविता में ब्राह्मण-वर्चस्व की यह दृष्टि पहली बार तुलसी के प्रयास से स्थापित हुई । नाभादास ने यद्यपि कबीर तथा तुलसी दोनों को भक्त स्वीकार किया और मीरा तक आते-आते कबीर की चर्चा पौराणिक भक्तों के साथ भी होने लगी थी ( डॉ. राजदेव सिंह, संत साहित्य की भूमिका , पृ० १८ ), किंतु तुलसी के प्रति एकांत-निष्ठा रखने वाले वैष्णव समालोचकों ने तुलसी को भक्त और कबीर आदि छोटी जाति के कवियों को संत रूप में मान्यता देकर एक विशेष अलगाववादी रास्ता चुना।


काशी के जुलाहा परिवार में जन्मे, कबीर की दीप्तिमान लोक-छवि ने ब्रह्मण-समाज को चमत्कृत कर दिया। फलस्वरूप ब्राह्मण-वर्चस्व को बनाए रखने के उद्देश्य से कबीर को न केवल एक ब्राह्मण का शिष्य अपितु एक विधवा ब्राह्मणी का पुत्र भी घोषित कर दिया गया। यह एक सुनियोजित क़दम था। ब्राह्मण-कृपा के अभाव में कबीर का व्यक्तित्व इतना ओजस्वी किस प्रकार हो सकता था।

कबीर का चित्र बनाते समय भी वैष्णव चिंतकों ने उन्हें अपनी मानसिकता के अनुरूप देखने के विचार से उनके माथे पर तिलक जमाकर रुद्राक्ष की एक लम्बी सी माला उनके गले में डाल दी और शीश पर मोरमुकुट सजा दिया. कंठी, माला, तिलक आदि का जीवन-पर्यंत विरोध करने वाले कबीर के इस चित्र को बार-बार छाप कर इतना अधिक प्रचारित, प्रसारित और विज्ञापित किया गया कि श्यामसुंदर दास द्वारा कबीर ग्रंथावली के प्रथम संस्करण में प्रकाशित चित्र पाठकों की स्मृति से पुरी तरह ओझल हो गया. यह वैष्णव मानसिकता अचानक एक दिन में विकसित नहीं हो गई. जप, माला छापा तिलक, सरे न एकौ काम ' की उक्ति अर्थहीन बना दी गई और हरिऔध द्वारा प्रचारित कबीर की वैष्णव छवि को स्थायी स्वीकृति दे दी गई. श्यामसुंदर दास वाले कबीर की लम्बी श्वेत दाढी और मुखाकृति से फूटता हाला इतिहास के मलबे में दब गया.
डॉ0 राकेश गुप्त रामानंद और कबीर के गुरु-शिष्य सम्बन्ध पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए लिखते हैं - रामानंद वैष्णव थे, राम को विष्णु का अवतार मानते हुए सगुण उपासना का प्रचार उनका मुख्य उद्देश्य था। कबीर ने अवतारवाद और सगुण उपासना का 'सिरजनहार न ब्याही सीता', ताहि अगस्त अंचय गयो , इनमें को करतार ', तथा 'दुनिया ऐसी बावरी पाथर पूजन जाय,' जैसे वाक्य कहकर अनेक स्थलों पर स्पष्ट विरोध और उपहास किया। ....वेद , शास्त्र, स्मृति एवं पुराण के प्रति रामानंद की अगाध श्रद्द्धा थी। कबीर ने किर्तिम इस्मृति वेद पुराना' आदि कहकर हिन्दुओं के सभी ग्रंथों में अपना घोर अविश्वास प्रकट किया और उन्हें केवल पाखण्ड के प्रचार का साधन बतलाया (डॉ0 राकेश गुप्त , सूर सूर तुलसी ससी, प्री ० ९५) .

यहाँ इस तथ्य को स्पष्ट कर देना भी आवश्यक है कि रामानंद हनुमान की आरती पर विशेष बल देते हैं और शालिग्राम की पूजा का विधान करते दीखते हैं. जबकि कबीर न तो हनुमान के प्रति आस्थावान हैं, न ही शालिग्राम का कोई महत्त्व स्वीकार करते हैं. रामानंद हिन्दुओं को अन्य धर्मावलंबियों से जन्मना श्रेष्ठ समझते हैं और शूद्रों को वेद पढने के अधिकार से वंचित रखते हैं (रामधारिसिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय, पृ0 ३७७ ). फिर तथ्य यह भी है कि सत्रहवीं शताब्दी से पूर्व कबीर के गुरु के रूप में रामानंद की कोई चर्चा नहीं मिलती. शंकर वेदांत विषयक प्रो0 इरफान हबीब की यह अवधारणा पर्याप्त महत्वपूर्ण है कि पंद्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दी के लोकवादी एकेश्वरवाद का न तो शंकर वेदांत को स्रोत कहा जा सकता है और न ही उसपर उसके प्रभाव की कोई संभावना दिखायी पड़ती है. (प्रो0 इरफान हबीब,अभिनव भारती, १९९२-९३, पृ0 ३, ९ ). डॉ. लल्लन राय ने ठीक लिखा है कि भक्ति आन्दोलन की शुरूआत उत्तर भारत में कबीर के माध्यम से हुयी जिसे प्रस्थानत्रयी या उसके विशिष्ट भाष्य्कर्ताओं से किसी भी रूप में जोड़कर नहीं देखा जा सकता (अभिनव भारती,१९९२-९३, पृ0 ३८ ).


रामानंद संस्कृत के पंडित अवश्य थे किंतु ब्रजभाषा में न तो उनकी गहरी पैठ थी न ही उसके प्रति उनका कोई आकर्षण था. आदिग्रंथ में उनका केवल एक पद संगृहीत है किंतु इसके रचयिता रामानंद ही थे, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है. उनके नाम से प्राप्त हिन्दी की अन्य छुट-पुट रचनाओं की प्रामाणिकता भी संदिग्ध है. किसी भी जन आन्दोलन से जुड़ने के लिए जनभाषा से जुड़ना और उसके प्रति आश्वस्त होना ज़रूरी है. रामानंद की दृष्टि में संस्कृत एक पवित्र भाषा थी और उसे उच्च वर्ग की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त थी. कबीर संस्कृत को 'कूप जल' और 'भाखा' (ब्रज भाषा ) को 'बहता नीर' मानते थे. कूएँ के जल तक हर एक की पहुँच नहीं हो सकती, जबकि बहता नीर जन-जन तक पहुँचता है. संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा की तुलना में जनभाषा की श्रेष्ठता घोषित करने का साहस उसी में हो सकता है जो जन भावना से जुडा हो. यह साहस कबीर में था, रामानंद में नहीं था. वैष्णववादी समीक्षक बार-बार प्रचारित करते रहे हैं कि "भक्ति आन्दोलन के झंडे पर जो नारा लिखा हुआ था "जाति पाति पूछै नहि कोई / हरिको भजै सो हरि का होई" उसके सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि उसके रचयिता स्वयं रामानंद थे." सच तो यह है कि 'प्रसिद्ध है,' 'कहा जाता है,' 'सुनने में आया है' 'कहीं पढा था' 'लोक मान्यता यह है', वाली वैष्णववादी शैली अपनी प्रकृति से ही शोध-विरोधी है.
डॉ. धर्मवीर की पुस्तक 'कबीर के आलोचक' की इस अवधारणा ने कि 'ब्राह्मणवादी समीक्षकों ने कबीर के दर्शन और सामजिक संदेश के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं बरता. उन्होंने कबीर की नहीं बल्कि कबीर के भीतर रामानंद को बैठाकर उसकी प्रशंसा की है" ( कबीर के आलोचक, वाणी प्रकाशन दिल्ली,भूमिका भाग ), पं0 विष्णुकांत शास्त्री से लेकर मैनेजर पांडे तक को तिल्मिला दिया. यह जानते हुए भी कि हिन्दी आलोचकों की पहचान अभी तक ब्राह्मण, ठाकुर या वैश्य के रूप में नहीं की गई है, डॉ. धर्मवीर की पहचान दलित लेखक के रूप में की गई और उनकी आलोचना को 'दलित विमर्श' का नाम देने का प्रयास किया गया. डॉ. धर्मवीर पर यह आरोप लगाया गया कि 'उनके पास अपनी मान्यता को स्थापित करने के लिए न कोई प्रमाण है, न कोई युक्ति. उसके लिए वे केवल अपनी भावना और आवेश का सहारा लेते हैं."(डॉ. नंदकिशोर नवल, कसौटी त्रैमासिक, प्रवेशांक ) वस्तुतः तर्क, प्रमाण और युक्ति की आवश्यकता उसे पड़ती है जो तर्क, प्रमाण और युक्ति को स्वीकार करना चाहता हो. डॉ. धर्मवीर ने वही शैली अपनाई है जो लगभग डेढ़ सौ वर्षों से हिन्दी के वैष्णववादी आलोचकों की विशिष्ट शैली रही है. डॉ. धर्मवीर की बातें भी यदि उनकी विचारधारा के लोग पीढी-दर-पीढी वैष्णववादी आलोचकों की तर्ज़ पर बार-बार दुहराते रहेंगे, तो उन्हें भी एक दिन वैसी ही मान्यता प्राप्त हो जायेगी जैसी निराधार और तर्क-विरोधी होते हुए भी इस तर्क को मान्यता दी जा रही है कि " रामानंद के सत्संग से कबीर में वैष्णव धर्म की विशेषताएं आयीं." यदि वैष्णव मतावलंबी इस मन गढ़त वक्तव्य से संतोष का अनुभव कर सकते हैं , तो दलित चेतना से जुड़े एक बड़े वर्ग को डॉ. धर्मवीर के वक्तव्यों से संतोष क्यों नहीं प्राप्त हो सकता ?
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी की अवधारणा है कि "रामानंद के प्रधान उपदेश 'अनन्य भक्ति' को कबीर ने शिरसा स्वीकार कर लिया था. बाकी तत्वज्ञान को उन्होंने अपने सन्सकारों, रूचि और शिक्षा के अनुसार एकदम नवीन रूप दे दिया था."( कबीर, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, 1973, पृ0 110 ). यहाँ दो बातें विशेष रूप से विचारणीय है. एक तो यह कि रामानंद से पहले क्या उत्तरी भारत में 'अनन्य भक्ति' का कोई स्वरूप स्पष्ट नहीं था ? और दूसरे यह कि जिस तत्वज्ञान को कबीर ने नवीन रूप देने का प्रयास किया था क्या वह नवीन रूप उत्तरी भारत में परंपरागत रूप से विद्यमान नहीं था. ?
डॉ. द्विवेदी वैष्णव चिंतन की चौहद्दियों से बाहर निकलकर यदि अन्य चिंतन पद्धतियों पर भी विचार कर लेते तो उन्हें इस तथ्य का पता चलता कि सूफियों के मध्य 'अनन्य भक्ति' पर प्रारम्भ से ही बल दिया जाता रहा है. बसरे की राबिया ने जो आठवीं शताब्दी ई० में विद्यमान थीं अनन्य प्रेम में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया. उनकी प्रार्थना सूफी चिंतकों के मध्य सदैव लोकप्रिय बनी रही कि "हे नाथ ! इहलोक का सुख अपने शत्रुओं को प्रदान कर परलोक का सुख अपने मित्रों को दे. मेरे लिए तो तू ही पर्याप्त है. यदि मैं तेरी उपासना तेरे लिए करती हूँ तो अपने जमाल का वह शेष अंश जो तूने मुझे अभी तक नहीं प्रदान किया है, उसे भी प्रदान कर दे." (फरीदुद्दीन अत्तर, तज़किरतुल-औलिया, बंबई पृ0 39-48 )
प्रख्यात सूफी कवि बायजीद बिस्तामी (मृ0 874 ई0 ) ईश्वर के प्रति अपने अनन्य-प्रेम की मस्ती एवं उन्माद के लिए विशेष उल्लेख्य हैं. वे अबू अली कंदर के शिष्य थे जिन्हें एक सिद्ध पुरूष स्वीकार किया जाता था. बायजीद के एकत्ववादी चिंतन पर आर.सी.ज़हेनर जैसे विद्वानों ने उपनिषदों का प्रभाव देखने का प्रयास किया है. ( हिंदू एंड मुस्लिम मिस्तिसिज्म, पृ0 90 तथा डॉ. यश गुलाटी, सूफी कविता की पहचान, पृ0 64 ) बायजीद की भक्ति में द्वैत का कोई स्थान नहीं था. वे प्रेम को ईश्वर का रूप स्वीकार करते थे और उसके अनादि और अनंत होने पर उनका पूर्ण विशवास था. लोक सेवा का महत्त्व उनकी दृष्टि में हज से भी कहीं अधिक था. बायजीद बिस्तामी का कहना था कि 'परमात्मा ने एक बार मुझे उठाया और अपने सम्मुख बिठा लिया.फिर मुझसे कहा -'अरे बायजीद ! मेरी सृष्टि तुझे देखने के लिए उत्सुक है'. मैंने उत्तर दिया-' मुझे अपने एकत्व में सज्जित करो और अपने स्वत्व में लपेट लो ताकि जो भी देखें, कहें कि हमने तुम्हें अर्थात परमात्मा को देख लिया.' बायजीद निःस्वार्थ ईश्वर प्रेम को भक्ति की पराकाष्ठा मानते थे और प्रेमी का प्रेमी में विलयन उनके एकत्व चिंतन का नाभीय बिन्दु था. कबीर इसी भक्ति के पक्षधर हैं जिसमें "प्रेमी से प्रेमी मिलै, सब बिष अमृत होया" का आभास हो सके. इसमें "रहा कबीर हिराय" की स्थिति भी देखी जा सकती है जहाँ भक्त परम सत्ता के साथ एक-मेक हो जाता है.
डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने यह तो रेखांकित किया है कि 'रामानंद से जिस अनन्य भक्ति को पाकर कबीर उनके कृतज्ञ हो गए, वह भक्ति योगियों के पास नहीं थी, सहजयानी सिद्धों के पास नहीं थी, कर्मकांडियों के पास नहीं थी, पंडितों के पास नहीं थी, मुल्लाओं के पास नहीं थी, काजियों के पास नहीं थी' ( कबीर, पृ0 147-148 ). किंतु यह नहीं बताया कि सूफी भक्तों और दरवेशों के पास थी या नहीं ? डॉ. द्विवेदी अच्छी तरह जानते थे कि स्वयं रामानंद ने सूफी भक्तों के अनन्य प्रेमसे प्रभावित होकर इसे विशेष मान्यता दी थी. डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल की तो स्पष्ट मान्यता थी और डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी इस से भली प्रकार परिचित भी थे कि "सूफी मत की विशेषता केवल तपोमय जीवन न होकर परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम भावना है जिस से समस्त संसार उन्हें परमात्मामय मालूम होता है."(हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृ0 81 ).
विचारणीय है कि वैष्णववादी समालोचकों ने जैनों, बौद्धों, नाथ्योगियों और सूफियों के प्रति कभी अच्छे भाव अपने मन में विकसित नहीं होने दिए. बौद्धों के प्रति उनकी घृणा के तो स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं (द्रष्टव्य है 'मृच्छकटिक' नाटक का सातवाँ आठवां अंक ). बौद्ध धर्मके उन्मूलन के प्रयास में शंकर, कुमारिल और उदयन की भूमिकाएँ सहज ही रेखांकित की जा सकती हैं (आब्स्क्योर रेलिजास कल्ट्स, पृ0 33-34 ).ब्रह्मण धर्म ने सातवीं शताब्दी ईस्वी से ही यह मान्यता स्थापित करने का प्रयास किया कि ब्राह्मणेतर सभी चिंतन पद्धतियाँ, ब्राह्मण धर्म विरोधी हैं और उन्हें देश की मुख्य धरा में कोई स्थान नहीं दिया जा सकता. एनी देशों में भी धर्माचार्यों और धर्म पुरोहितों ने वाही मार्ग अपनाया जो भारत में ब्राह्मण धर्माचार्यों का मार्ग था. फलस्वरूप विश्व इतिहास में असहमतिवादी चिंतकों (Dissenters) की एक लम्बी और स्वस्थ परम्परा विकसित हुई. यह परम्परा धार्मिक संकीर्णताओं से जन्मी रूढिगत अलगावपरक वैचारिकता के प्रति एक असहमति-मूलक आक्रोश रखती थी और उदारवादी, संवेदनशील मानवतावादी दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा के लिए प्रतिबद्ध थी. भारत में सिद्धों,नाथ्योगियों तथा संतों को इसी असहमतिवादी चिंतकों की परम्परा में मूल्यांकित किया जाना चाहिए. अरब ईरान आदि इस्लामी देशों में यह असहमतिवादी चिन्तक शरीअत की रूढियों में जकडे संकीर्ण मुल्लाओं, काजियों के समक्ष सूफियों के विभिन्न सम्प्रदायों, कलंदरों और दरवेशों के रूप में उभरे. कबीर को असहमतिवादियों की यह दोनों परम्पराएं विरासत में मिली थीं.
वस्तुतः असहमतिमूलक चिंतन प्राचीन धर्मशास्त्रों और तथाकथित पवित्र आलेखों को अपने अनुभवजन्य विवेक एवं अध्यात्मज्ञान के प्रकाश में स्वयं व्याख्यायित करता है और छोटे-बड़े, ऊंच-नीच की विभाजक रेखाओं को मिटाकर ईश्वरीय प्रेम के किरण-बिन्दु से ईश्वरीय सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को सामान धरातल पर जोड़ता है. असहमतिवादियों और धर्मपुरोहितों के बीच सदैव एक खायीं पायी गई और यह खायीं एकतरफा थी जो मुख्यधारा में प्रतिष्ठित धर्म के ठेकेदारों के मन में इतनी गहरी हो चुकी थी कि असहमतिवादियों का अस्तित्व भी सहन करने के लिए आमादा नहीं थी. असहमतिवादी होने का स्पष्ट अर्थ था भद्र तथा कुलीन, धर्मनियन्त्रित समाज की दृष्टि में निकृष्ट बन जाना. पुरोहितवादी दृष्टि मूल रूप से आक्रामक थी. आक्रामक इसलिए थी कि उसके अन्तश्चेतन में अपने सामजिक, राजनीतिक और धार्मिक वर्चस्व का तथा स्वयं को ईश्वर के अधिक निकट समझने का अंहकार पूरी तरह जड़ें जमा चुका था.
इंग्लैंड में असहमतिवादियों (Dissenters) को उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक विवाह के पंजीकरण का अधिकार नहीं था और वे अपने मुर्दे परंपरागत चर्च के कब्रिस्तानों में नहीं दफना सकते था. विक्टोरियन युग तक वहाँ असहमतिवादियों में मित्र समाज (क्वेकर्स), प्रार्थना समाज (कान्ग्रिगेशानिस्ट्स) और यूनीटेरियन विद्यमान थे. भारत में भी असहमतिवादियों की एक लम्बी परम्परा पायी गई जिसमें सिद्धों और नाथों का प्रभाव पूर्व मध्यकाल तक आंशिक रूप से ही सही, अपनी चुनौतियाँ बनाए हुए था. भारतीय मुस्लिम असहमतिवादियों में सूफी चिंतन की मुख्य धारा से फूटने वाली अनेक धाराएं विकसित हुईं. यहांतक कि 'हुलूली' तथा 'वुजूदी' सूफियों को काफिर तक घोषित कर दिया गया. अबू सईद अबिल्खैर तथा मसऊद बक इत्यादि वुजूदी सूफियों की रचनाएं पध्हना तक वर्जित था. इन परम्पराओं के पास पाखंडों के विरोध में खड़े होने की शक्ति थी, धर्मशास्त्र सम्मत मुख्यधारा से असहमति का साहस था और संकीर्ण रूढिवादी चिंतन के प्रति सशक्त आक्रोश था. जिस प्रस्थानत्रयी के साथ कबीर को जोड़ने का प्रयास किया जाता है उसमें असहमतिमूलक चिंतन का सर्वथा अभाव था. वैष्णववादी समालोचकों को स्वीकार कर लेना चाहिए कि कबीर सूफी असहमतिवादी चिंतकों की परम्परा के ही एक ठोस स्तम्भ थे.